सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कम मतदान भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी के लिए चुनौती बनेगा या कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम के लिए अवसर? यदि पिछले तीन उपचुनावों का रिकॉर्ड देखा जाए तो तस्वीर काफी दिलचस्प दिखाई देती है।

- सुशील शर्मा
मध्य प्रदेश की राजनीति में उपचुनावों का गणित हमेशा सामान्य चुनावों से अलग रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह मतदान प्रतिशत में आने वाला बदलाव है। उपचुनावों में मतदाताओं का उत्साह अपेक्षाकृत कम रहता है और कम मतदान अक्सर राजनीतिक विश्लेषकों के लिए सबसे कठिन पहेली बन जाता है। आम तौर पर माना जाता है कि अधिक मतदान सत्ता पक्ष के पक्ष में माहौल का संकेत देता है, जबकि कम मतदान मतदाताओं की चुप्पी और असंतोष, दोनों की संभावना पैदा करता है। ऐसे में यह समझना आसान नहीं होता कि कम वोटिंग आखिर किसके पक्ष में जाएगी।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में यह चौथा विधानसभा उपचुनाव है और एक रोचक संयोग यह है कि पिछले तीनों उपचुनावों की तरह दतिया में भी मतदान सामान्य विधानसभा चुनाव की तुलना में कम हुआ है। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कम मतदान भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी के लिए चुनौती बनेगा या कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम के लिए अवसर? यदि पिछले तीन उपचुनावों का रिकॉर्ड देखा जाए तो तस्वीर काफी दिलचस्प दिखाई देती है।
सबसे पहला उपचुनाव बुधनी विधानसभा में हुआ था, जहाँ पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सांसद बनने के बाद सीट खाली हुई। भाजपा ने शिवराज समर्थक रमाकांत भार्गव को उम्मीदवार बनाया। 2023 के विधानसभा चुनाव की तुलना में यहाँ मतदान लगभग 7.52 प्रतिशत कम रहा। कम मतदान का असर भाजपा की जीत के अंतर पर साफ दिखाई दिया। एक लाख से अधिक मतों की बढ़त घटकर लगभग बीस हजार के भीतर सिमट गई, हांलाकि भाजपा सीट बचाने में सफल रही।
इसके बाद कमलनाथ के प्रभाव वाले छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा विधानसभा में उपचुनाव हुआ। कांग्रेस विधायक कमलेश शाह के भाजपा में शामिल होने के बाद हुए इस उपचुनाव में भी मतदान करीब 10.92 प्रतिशत कम रहा। इसके बावजूद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में सफल रहे और कमलेश शाह विजयी हुए। इसे भाजपा की महत्वपूर्ण राजनीतिक सफलता माना गया।
तीसरा उपचुनाव विजयपुर विधानसभा में हुआ, जहाँ कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत भाजपा में शामिल हो गए थे। भाजपा ने उन्हें ही प्रत्याशी बनाया। यहां मतदान सामान्य चुनाव की तुलना में करीब 3.48 प्रतिशत कम रहा और भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस हार के पीछे स्थानीय समीकरणों और ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के नेताओं की आंतरिक प्रतिस्पर्धा को भी एक बड़ा कारण माना।
अब बारी दतिया की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल का यह चौथा उपचुनाव पूरे प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की भी निगाहों में है। इस बार भाजपा ने 2023 का विधानसभा चुनाव हार चुके अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को मैदान में उतारने के बजाय संगठन के कार्यकर्ता आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। यह निर्णय अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश था कि पार्टी इस चुनाव को केवल किसी एक चेहरे के भरोसे नहीं, बल्कि संगठन की सामूहिक ताकत के आधार पर लड़ना चाहती है। वहीं कांग्रेस ने घनश्याम को उम्मीदवार बनाया। दतिया में भी मतदान सामान्य विधानसभा चुनाव की तुलना में लगभग 9 प्रतिशत कम रहा है। यही कारण है कि परिणाम को लेकर किसी भी राजनीतिक विश्लेषक ने स्पष्ट भविष्यवाणी करने से परहेज़ किया है। कम मतदान भाजपा के संगठित वोट बैंक के पक्ष में जाएगा या कांग्रेस के शांत मतदाता मतदान केंद्र तक पहुँचे। इसका जवाब अब मतगणना ही देगी।
हालाँकि पिछले तीन उपचुनावों का रिकॉर्ड यह भी बताता है कि कम मतदान अपने आप में किसी एक दल की जीत या हार की गारंटी नहीं है। डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा ने कम मतदान के बावजूद तीन में से दो उपचुनाव जीते हैं ।
दतिया का चुनाव इसलिए भी अलग है क्योंकि इसमें डॉ. नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक प्रभाव एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है। भाजपा ने चुनाव को पूरी ताकत से लड़ा। स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मोर्चा संभाला, वहीं संगठन के वरिष्ठ रणनीतिकार शिवप्रकाश और अजय जामवाल भी लगातार सक्रिय रहे। इसलिए यह चुनाव केवल दो प्रत्याशियों के बीच मुकाबला नहीं, बल्कि भाजपा के संगठन और चुनावी रणनीति की भी एक महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है।
अब सारी निगाहें मतगणना पर हैं। कम मतदान का रहस्य किसके पक्ष में खुलता है? क्या भाजपा के आशुतोष तिवारी बाज़ी मारेंगे या कांग्रेस के घनश्याम जीत दर्ज करेंगे? इसका उत्तर कुछ ही घंटों में ईवीएम से मिल जाएगा।

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