सतना और मैहर वनमण्डल में गिद्ध संरक्षण को लेकर प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि डाइक्लोफेनिक जैसी दवाओं से गिद्धों की संख्या तेजी से घटी। अब सुरक्षित दवाओं और गणना अभियान के जरिए संरक्षण प्रयास तेज किए जा रहे हैं।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
पर्यावरण संतुलन और जैव विविधता की रक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले गिद्धों के संरक्षण को लेकर वन विभाग ने तैयारी तेज कर दी है। आगामी 22, 23 और 24 मई को होने वाली गिद्ध गणना के पहले रविवार को वनमण्डल सतना के विंध्य हाल में एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। इसमें सतना और मैहर वनमण्डल के बीट गार्ड, परिक्षेत्र सहायक तथा वन परिक्षेत्र अधिकारियों को गिद्धों की पहचान, उनके रहन-सहन, प्रजनन और संरक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई।
गिद्ध विशेषज्ञ ने दिया प्रशिक्षण
प्रशिक्षण शिविर में गिद्ध विशेषज्ञ दिलशेर खान ने बताया कि मध्यप्रदेश में कई प्रजातियों के गिद्ध पाए जाते हैं, जिनमें लंबी चोंच वाले, सफेद पीठ वाले और मिस्री गिद्ध प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि गिद्ध प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण सफाईकर्मी हैं। ये मृत पशुओं को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं और सड़ांध से फैलने वाली कई गंभीर बीमारियों को रोकने में मदद करते हैं। इसी वजह से इन्हें पर्यावरण का सफाई मित्र भी कहा जाता है। खान ने बताया कि लगभग दो दशक पहले तक गांवों और जंगलों में बड़ी संख्या में गिद्ध दिखाई देते थे, लेकिन पशुओं के इलाज में उपयोग होने वाली डाइक्लोफेनिक दवा ने इनकी आबादी को बुरी तरह प्रभावित किया। जब किसी पशु को यह दवा दी जाती थी और उसकी मृत्यु हो जाती थी, तब उस मृत पशु को खाने वाले गिद्धों के शरीर में दवा का विषैला प्रभाव पहुंचता था। इससे उनके किडनी फेल होने लगे और बड़ी संख्या में गिद्ध मरने लगे। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कई क्षेत्रों में गिद्ध लगभग गायब हो गए।
मेलॉक्सिकेम के उपयोग को बढ़ावा
गिद्धों की लगातार घटती संख्या को देखते हुए सरकार ने डाइक्लोफेनिक, कीटोप्रोफेन, निमूसलाइड और एसाइक्लोफेनक जैसी दवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। अब पशु उपचार में मेलॉक्सिकेम दवा के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसे गिद्धों के लिए सुरक्षित माना जाता है। प्रशिक्षण के दौरान वन अमले को इन दवाओं के प्रभाव और गिद्ध संरक्षण के वैज्ञानिक पहलुओं की भी जानकारी दी गई।
ये बारीकियां बताई
शिविर में अधिकारियों को यह भी बताया गया कि गिद्ध गणना के दौरान किस प्रकार घोंसलों, पहाड़ी क्षेत्रों, नदी किनारों और बड़े पेड़ों के आसपास सर्वे किया जाएगा। गिद्धों की संख्या, उनकी प्रजाति, आवास और गतिविधियों का रिकॉर्ड तैयार कर वन विभाग आगे की संरक्षण रणनीति बनाएगा। कार्यक्रम में जिला अस्पताल के पशु चिकित्सक बृहस्पति भारती ने पशु चिकित्सा में सुरक्षित दवाओं के उपयोग पर जानकारी दी। वहीं उप वनमण्डल अधिकारी अभिषेक तिवारी और वनमण्डल अधिकारी मयंक चांदीवाल ने वन अमले को गिद्ध संरक्षण को गंभीरता से लेने और गणना कार्य को पूरी सावधानी से संपन्न कराने के निर्देश दिए।
तीन रेंज में बढ़िया आबादी
वन विभाग के अनुसार सतना जिले के चित्रकूट, बरौंधा और उचेहरा क्षेत्र में आज भी अच्छी संख्या में गिद्ध पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में पहाड़ी और वन क्षेत्र गिद्धों के लिए अनुकूल माने जाते हैं। विभाग लगातार इनके संरक्षण, सुरक्षित आवास और भोजन उपलब्धता को लेकर काम कर रहा है ताकि आने वाले वर्षों में गिद्धों की संख्या फिर से बढ़ाई जा सकती है।

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