सतना में 40 साल की माइनिंग लीज पर किसानों की उपजाऊ जमीन देने के प्रस्ताव से भारी असंतोष, मुआवजा मॉडल पर गंभीर सवाल।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
मध्य प्रदेश के खेती किसानी और उद्योग के इतिहास में शायद ही इससे खराब सौदा कभी सामने आया हो, जिसमें उद्योगपति की तो मौज हो जाए और किसान की किस्मत फूट जाए। इस नए तरह के सौदे में उद्योगपति लीज रेंट देकर 40 साल तक किसान की जमीन को खोद खोद कर मौज करेगा और म्याद पूरी होने के बाद जब खदान बन चुकी जमीन किसान को वापस करेगा तो वह खेती तो छोड़िये अन्य किसी काम की नहीं होगी।
सतना जिले में यह पूरा खेल मशहूर उद्योग समूह डालमिया ग्रुप के इर्द-गिर्द घूम रहा है। आरोप है कि कंपनी के कर्ताधर्ता ऐसी शर्तों पर माइनिंग के लिए जमीन लेने की तैयारी में हैं।
जिले के रामपुर बाघेलान तहसील के जमुना, जनार्दनपुर, बैरिहा, पटरहाई, पगरा, झिरिया बाजपेयी, झिरिया कोठार और झिरिया कोपरिहान सहित कई ग्राम पंचायतों की उपजाऊ कृषि भूमि पर 40 वर्षों की माइनिंग लीज पर डालमिया को देने के प्रस्ताव पर तेजी से काम हो रहा है। खनिज अधिकारी के 4 फरवरी 2026 के प्रतिवेदन और उसके आधार पर एसडीएम द्वारा जारी नोटिस के अनुसार, तहसील क्षेत्र में कुल 910.384 हेक्टेयर भूमि को खनन प्रयोजन के लिए स्वीकृति प्रक्रिया में शामिल किया गया है। यह प्रस्ताव मेसर्स डालमिया के पक्ष में तैयार किया गया है। प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार तीन हजार से अधिक किसानों की निजी कृषि भूमि इस दायरे में आती है। प्रस्ताव के मुताबिक यह जमीन खनिज (परमाणु एवं हाइड्रोजन ऊर्जा खनिजों से भिन्न) रियायत नियम, 2016 के तहत लीज पर दी जाएगी और इसके बदले वार्षिक भूतल प्रतिकर यानी सालाना सरफेस कंपंसेशन दिया जाएगा।
ऐसे समझें मुआवजे का गणित
उदाहरण के तौर पर यदि जमीन का बाजार मूल्य 10 लाख रुपये प्रति एकड़ हो और दो गुना गुणक लागू किया जाए, तो राशि 20 लाख रुपये होती है। उस पर 100 प्रतिशत सोलैटियम जोड़ने के बाद कुल मुआवजा 40 लाख रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच सकता है। इसके अतिरिक्त फसल, पेड़, मकान और अन्य क्षति का भुगतान अलग से किया जाता है। विशेषज्ञों का आरोप है कि यदि जमीन को अधिग्रहण कानून के तहत लेने के बजाय वार्षिक प्रतिकर मॉडल अपनाया जाता है, तो किसानों को एकमुश्त और कानूनी रूप से संरक्षित मुआवजे से वंचित किया जा सकता है। क्या यह मॉडल उद्योगों को सुविधा देने और कानूनी जटिलताओं से बचने का रास्ता है? यह प्रश्न अब खुलकर उठने लगा है।
जनप्रतिनिधि का मौन क्यों
प्रशासन की इस हिटलरशाही से किसान हैरान परेशान है। शासन-प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं, आवेदन दे रहे हैं, आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं। लेकिन उनकी पीड़ा को नहीं सुना जा रहा है। चौंकाने वाली बात सत्ता पक्ष ही नहीं, विपक्षी विधायक भी इस मुद्दे पर चुप हैं।
इन गांवों की इतनी जमीन?
मौजा जमुना की 89.234 हेक्टेयर भूमि में से 17.977 हेक्टेयर, जनार्दनपुर, बैरिहा और पटरहाई की 575.830 हेक्टेयर में से 341.901 हेक्टेयर तथा पगरा, झिरिया बाजपेयी, झिरिया कोठार और झिरिया कोपरिहान की 245.320 हेक्टेयर में से 161.253 हेक्टेयर भूमि को इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है। यह वही क्षेत्र है जहां दशकों से कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है।
बड़ा सवाल, 40 साल का उपयोग, लेकिन अधिग्रहण नहीं ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जमीन पर चार दशक तक खनन गतिविधि होगी, तब उसे स्थायी अधिग्रहण के दायरे में क्यों नहीं लाया जा रहा? वार्षिक भूतल प्रतिकर मूलत: सालाना किराये जैसा प्रावधान है। विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि क्या 40 वर्षों तक खेत की मिट्टी, जलस्रोत और उत्पादकता पर प्रभाव पड़ने के बाद भी इसे अस्थायी उपयोग कहा जा सकता है? कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेती एक सतत आय का स्रोत है। यदि खेत खनन में चले जाते हैं तो किसान अपनी परंपरागत आजीविका से वंचित हो जाएगा। मिट्टी की उर्वरता, भूजल स्तर और पर्यावरणीय संतुलन पर दीर्घकालिक असर की आशंका भी जताई जा रही है। 40 वर्ष बाद भूमि की वास्तविक पुनर्स्थापना कैसे होगी, इस पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
अधिग्रहण कानून से दूरी मुआवजा से बचने की वजह?
औद्योगिक परियोजनाओं के लिए सामान्यत: भूमि अधिग्रहण राइट टू फेयर कंपंशेसन एंड ट्रांसपेरेंसी इन लैंड एक्विजीशन, रिहैबिलेशन एंड री-सेटलमेंट एक्ट (आरएफसीएलएआरआर एक्ट ) के तहत किया जाता है। इस कानून में बाजार मूल्य तय कर उस पर ग्रामीण क्षेत्रों में 1 से 2 गुना गुणक लगाया जाता है और फिर 100 प्रतिशत सोलैटियम जोड़ा जाता है। इसके साथ पुनर्वास और पुनर्स्थापन के प्रावधान भी अनिवार्य हैं।

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