सतना जिले में कुपोषण का संकट फिर उजागर हुआ है। नागौद क्षेत्र के पनास आंगनवाड़ी केंद्र में स्वास्थ्य जांच के दौरान 7 बच्चे अति गंभीर कुपोषित पाए गए। चार माह पहले मझगवां क्षेत्र में मासूम रजा हुसैन की मौत के बाद भी जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग से लेकर स्वास्थ्य अमले तक की लापरवाही जारी है। आंकड़े बताते हैं कि सतना के 125 से अधिक आंगनवाड़ी केंद्रों में कुपोषण का स्तर सरकारी मानकों से कई गुना अधिक है। योजनाओं और बजट के बावजूद नतीजे नहीं दिख रहे, जिम्मेदार अधिकारी अब भी मौन हैं।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
विकास के तमाम दावों के बीच विंध्य की धरती सतना पर कुपोषण का दंश अब भी जिंदा है। चार माह के मासूम रजा हुसैन की मौत का दर्द अभी ताजा ही था कि नागौद क्षेत्र के पनास आंगनवाड़ी केंद्र में स्वास्थ्य जांच के दौरान 7 बच्चे अति गंभीर कुपोषित पाए गए। कुल 19 बच्चों की जांच में 36 फीसदी बच्चों का कुपोषण की श्रेणी में होना इस बात का प्रमाण है कि जिला प्रशासन से लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग तक, सभी के प्रयास सिर्फ कागजों तक सिमटकर रह गए हैं। यह आंकड़ा सिर्फ एक केंद्र का नहीं, बल्कि जिलेभर की जमीनी सच्चाई का आइना है। बताया गया है कि जिले की विभिन्न परियोजनाओं के करीब 125 आंगनवाड़ी केंद्रों में कुपोषण का स्तर शासन द्वारा निर्धारित मानक से कहीं अधिक है। जिले का मझगवां विकासखंड तो वर्षों से कुपोषण के लिए कुख्यात रहा है यही वह क्षेत्र है जिसने कभी सुप्रीम कोर्ट तक को झकझोर दिया था। तब से लेकर अब तक सरकार ने योजनाओं की झड़ी लगा दी, बजट बढ़ा दिया, लेकिन नतीजे आज भी अपेक्षित परिणाम सामने नही आ सके हैं। सतना में कुपोषण कोई नया विषय नहीं है, बल्कि यह वर्षों से जिले के माथे पर लगा कलंक है। हर साल योजनाएं बनती हैं, मीटिंगें होती हैं, बजट स्वीकृत होता है , लेकिन जमीनी नतीजे हमेशा निराशाजनक रहते हैं। यह केवल महिला एवं बाल विकास विभाग की नहीं, बल्कि पूरे जिला प्रशासन की सामूहिक नाकामी है। कुपोषण से मरते बच्चे इस बात का प्रतीक हैं कि शासन की नीतियां और तंत्र के बीच कहीं न कहीं गहरी खाई है। सरकार की मंशा अच्छी हो सकती है, मगर क्रियान्वयन में हो रही अनियमितताएं और जिम्मेदारों की चुप्पी ही इस कलंक को मिटने नहीं दे रही हैं।
आंगनवाड़ियों में सामग्रियों में अनियमितता, बच्चों तक नहीं पहुंच रहा पोषण आहार
पनास आंगनवाड़ी केंद्र में मिले सात कुपोषित बच्चों ने प्रशासनिक तंत्र की निष्क्रियता को फिर से उजागर कर दिया है। सवाल उठता है कि आखिर इन बच्चों तक सुपोषण आहार पहुंच क्यों नहीं पाया? सूत्र बताते हैं कि कई केंद्रों में पोषण आहार का वितरण केवल दिखावे के लिए किया जाता है। कई जगह कार्यकर्ता और सहायिकाएं आहार को खुद खपा देती हैं, जिससे बच्चों को पोषक तत्वों से वंचित रहना पड़ता है। नियमों के अनुसार, किसी भी आंगनवाड़ी केंद्र में कुपोषण की दर 6.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। मगर हकीकत यह है कि कई केंद्रों में यह आंकड़ा 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यदि जिलेभर के सभी आंगनवाड़ी केंद्रों की जांच कराई जाए, तो यह संख्या और भयावह रूप ले सकती है। यह लापरवाही केवल सरकारी धन के दुरुपयोग की कहानी नहीं कहती, बल्कि यह उन मासूमों के जीवन से खिलवाड़ है जिनके संरक्षण का वादा खुद सरकार ने किया था।
जिम्मेदार अफसर क्यों बचे?
