मध्यप्रदेश में जल्द ही संघ के आह्वान का असर दिखेगा। जिसका सबसे ज्यादा फायदा सरकारी कर्मचारियों को मिलेगा। दिवाली से पहले राज्य सरकार तोहफा देने जा रही है। जी हां... मध्यप्रदेश सरकार सरकारी नौकरियों में लागू दो बच्चों की शर्त को खत्म करने जा रही है।

मध्यप्रदेश सरकार सरकारी नौकरियों में लागू दो बच्चों की शर्त को खत्म करने जा रही है।

भोपाल। स्टार समाचार वेब
मध्यप्रदेश में जल्द ही संघ के आह्वान का असर दिखेगा। जिसका सबसे ज्यादा फायदा सरकारी कर्मचारियों को मिलेगा। दिवाली से पहले राज्य सरकार तोहफा देने जा रही है। जी हां... मध्यप्रदेश सरकार सरकारी नौकरियों में लागू दो बच्चों की शर्त को खत्म करने जा रही है। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने एक माह पूर्व जनसंख्या नीति पर विचार रखते हुए आह्वान किया था कि भारत की जनसंख्या नीति 2.1 है, यानी औसतन तीन बच्चे होना चाहिए। इससे अधिक बच्चे नहीं होने चाहिए, क्योंकि इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। इधर, संघ प्रमुख के बयान के बाद ही दो बच्चों की सीमा हटाने की प्रक्रिया को गति मिली और नीति में बदलाव होने जा रहा है। मध्यप्रदेश के पड़ोसी राज्य राजस्थान और छत्तीसगढ़ पहले ही यह पाबंदी हटा चुके हैं। राजस्थान ने 11 मई 2016 और छत्तीसगढ़ ने 14 जुलाई 2017 को यह पाबंदी हटा दी। अब वहां तीन बच्चों पर भी नौकरी में लोग काम कर रहे हैं।
शासकीय नौकरी में दो बच्चों की पाबंदी की शर्त दो शदक बाद हटने जा रही है। मप्र सरकार 26 जनवरी 2001 में लागू हुई इस शर्त को जल्द ही खत्म करने वाली है। इसकी लगभग तैयारी हो गई है। जल्द ही इस प्रस्ताव को कैबिनेट में लाया जाएगा। शर्त हटने के बाद यदि नौकरी कर रहे किसी अधिकारी या कर्मचारी का तीसरा बच्चा भी हुआ तो उन्हें नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकेगा।
तमाम परिस्थितियों का आंकलन करने के बाद अब जाकर उच्च स्तर पर यह सहमति बन गई है कि कैबिनेट में ले जाकर इस शर्त को हटा दिया जाए। बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अलग-अलग स्तरों पर कई बार राज्य को यह संकेत देता रहा है।
प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी जैसे ही मिल जाएगी, वैसे ही तीसरी संतान से जुड़े जितने भी केस न्यायालयों या विभागीय जांचों में लंबित हैं, उन्हें स्वत: समाप्त मान लिया जाएगा। इन पर अब कोई कार्रवाई नहीं होगी। हालांकि 2001 के बाद जिन शासकीय सेवकों पर तीसरी संतान के आधार पर कार्रवाई हो चुकी है या वे नौकरी से बाहर किए जा चुके हैं, उन मामलों पर कोई सुनवाई नहीं होगी।
सबसे ज्यादा शिकायतें मेडिकल, हेल्थ, स्कूल शिक्षा, और उच्च शिक्षा विभाग से जुड़ी हैं। अनुमान है कि ऐसे मामलों की संख्या 8 से 10 हजार के बीच हो सकती है। मेडिकल शिक्षा की 12 शिकायतें तो सामान्य प्रशासन विभाग तक पहुंच गईं, जिन पर फैसला होना है। पूर्व में एक जज तक की नौकरी दो संतान की पाबंदी की वजह से जा चुकी है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019-20 की रिपोर्ट के मुताबिक मप्र की प्रजनन दर 2.9 है। शहरी क्षेत्रों में 2.1 और ग्रामीण क्षेत्रों में 2.8 के करीब। राष्ट्रीय औसत 2.1 से यह अधिक है। वहीं मप्र की राजधानी भोपाल की प्रजनन दर सबसे कम है। यह 2.0 है। अधिक दर वाले जिलों में पन्ना (4.1), शिवपुरी (4.0) और बड़वानी (3.9) है।
बिहार 3.0
मप्र 2.9
मेघालय 2.9
यूपी 2.4
झारखंड 2.3
मणिपुर 2.2


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