प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में संगठन ने जिन नेताओं पर सबसे अधिक भरोसा किया गया, वे अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। पढ़िए विश्लेषण

विश्लेषण सुशील शर्मा
दतिया विधानसभा उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट की हार-जीत नहीं, बल्कि दोनों दलों की चुनावी रणनीतियों का आईना बनकर सामने आया। सत्ताधारी दल भाजपा के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं। पहली, पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने के बाद उनके समर्थकों को भाजपा के साथ मजबूती से बनाए रखना और दूसरी, पिछले चुनाव में नरोत्तम को लगभग 7,600 वोटों की हार के अंतर को जीत में बदलना। इन दोनों चुनौतियों से निपटने के लिए भाजपा ने संगठन और सरकार के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ युवा पदाधिकारियों को भी जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन परिणाम बताते हैं कि रणनीति ठीक होते हुए भी जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी निभाने में सफल नहीं रहे।।
भाजपा से अपेक्षा थी कि वह विजयपुर विधानसभा उपचुनाव की हार से सबक लेकर दतिया में अधिक प्रभावी चुनाव प्रबंधन करेगी। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में संगठन ने जिन नेताओं पर सबसे अधिक भरोसा किया गया, वे अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। चुनाव प्रभारी भारत सिंह कुशवाह, सह प्रभारी राहुल कोठारी, उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, संस्कृति राज्यमंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी सहित सरकार और संगठन के कई वरिष्ठ नेताओं की सक्रिय मौजूदगी के बावजूद भाजपा चुनाव अपने पक्ष में नहीं कर सकी। स्वाभाविक है कि अब पार्टी इस हार की समीक्षा करेगी और जिम्मेदारी भी तय करेगी।
दूसरी ओर कांग्रेस ने वही रणनीति अपनाई जिसने उसे विजयपुर में सफलता दिलाई थी। पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को लेकर सहानुभूति की राजनीति करने के बजाय कांग्रेस ने दतिया राजघराने के घनश्याम सिंह पर भरोसा जताया। घनश्याम सिंह पहले भी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और उनकी सहज एवं सरल छवि का लाभ कांग्रेस को मिला। कांग्रेस ने भी अपने वरिष्ठ नेताओं और विधायकों को मैदान में उतारा, लेकिन रणनीति यही थी कि चुनाव प्रचार का चेहरा स्थानीय नेतृत्व रहेगा। वरिष्ठ नेताओं की भूमिका बूथ प्रबंधन, संगठनात्मक समन्वय और चुनाव की निगरानी तक सीमित रही। सिद्धार्थ कुशवाह, लखन सिंह, महेश परमार, जयवर्धन सिंह, प्रियव्रत सिंह, पंकज उपाध्याय, प्रवीण पाठक सहित अन्य नेताओं ने इसी रणनीति के अनुरूप काम किया।
चुनाव परिणाम यह भी बताते हैं कि भाजपा अपने पारंपरिक वोटों को पूरी तरह संभाल नहीं सकी। पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में भाजपा को लगभग 20 हजार वोटों का नुकसान हुआ, जबकि कांग्रेस के मतों में भी करीब 22,200 वोटों की कमी आई। इस चुनाव में आजाद पार्टी के दामोदर सिंह ने भी समीकरण बिगाड़ा। यदि वे मैदान में नहीं होते तो परिणाम अलग भी हो सकता था। संभव है भाजपा जीत जाती, यह भी संभव है कि हार का अंतर और बढ़ जाता। इससे पहले के 2 चुनावों में दतिया में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है। वर्ष 2013 में कालीचरण कुशवाह लगभग 20 हजार वोट लेकर कांग्रेस के जीत के समीकरण को पलट दिया था और उस चुनाव में नरोत्तम मिश्रा ने लगभग 12 हजार से अधिक मतों से जीत दर्ज की थी।
भाजपा के प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के लिए यह पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी। वे दतिया के लिए पूरी तरह नए नहीं थे और संगठन मंत्री के रूप में काम भी कर चुके थे, लेकिन चुनाव में उन्हें "बाहरी" होने का मुद्दा झेलना पड़ा, जिसे विरोधियों से ज्यादा अपनों ने उछाला। यदि वे यह चुनाव जीत जाते तो संगठन और राजनीति दोनों में उनकी स्थिति और मजबूत होती। अब पहली हार उनके लिए भी एक बड़ा राजनीतिक सबक होगी।
दतिया का परिणाम ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भाजपा के सामने खड़ी नई चुनौती की ओर भी संकेत करता है। आश्चर्य की बात यह है कि इस क्षेत्र से भाजपा के कई बड़े और प्रभावशाली नेता आते हैं, फिर भी लगातार दूसरे उपचुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। यह परिणाम मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, दोनों के लिए गंभीर समीक्षा का विषय है। उपचुनावों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का जीत का प्रतिशत इस हार के बाद प्रभावित हुआ है और अब संगठन तथा सरकार दोनों को अपनी चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा।
भाजपा निश्चित रूप से इस हार का सूक्ष्म विश्लेषण करेगी, लेकिन यदि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचना है तो पार्टी को चुनावी जिम्मेदारियां ऐसे निष्ठावान, सक्रिय, आक्रामक और परिणाम देने वाले नेताओं को सौंपनी होंगी जो अंतिम बूथ तक संगठन को जीवंत रख सकें और हाँ, इस हार के जिम्मेदारों और जिन लोगों ने इस चुनाव में प्रबंधन व दिए गए दायित्व में लापरवाही बरती उन पर भी सख्त कार्रवाई करके जनता और कार्यकर्ताओं को संदेश देना होगा।

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हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से
जिस समाज में भगवान के घर में चोरी करने वाला हाथ नहीं कांपता, वहां चिंता चोरी की राशि से अधिक उस संस्कार की होनी चाहिए, जिसकी मृत्यु चुपचाप हमारे सामने हो रही है।