2021 से 2025 तक जब 20% तक एथेनॉल मिलाया जा रहा था, तब कोई विरोध नहीं हुआ। अब संसद सत्र से ठीक पहले विरोध का माहौल बनाया जा रहा है, जिसके पीछे विदेशी ताकतें और ऑयल लॉबी का हाथ है।

भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. साईं रेड्डी से बातचीत
एथेनॉल नीति पर बढ़ता विवाद हो, सरकारी खरीद में अव्यवस्था या फिर उर्वरक सब्सिडी का मुद्दा—देश में कृषि और किसानों से जुड़े विषय हमेशा केंद्र में रहते हैं। भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. साईं रेड्डी ने संगठन के रुख, मुरैना शुगर फैक्ट्री विवाद, एफपीओ व्यवस्था में कमियों और केंद्र सरकार की कृषि नीतियों पर खुलकर अपनी बात रखी। प्रस्तुत है स्टार समाचार से की विशेष बातचीत के प्रमुख अंश....
सवाल: देश में एथेनॉल को लेकर काफी विरोध और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। आपका संगठन एथेनॉल के पक्ष में क्यों है?
जवाब: हम किसान हित और देश हित को सर्वोपरि मानते हैं। 2014 से पेट्रोल में एथेनॉल मिक्सिंग का निर्णय इसलिए लिया गया ताकि विदेशों से आने वाले महंगे पेट्रोल पर निर्भरता और विदेशी मुद्रा का खर्च कम हो सके। सरकार ने एथेनॉल बनाने वाली शुगर इंडस्ट्रीज और कोऑपरेटिव्स को रियायती दर पर लोन और मॉरेटोरियम की सुविधाएं दी हैं। इससे किसानों को उनके उत्पाद जैसे गन्ना, मक्का आदि का सही और समय पर मूल्य मिलता है। रही बात गाड़ियों के खराब होने की, तो एथेनॉल मिक्सिंग ही एकमात्र कारण नहीं है; गाड़ी खराब होने के अनेक तकनीकी कारण होते हैं। 2021 से 2025 तक जब 20% तक एथेनॉल मिलाया जा रहा था, तब कोई विरोध नहीं हुआ। अब संसद सत्र से ठीक पहले विरोध का माहौल बनाया जा रहा है, जिसके पीछे विदेशी ताकतें और ऑयल लॉबी का हाथ है। हमने सरकार से कहा है कि ऐसी गाड़ियां बनाई जाएं जो 100% एथेनॉल से चल सकें।
सवाल: लोग आरोप लगा रहे हैं कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के परिवार की फैक्ट्रियां एथेनॉल से करोड़ों रुपये कमा रही हैं। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
जवाब: यह बात बिल्कुल गलत है। नितिन गडकरी की को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री है। यह अवसर सबके लिए खुला है; कोई भी फैक्ट्री लगा सकता है। मध्य प्रदेश सरकार से भी बात हुई है कि यहाँ गेहूं और मूंग का उत्पादन अधिक है, इसलिए एथेनॉल उत्पादन के लिए 1 लाख हेक्टेयर तक का डायवर्जन होना चाहिए। गडकरी जी ने तो 100% एथेनॉल से चलने वाला व्हीकल भी लॉन्च करवाया है।
सवाल : आप मुरैना क्यों गए थे? वहाँ की को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री की नीलामी रोकने का प्रयास आपने क्यों किया?
जवाब : वह फैक्ट्री को-ऑपरेटिव शेयर होल्डर्स (किसान शेयरधारकों) की है, सरकार की नहीं। 60 साल पहले किसानों ने ₹100 और ₹1000 का अंशदान देकर वह फैक्ट्री खड़ी की थी। 500 करोड़ की फैक्ट्री और जमीन को एमएससीएम (MSCM) के जरिए केवल 60 करोड़ में उद्योगपतियों को बेचा जा रहा था। हमने इस नीलामी प्रक्रिया का कड़ा विरोध किया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से बात होने के बाद सरकार ने नीलामी रोक दी है और किसानों को उनका हक देने का फैसला किया है।
सवाल : जब सीहोर और मध्य प्रदेश की अन्य शुगर फैक्ट्रियां बर्बाद हो रही थीं, तब किसान संघ कहां था?
जवाब: मैं 2024 में अध्यक्ष बना हूँ। भारतीय किसान संघ किसानों के साथ खड़ा है। हम सीहोर और गुना की फैक्ट्रियों के मामले को भी देखेंगे। यदि किसान गन्ना पैदावर के लिए तैयार हैं, तो हम प्राइवेट या को-ऑपरेटिव- जिस भी मॉडल में संभव होगा, शुगर फैक्ट्रियां वापस लाएंगे।
सवाल: क्या भारतीय किसान संघ भाजपा का अंग है या उसकी छत्र छाया में काम करता है? आप सरकार पर किसानों की मांगों के लिए दबाव क्यों नहीं बनाते?
