चित्रकूट की पवित्र मंदाकिनी नदी, जहाँ प्रभु श्रीराम ने वनवास काल बिताया, आज अतिक्रमण और प्रदूषण से कराह रही है। एनजीटी के निर्देशों के बावजूद प्रशासनिक लापरवाही और अवैध निर्माण से मंदाकिनी का अस्तित्व खतरे में है। संत समाज नाराज है और संरक्षण की मांग उठा रहा है।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
जिस परम पुण्य सलिला मंदाकिनी में प्रभु श्रीराम अपने वनवास काल के दौरान अनुज लक्ष्मण और माता सीता के साथ डुबकी लगाया करते थे, वह पवित्र नदी पर्यटन विभाग व जल संसाधन विभाग के अलावा स्थानीय निकाय द्वारा कराए गए बेतरतीब व गैर जरूरी निर्माण कार्यों से कराह रही है। विडंबना की बात है कि एक ओर नदियों के संरक्षण के लिए सरकार गंगा जल संवर्द्धन जैसे अभियान चलाकर बारिश की एक-एक बूंद सहेजने का प्रयास कर रही है, तो दूसरी ओर स्थानीय अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से ‘मप्र की गंगा’ कही जाने वाली मंदाकिनी नदी के अविरल जलस्त्रोतों को चोट पहुंचाकर इसकी धारा को मंद किया जा रहा है। इस मामले में प्रशासनिक उदासीनता इस कदर है कि मंदाकिनी को बचाने के लिए सालों पहले जारी किए गए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश को भी मंदाकिनी के प्रदूषित जल के अविरल प्रवाह में बहा दिया गया है। चप्पे-चप्पे पर पसरा अतिक्रमण जहां मंदाकिनी के अस्तित्व को निगल रहा है वहीं एनजीटी के निर्देशों को ताक पर रखकर मंदाकिनी के सीने पर अनवरत कराया जा रहा नियमविरूद्ध निर्माण कार्य प्रशासन की कार्यशैली व सरकार के नदी संरक्षण अभियान की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है।
हासिए पर ट्रिब्यूनल के निर्देश हालत जस की तस
मंदाकिनी नदी के भीतर से लेकर किनारों तक चप्पे -चप्पे में पसरा अतिक्रमण एक दशक से भी पहले का है । मृतप्राय होती मंदाकिनी के संरक्षण के लिए उस दौरान हाईकोर्ट के एड. नित्यानंद मिश्रा द्वारा लगाई गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने संजीदगी दिखाई और ट्रिब्यूनल ने आब्जर्वर के तौर पर एड. विजय साहनी को भेजकर पवित्र नदी के सेहत की जांच कराई । एनजीटी के आब्जर्वर एड. साहनी ने 29 जुलाई 2013 को चित्रकूट पहुंचकर स्फटिक शिला से लेकर रामघाट तक की ‘मंदाकिनी यात्रा ’ की । उस दौरान भरत घाट के निकट बने हनुमान धारा पुल से तकरीबन 200 मीटर दूर मंदाकिनी नदी के भीतर बन रहे एक भवन को देखकर वे भौचक्के रह गए थे । दिलचस्प बात यह है कि उक्त बिल्डिंग को शरदोत्सव के मंच के नाम पर दूसरे प्रदेश के किसी सांसद की निधि से बनाया जा रहा था। ‘ एनजीटी की आंख’ बनकर पहुंचे डा. साहनी ने रामहठीले आश्रम , कृष्णार्पित आश्रम समेत नदी में खरपतवार की तरह उग रहे आश्रमों के अलावा प्रमोद वन व जानकी कुंड के पीछे नदी के कैचमेंट एरिया पर पर हुए आधा सैकड़ा से अधिक अतिक्रमणों की वीडियोग्राफी कराई । इसके अलावा भरत घाट से लेकर स्फटिक शिला तक जगह-जगह नाले-नाली से प्रवाहित हो रही धर्मनगरी की गंदगी के छायाचित्र भी एनजीटी के तत्कालीन आब्जर्वर ने लिए और याचिका की सुनवाई के दौरान 6 अगस्त 2013 को ट्रिब्यूनल में पेश किए। छायाचित्रों के साथ जब मंदाकिनी की दुर्दशा की रिपोर्ट पेश हुई तो एनजीटी के तत्कालीन न्यायधीश ने इसे संवेदनशीलता से लिया और 120 से अधिक अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए। इनमे से वह भवन भी था जिसका एक बड़ा हिस्सा मंदाकिनी नदी के भीतर बनाकर उसे ‘जलमहल’बनाने की कवायद की जा रही थी। एनजीटी के निर्देशों ने उस दौरान हड़कंप