DRDO ने मल्टी-लेयर्ड बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम का सफल परीक्षण किया है। अब भारत इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) के खतरों को हवा में ही नष्ट कर सकता है। जानिए यह तकनीक कैसे काम करती है।

भारत ने रक्षा क्षेत्र में एक और अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया है। अब हमारा देश लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ-साथ अत्यंत विनाशकारी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) के खतरों का भी डटकर मुकाबला कर सकता है। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) ने 10 और 11 जून को लगातार 3 सफल फ्लाइट टेस्ट किए, जिनमें भारत के अत्याधुनिक मल्टी-लेयर्ड बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम की मारक क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया गया।
यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक दुश्मन की मिसाइलों को उनके तय लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही हवा में नेस्तनाबूद कर देती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 13 जून 2026 को इस सफल टेस्टिंग की तस्वीरें अपने सोशल मीडिया (X) अकाउंट पर साझा की हैं।
आसान शब्दों में कहें तो इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) बेहद लंबी दूरी तक मार करने वाला एक घातक हथियार है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह एक महाद्वीप से उड़ान भरकर दूसरे महाद्वीप में स्थित टारगेट को तबाह कर सकती है।
मारक क्षमता: आमतौर पर इन मिसाइलों की रेंज 5,500 किलोमीटर से भी ज्यादा होती है।
परमाणु क्षमता: यह मिसाइल अपने साथ भारी मात्रा में परमाणु हथियार (Nuclear Warheads) ले जाने में सक्षम होती है।
हमले का तरीका: यह रॉकेट की तरह सीधे ऊपर अंतरिक्ष की ओर जाती है, फिर वायुमंडल से बाहर निकलने के बाद बहुत ऊंचाई से वापस पृथ्वी की ओर रुख करती है और अत्यधिक तीव्र गति से अपने टारगेट पर सटीक हमला बोलती है। इसी ताकत के कारण इसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली रणनीतिक हथियारों में गिना जाता है।
मल्टी-लेयर्ड BMD का मुख्य उद्देश्य दुश्मन की किसी भी बैलिस्टिक मिसाइल को भारतीय सीमा में नुकसान पहुंचाने से पहले ही आसमान में ढेर करना है। यह सुरक्षा कवच कई स्तरों (Phases) पर काम करता है-
डिटेक्शन (पता लगाना): सबसे पहले एडवांस रडार सिस्टम आसमान में दुश्मन की मिसाइल की लोकेशन और गति का पता लगाते हैं।
आकलन (Command Center): रडार से मिली जानकारी को तुरंत कमांड सेंटर भेजा जाता है, जहां खतरे का बारीकी से आकलन किया जाता है।
एक्शन (Interceptor Launch): इसके बाद भारत की ओर से तुरंत 'इंटरसेप्टर मिसाइल' छोड़ी जाती है, जो दुश्मन की मिसाइल की तरफ बढ़ती है।
सुरक्षा की दोहरी गारंटी (Layered Defense): यदि किसी कारणवश पहली इंटरसेप्टर मिसाइल चूक जाती है या लक्ष्य को नष्ट नहीं कर पाती, तो डिफेंस सिस्टम की दूसरी परत (Layer) तुरंत एक्टिव हो जाती है। यानी एक सुरक्षा चक्र फेल होने पर भी दूसरा चक्र दुश्मन को खत्म करने के लिए तैयार रहता है।
इस महा-परीक्षण से पहले भी भारत ने अपने बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के फेज-II का सफलतापूर्वक फ्लाइट टेस्ट किया था। उस परीक्षण के दौरान ओडिशा के धामरा स्थित लॉन्चिंग कॉम्प्लेक्स (LC-IV) से दुश्मन की मिसाइल जैसी ही एक 'टार्गेट मिसाइल' लॉन्च की गई थी। जिसे जमीन और समुद्र पर तैनात भारतीय रडारों ने तुरंत डिटेक्ट किया और AD इंटरसेप्टर सिस्टम ने उसे हवा में ही मार गिराया था।
इस नए परीक्षण के साथ-साथ भारतीय सेना ने 'नेवल एंटी शिप मिसाइल-मीडियम रेंज' का भी सफल टेस्ट किया है। इसे भारत की समुद्री स्ट्राइक क्षमता और नौसैनिक डिफेंस स्किल्स को मजबूत करने की दिशा में एक बहुत बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।
इस सफल परीक्षण के साथ ही भारत ने वैश्विक पटल पर अपनी सैन्य धाक जमा दी है। भारत अब दुनिया के उन गिने-चुने और खास देशों के ग्रुप (Elite Club) में शामिल हो गया है, जिनके पास ऑपरेशनल-लेवल की 'बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस' क्षमता मौजूद है।
भारत से पहले यह अत्याधुनिक और जटिल मिसाइल डिफेंस तकनीक केवल दुनिया के चार देशों के पास थी -
अमेरिका
रूस
इजराइल
चीन
अब भारत इस सूची में पांचवां देश बन गया है, जो देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिहाज से एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।

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