मध्य प्रदेश में ओबीसी (OBC) आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का मामला एक बार फिर गरमा गया है। सोमवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस संवेदनशील विषय पर एक अहम आदेश जारी किया।

जबलपुर। स्टार समाचार वेब
मध्य प्रदेश में ओबीसी (OBC) आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का मामला एक बार फिर गरमा गया है। सोमवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस संवेदनशील विषय पर एक अहम आदेश जारी किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आगामी 16 अप्रैल 2026 को इस मामले की अंतिम (Final) सुनवाई की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब यह कानूनी लड़ाई अपने निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है।
हाईकोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को निर्देशित किया है कि वे 2 अप्रैल तक अपने-अपने केस से जुड़ी विस्तृत जानकारी और दस्तावेज पेश करें। इन जानकारियों के संकलन के बाद कोर्ट अंतिम बहस शुरू करेगा। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि करीब 17 महीनों के लंबे अंतराल के बाद हाईकोर्ट में इस पर दोबारा बहस शुरू हुई है। इससे पहले, सितंबर 2024 में इस मामले से जुड़ी कुल 10 याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित (Transfer) कर दिया गया था।
इस विवाद की जड़ें तत्कालीन कमलनाथ सरकार के कार्यकाल से जुड़ी हैं। कमलनाथ सरकार ने ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण का कोटा 14% से बढ़ाकर 27% करने हेतु अध्यादेश जारी किया था, जिसे बाद में विधानसभा में कानून का रूप दिया गया। इस वृद्धि के साथ ही मध्य प्रदेश में कुल आरक्षण का प्रतिशत 64% तक पहुंच गया। छात्रा आशिता दुबे और अन्य याचिकाकर्ताओं ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका मुख्य तर्क यह है कि यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'इंदिरा साहनी केस' में तय की गई 50% की अधिकतम सीमा का उल्लंघन करता है।
21 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक बड़ा निर्देश जारी किया। शीर्ष अदालत ने सभी लंबित याचिकाओं को वापस मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भेजते हुए त निर्देश दिए।
स्पेशल बेंच का गठन: हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस मामले के लिए एक विशेष पीठ (Special Bench) गठित करने को कहा गया।
समय सीमा: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि तीन महीने के भीतर सभी याचिकाओं का अंतिम निपटारा किया जाए।
सामाजिक संरचना का आधार: आरक्षण नीति की वैधता की जांच राज्य की विशिष्ट सामाजिक और जनसांख्यिकीय संरचना (Social Structure) के आधार पर की जाए।
16 अप्रैल की सुनवाई न केवल मध्य प्रदेश की राजनीति बल्कि प्रदेश के हजारों युवाओं के भविष्य के लिए निर्णायक होगी।
सरकारी भर्तियाँ: वर्तमान में कई भर्तियों का परिणाम 14% और 27% के फेर में अटका हुआ है या प्रोविजनल आधार पर जारी किया गया है।
शिक्षा और प्रवेश: मेडिकल और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।
राष्ट्रीय नजीर: यदि कोर्ट 50% से अधिक आरक्षण को वैध मानता है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक बड़ा कानूनी उदाहरण (Precedent) बन सकता है।

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