तो मचाया और संबंधित विभागों की टीमों ने संयुक्त प्रयास करते हुए औपचारिक तौर पर अतिक्रमण भी हटाए । उस दौरान पर्यटन विभाग द्वारा नदी के भीतर बनाए जा रहे भवन काम को तो रोक दिया गया लेकिन न तो नदी संरक्षण का जिम्मा संभालने वाले विभाग और न ही स्थानीय निकाय उस अर्धनिर्मित भवन को ढहा सके हैं। मंदाकिनी के सीने पर अभ्ी भी तना यह अर्द्धनिर्मित भवन संकेत देता है कि स्थानीय प्रशासन को पवित्र मंदाकिनी के संरक्षण के लिए एनजीटी द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों की कोई परवाह नहीं है।
यूं झोंकी गई धूल
मृतप्राय होती मंदाकिनी को 12 वर्ष पूर्व संजीवनी प्रदान करने की एनजीटी की कोशिशें कितनी कामयाब हुर्इं, इसका आकलन करने जब स्टार की टीम ने एनजीटी के तत्कालीन कमिश्नर डा. साहनी की तर्ज पर रामघाट से स्फटिक शिला तक की मंदाकिनी यात्रा की तो हालात बेहद निराशाजनक नजर आए। बेशक निर्देश मिलते ही अतिक्रमण की औपचारिक कार्रवाई कर तस्वीरों के जरिए उस दौरान ‘एनजीटी’ को संतुष्ट कर दिया गया लेकिन जमीनी असलियत बताती है कि ट्रिब्यूनल के निर्देशों के बाद सरकारी व राजनीतिक संरक्षण के साथ उदासीनता की खुराक पाकर रामहठीले आश्रम , कृष्णार्पित आश्रम समेत विभिन्न अतिक्रामक संस्थाओं का विस्तार गऊघाट -स्फटिक शिला तक और बढ़ गया। हालात यह हैं कि मौजूदा समय पर स्थानीय प्रशासन ने भी उन्हें क्लीन चिट दे दी है जिससे उनका विस्तार कैचमेंट एरिया से लेकर प्रवाहित होने वाले नदी के जल तक पहुंच गया है।
एक पखवाड़े में दो बैठकें, संत नाराज
बीते एक पखवाड़े में संत समाज भी दो बैठकें कर मंदाकिनी के प्रदूषण, अतिक्रमण और चित्रकूट विकास पर सवाल उठाते हुए नाराजगी जता चुका है। एक बैठक पिछले सप्ताह हुई थी जिसमें तकरीबन ढाई सौ संत-महंतों ने बैठक में प्रदूषित होती मंदाकिनी और चित्रकूट के बूतरतीब विकास पर सवाल उठाए थे। बुधवार को भी सांसद और विधायक की बैठक में संतों ने चित्रकूट के विकास और अतिक्रमण व प्रदूषण से तिल-तिल मरती मंदाकिनी की समस्या सामने रखकर इनके त्वरित समाधान की मांग उठाई है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकार मंदाकिनी के वास्तविक संरक्षण के लिए कोई कारगर कदम उठाएगी?
क्या मेरे राम अब कभी लौटेंगे?
अतिक्रमण और प्रदूषण से करहती परम पुण्य सलिला मंदाकिनी पूछ रही है कि क्या मेरा उद्धार करने मेरे राम कब लौटेंगे या फिर मैं यूं ही चुपचाप दम तोड़ दूंगी, और तुम सब बस खबरें पढ़ते रहोगे? मंदाकिनी की यह वेदना यूं ही नहीं है बल्कि इसे प्रशासनिक व राजनीतिक रूप से जिस प्रकार से छला गया है उससे इसके अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।जिस मंदाकिनी को गंगा का दर्जा दिया गया है, उसमें अब खुलेआम गंदे नाले बहाए जा रहे हैं। रामघाट से स्फटिक शिला तक गंदगी, पॉलीथिन और अतिक्रमण का आलम ऐसा है कि वहां कोई आस्था टिक ही नहीं सकती। चित्रकूट के संत कहते हैं कि मंदाकिनी कोई आम जलधारा नहीं, यह उस राम की साक्षी रही है जिसने यहीं अपने जीवन के कठिनतम दिन बिताए। यह केवल एक नदी नहीं, हमारी सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। यदि अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो शायद इतिहास और आने वाली पीढ़ियां हमें माफ न करे। य्आज अगर मंदाकिनी को नहीं बचाया गया, तो यह नदी केवल किताबों में उसी तरह पढ़ने को मिलेगी जिस प्रकार से मानवीय अत्याचार का शिकार होकर पैसुनी नदी पुस्तकों में ही रह गई है।

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