पन्ना में पहली बार ड्रोन आधारित एरियल फायर फाइटिंग तकनीक का परीक्षण किया गया। जंगल की आग रोकने के लिए फायर रिटार्डेंट रसायन का छिड़काव किया गया, जिससे वनकर्मियों की सुरक्षा और वन संरक्षण को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

हाइलाइट्स:
पन्ना, स्टार समाचार वेब
जिले से वन संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी और ऐतिहासिक पहल सामने आई है। दक्षिण वनमण्डल पन्ना ने राज्य वन अनुसंधान संस्थान एसएफआरआई के सहयोग से शाहनगर वन परिक्षेत्र में जंगल की आग पर नियंत्रण के लिए ड्रोन आधारित एरियल फायर फाइटिंग तकनीक का प्रायोगिक परीक्षण किया है। इसे देश के शुरूआती प्रयासों में शामिल माना जा रहा है, जिसने वन अग्नि प्रबंधन के क्षेत्र में नई उम्मीद जगाई है। इस प्रयोग के दौरान ड्रोन की मदद से वन क्षेत्र के ऊपर से फायर रिटार्डेंट रसायन का छिड़काव किया गया। यह विशेष मिश्रण आग की तीव्रता कम करने और उसके फैलाव को रोकने में सहायक माना जाता है।
वन विभाग ने शाहनगर क्षेत्र में लगभग 0.1 हेक्टेयर क्षेत्र में मोनो अमोनियम फॉस्फेट आधारित घोल का नियंत्रित छिड़काव कर इसका परीक्षण किया। अब तक जंगलों में आग लगने पर वनकर्मियों को कई किलोमीटर पैदल चलकर दुर्गम पहाड़ियों, गहरी घाटियों और घने जंगलों तक पहुंचना पड़ता है। कई बार आग इतनी तेज हो जाती है कि कर्मचारियों को सीधे लपटों के पास जाकर काम करना पड़ता है, जिससे उनकी जान पर भी खतरा बन जाता है। ऐसे में ड्रोन आधारित तकनीक भविष्य में वनकर्मियों के लिए सुरक्षा कवच साबित हो सकती है। वन अधिकारियों का कहना है कि गर्मियों के मौसम में दूरस्थ वन क्षेत्रों में आग की घटनाएं बढ़ जाती हैं, जहां समय पर पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती होती है। यदि ड्रोन के जरिए शुरूआती चरण में ही आग पर नियंत्रण पा लिया जाए तो बड़े नुकसान को रोका जा सकता है। इससे जंगल, वन्यजीव और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी बेहतर तरीके से की जा सकेगी।
दक्षिण वनमण्डल पन्ना के डीएफओ अनुपम शर्मा ने स्पष्ट किया है कि यह केवल प्रदर्शन नहीं बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन का हिस्सा है। आने वाले समय में अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों में कई और परीक्षण किए जाएंगे। इसके साथ मिट्टी, जल और वनस्पति पर पड़ने वाले प्रभावों का भी परीक्षण होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि तकनीक पर्यावरण के लिए सुरक्षित और व्यवहारिक है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में दुर्गम जंगलों, तीव्र वनाग्नि क्षेत्रों और संवेदनशील वन्यजीव आवासों में इस तकनीक का उपयोग किया जा सकता है।
पन्ना जैसे क्षेत्रों में जहां बाघ, तेंदुआ, भालू और अन्य वन्यजीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं, वहां ऐसी व्यवस्था बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में ड्रोन, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और आधुनिक तकनीकों के सहारे भारत में वन अग्नि प्रबंधन का स्वरूप बदल सकता है। पन्ना जिले में हुआ यह प्रयोग उसी बदलाव की पहली मजबूत दस्तक माना जा रहा है। हीरों और बाघों के लिए पहचाने जाने वाला पन्ना अब जंगल बचाने की नई तकनीक के कारण भी चर्चा में है। यदि यह प्रयास सफल होता है तो पन्ना पूरे देश के लिए मिसाल बन सकता है।


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