मझगवां विकासखंड के मरवा गांव में चार माह के अति कुपोषित शिशु हुसैन रजा की मौत ने पूरे जिले को झकझोर दिया है, लेकिन जिला प्रशासन की कार्रवाई पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि क्या जिम्मेदार अफसरों को बचाने के लिए निर्दोष कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया गया? सूत्रों के अनुसार, जिला प्रशासन ने घटना के बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शकुन गौतम व दो आशा कार्यकर्ताओं उर्मिला सतनामी और प्रियंका श्रीवास्तव को सेवा से हटा दिया, जबकि शकुन गौतम उस क्षेत्र में पदस्थ ही नहीं थीं। वे ग्राम पंचायत मरवा-गोरसरी में तैनात थीं और तत्कालीन परियोजना अधिकारी हेमंत सिंह के मौखिक आदेश पर नयागांव क्षेत्र में कार्य कर रही थीं। विडंबना यह है कि मृतक शिशु का निवास क्षेत्र नयागांव वार्ड क्रमांक 10 आज तक किसी भी आंगनवाड़ी केंद्र के अधीन नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है — जब क्षेत्र में कोई आंगनवाड़ी केंद्र ही नहीं था, तो कार्यकर्ता को दोषी ठहराने का आधार क्या था? और परियोजना अधिकारी, जिनकी सीधी जिम्मेदारी बनती थी, उन पर मात्र सात दिन का वेतन काटकर औपचारिकता क्यों निभाई गई?
चिन्हांकन में भी भारी लापरवाही, कई बच्चे प्रशासन की नजरों से ओझल
कुपोषण की समस्या केवल आहार की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के सही चिन्हांकन में भी गंभीर त्रुटियां हैं। मझगवां विकासखंड के रामनगर खोखला और पड़मनिया जागीर जैसे गांवों में कभी व्यापक कुपोषण था। प्रशासन ने कुछ समय तक फोकस किया तो हालात में थोड़ा सुधार हुआ, लेकिन अब भी कई ऐसे गांव हैं जहां बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और हैरत की बात यह है कि उन्हें चिन्हित तक नहीं किया गया है। मैदानी अमले की जिम्मेदारी है कि वे कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें पोषण पुनर्वास केंद्रों में भर्ती कराएं। लेकिन यह अमला पूरी तरह निष्क्रिय है। चिन्हांकन के बाद भी न तो बच्चों को उपचार मिल रहा है, न ही कोई फॉलोअप। इसका सीधा मतलब है कि जिन योजनाओं पर सरकार हर साल लाखों रुपये खर्च कर रही है, वे जमीन पर दम तोड़ रही हैं।
मैदानी अमला निष्क्रिय
सतना व मैहर जिले में वर्तमान में 3 हजार से अधिक आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हैं, जिनमें तकरीबन 1900 के पास भवन हैं जबकि शेष जुगाड़ या किराए के भवनों में संचालित हैं। से अधिक कार्यकर्ता और सहायिकाएं तैनात हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग में 2300 से अधिक आशा कार्यकर्ता भी कार्यरत हैं। इन सभी को कुपोषित बच्चों को चिन्हित कर अस्पताल में भर्ती कराने की जिम्मेदारी दी गई है। मगर नतीजा सबके सामने है ,मैदानी अमला निष्क्रिय, और जिम्मेदार अधिकारी मौन। सवाल यह है कि जब सरकार की ओर से पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण और बजट दिया जा रहा है, तो फिर नतीजे क्यों नहीं दिख रहे? क्या यह बजट केंद्र से लेकर गांव तक पहुंचते-पहुंचते खप जाता है? यह वही पुरानी बीमारी है जिसमें राशन तो निकलता है, पर लाभार्थी तक नहीं पहुंचता।
बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम हैं प्रभावित इलाके
चित्रकूट विधानसभा का मझगवां क्षेत्र, नागौद का परसमानिया और मैहर का भदनपुर ये तीनों इलाके कुपोषण के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं की कमी से भी जूझ रहे हैं। यहां सड़कें टूटी हैं, एंबुलेंस की पहुंच नहीं है, पानी की स्थिति दयनीय है। बीमार पड़ने पर ग्रामीणों को अब भी मरीजों को खटिया में लादकर अस्पताल तक ले जाना पड़ता है। ऐसे क्षेत्रों में न तो स्वास्थ्य विभाग की टीम नियमित जाती है, न ही महिला एवं बाल विकास का अमला। परिणामस्वरूप सरकार की योजनाएं इन इलाकों तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन बच्चों के नाम पर योजनाएं बनाई जाती हैं, वही बच्चे सरकारी आंकड़ों में कहीं गुम हो जाते हैं।

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