जवाब: भारतीय किसान संघ एक पूरी तरह गैर-राजनीतिक संगठन है। वह भाजपा का अंग नहीं हैं; भाजपा के पास अपना किसान मोर्चा है। हमारा सिद्धांत है—पहले देश हित, फिर किसान हित, फिर हमारा हित। हम सरकार पर पूरा दबाव बनाते हैं। उज्जैन में जब भू-अर्जन से जुड़ा कानून लाया गया, तो हमने कड़ा विरोध किया और मुख्यमंत्री को उसे वापस लेना पड़ा। हमने दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 लाख से अधिक किसानों के साथ प्रदर्शन किया था। हमारी मांगों की बात करें तो किसान सम्मान निधि को ₹6,000 से बढ़ाकर कम से कम ₹12,000 करना। कृषि इनपुट पर लगने वाला जीएसटी पूरी तरह खत्म करना और पेट्रोल और डीजल पर राज्यों द्वारा लगाया जाने वाला भारी टैक्स/जीएसटी कम करना है।
सवाल : देश में अन्य किसान संगठन भी हैं। उनके और भारतीय किसान संघ के काम करने के तरीके में क्या अंतर है?
जवाब: मुद्दे भले ही एक जैसे हों, लेकिन अन्य संगठन रास्ता रोकने, पुतला दहन करने या पत्थरबाजी करने का रास्ता अपनाते हैं। भारतीय किसान संघ हिंसक या अलोकतांत्रिक प्रदर्शन नहीं करता। हम 20,000 से अधिक गांवों में संवाद करके और संवैधानिक व रचनात्मक तरीके से व्यवस्था परिवर्तन का प्रयास करते हैं। हमारे 1 लाख से अधिक गांवों में नेटवर्क और 1 करोड़ से ज्यादा सदस्य हैं। हम केवल आंदोलन नहीं करते, बल्कि ग्राम स्तर पर गोपालन, वृक्षारोपण और आधुनिक कृषि तकनीकों जैसे "दादा लाड तकनीक' का प्रचार-प्रसार भी करते हैं।
सवाल : किसान उत्पादक कंपनी योजना को लेकर भारतीय किसान संघ का क्या रुख है?
जवाब : सरकार का 10,000 एलपीओ बनाने का विचार अच्छा था, लेकिन अमल में गड़बड़ी हुई। एफपीओ बनाने के नाम पर 25-25 लाख रुपये बांटे गए, जिससे रोड कॉन्ट्रैक्टर्स और बिचौलियों ने एफपीओ बना लिए और लगभग 70% एफपीओ फेल हो गए। हमारी मांग है कि सामुदायिक आधारित संगठनों को दी जाने वाली धनराशि रद्द की जाए और किसान उत्पादक संगठनों का संचालन सीधे एग्रीकल्चर, हॉर्टिकल्चर विभाग और नाबार्ड के माध्यम से हो।
सवाल: फर्टिलाइज़र सब्सिडी को लेकर किसान संघ की क्या मांग है?
जवाब: सरकार जो ₹70,000 करोड़ से अधिक की सब्सिडी फर्टिलाइज़र कंपनियों को दे रही है, उसे पूरी तरह रद्द कर दिया जाना चाहिए। कंपनियों को खुली प्रतिस्पर्धा में आने दें। यह पूरी सब्सिडी राशि सीधे किसानों के बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से भेजी जानी चाहिए। इससे छोटे किसानों को सीधा लाभ मिलेगा और कालाबाजारी खत्म होगी।
सवाल : मध्य प्रदेश में इस बार सरकार ने एमएसपी खरीदी में छोटे किसानों को प्राथमिकता दी, लेकिन इससे हुए हंगामें को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: छोटे किसानों को पहले मौका देना बहुत ही सराहनीय और अच्छा कदम था। हालांकि, हंगामा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने खरीदी केंद्र खोलने और खरीदी शुरू करने में देरी की। फसल आने से पहले ही केंद्र खुल जाने चाहिए थे। देरी हुई, लेकिन निर्णय अच्छा था।
सवाल : आप केंद्र सरकार को किसानों के मामलों और नीतियों के प्रबंधन में 10 में से कितने नंबर देंगे?
जवाब:
यदि समग्र रूप से मूल्यांकन किया जाए, तो हम केंद्र सरकार को 10 में से 7 नंबर देंगे।
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स्टार समाचार, स्टार स्ट्रेट, सुशील शर्मा, साप्ताहिक कॉलम
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