सतना के सितपुरा के पास स्थित रिलायंस बायो-सीएनजी प्लांट से बारिश में गंदा मलबा खेतों और तालाबों तक पहुंचा। प्रदूषण और दुर्गंध से परेशान किसानों ने प्रशासन से कार्रवाई की मांग की, वहीं ग्रामीणों ने आंदोलन की चेतावनी भी दी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जांच शुरू की है।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
फसलों का कचरा, गोबर, फूड वेस्ट, सीवेज आदि को एक बंद टैंक में प्रोसेस कर बायो-फ्यूल तैयार करने की योजना जिम्मेदारों की लापरवाही के कारण किसानों के लिए अभिशाप बनती जा रही है। बात है सितपुरा के निकट बनाए गए रिलायंस के बायो- फ्यूल सीएनजी संयंत्र का जहां का मलबा इन दिनों आसापास के किसानों के लिए मुसीबत बना हुआ है। यूं तो बायो-फ्यूल की स्थापना किसानों की मदद के लिए ही की गई है लेकिन लापरवाही ने क्षेत्रीय किसानों को परेशान कर रखा है। किसानों की शिकायत पर पाल्यूशन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच भी शुरू कर दी है।
कालिख बहते देख ग्रामीण हैरान
शनिवार व रविवार को हुई बारिश के बाद सोमवार की सुबह ग्रामीण जब निकले तो सड़क पर काला पानी बहते देख हैरान रह गए। पानी न केवल काला था बल्कि दुर्गंधपूर्ण भी था। सितपुर-छींदा के जीर्ण-शीर्ण मार्ग के गड्ढों पर भी वैसा ही काला पानी भरा सोमवार को देखा गया। इसके अलावा रिलायंस बायो फ्यूल संयंत्र के आसपास के खेतों , तालाबों व पोखरों में भरा पानी भी काला हो गया है। बताया जाता है कि संयंत्र में जिस कचरे से बायो-फ्यूल व फर्टिलाइजर तैयार किया जाता है उसे एक बड़े टैंक में रखा जाता है जो बारिश के चलते ऐसा ओवरफ्लो हुआ कि उसका मलबायुक्त पानी जहां-जहां पहुंचा, वहां-वहां कालिमा छा गई। इससे सबसे बड़ा खतरा कछुआ व मछलियों जैसे उन जलीय जंतुओं को हैं जो आसपास के जलाशयों में मौजूद हैं।
ग्रामीणों ने दी आंदोलन की चेतावनी
इस घटना से नाराज बचवई ग्राम पंचायत के रहवासियों ने प्रशासन से संयंत्र की व्यवस्थाओं को दुरूस्त रखने व बहते प्रदूषित मलबे पर अविलंब प्रतिबंध लगाने की मांग की है। बचवई उप सरपंच आरवेंद्र सिंह ‘गांधी’, उज्जवल नन्हे सिंह ,पंकज द्विवेदी, लल्ला महराज, बादल सिंह, दद्दू , भोलू सिंह भूलनी, लकी सिंह, धर्मेंद्र रजक, अनुराग गर्ग, सुशील चौधरी, रानी बुनकर, रावेंद्र सिंह, राजबहादुर बागरी ,धन्नू सिंह, गुड्डू सिंह, रामू सिंह, रामफल चौधरी, कमलेश दाहिया, रज्जन पाल,संतोष कोरी , राजमन सिंह, समेत कई ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि संयंत्र प्रबंधन ने प्रदूषित मलबे को खेतों व जलस्त्रोतों तक पहुंचने से न रोका तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
प्रदूषण का स्तर जांचने पानी की जांच जरूरी
जानकारों का मानना है कि संयंत्र से निकले पानी व मलबे की जांच प्रदूषण के लिहाज से बेहद जरूरी है ताकि इस बात का परीक्षण हो सके कि संयंत्र से निकलने वाले प्रदूषित मलबे से कृषि कार्य और जलीय जंतुओं को कितनी क्षति पहुंच सकती है। ग्रामीणों का कहना है संयंत्र प्रबंधन को अपने यहां से निकलने वाले मलबे की निकासी का उचित प्रबंध करना चाहिए ताकि खेतों की उर्वरक क्षमता और आसपास के जल स्त्रोत प्रदूषित न हों।
यूं बनती है जैविक खाद
एक बड़े टैंक में फसल , गोबर समेत अन्य जैविक कचरा डाला जाता है। इस टैंक में आॅक्सीजन नहीं होता। बैक्टीरिया जैविक कचरे को तोड़ते हैं और बायोगैस बनती है। इस बायोगैस में लगभग 50-60 फीसदी मीथेन, 30-40 फीसदी कार्बन डाइआॅक्साइड और कुछ अशुद्धियां होती हैं। बायोगैस से कार्बन डाइआॅक्साइड, पानी, हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी अशुद्धियां हटाई जाती हैं। जब गैस लगभग 95 फीसदी मीथेन तक शुद्ध हो जाती है, तो यह बायो-सीएनजी बन जाती है। इस गैस को उच्च दबाव में कंप्रैस करके सिलेंडरों में भरा जाता है। गैस बनने के बाद बचा हुआ मटेरियल फरमेंटेशन आर्गेनिक मैन्योर यानी जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल हो सकेगा। ऐसा दावा है कि इससे बंजर जमीन की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी। रिलायंस इन प्लांट्स के लिए कच्चे माल के तौर पर धान की पराली, सोयाबीन वेस्ट, नेपियर ग्रास, इंडस्ट्री वेस्ट और शहरों से निकलने वाले सॉलिड वेस्ट के साथ गोबर का भी इस्तेमाल करता है। प्लांट के आसपास की बंजर जमीन पर नेपियर घास उगाई जाएगी। इसका भी बायो मास के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा।
निश्चित तौर पर आप जो बात बता रहे हैं गंभीर है। मैं फिलहाल बाहर हूं। मौके पर अधिकारियों को भेजकर मामले की जाच कराई जाएगी और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई तय की जाएगी। किसी को प्रदूषण फैलाने का अधिकार नहीं है। नियमों के तहत ही संयंत्र संचालित किया जा सकता है।
गणेश बैगा, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी पीसीबी अधिकारी


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