एक माह से अधिक समय हो चुके पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम कई दृष्टि से ऐतिहासिक और देश की राजनीतिक दिशा के लिये कुछ महत्वपूर्ण नए संकेतों की ओर इशारा करते हैं।
बंगाल चुनाव परिणाम: तृणमूल कांग्रेस में विभाजन
एक माह से अधिक समय हो चुके पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम कई दृष्टि से ऐतिहासिक और देश की राजनीतिक दिशा के लिये कुछ महत्वपूर्ण नए संकेतों की ओर इशारा करते हैं। चुनाव, सिर्फ सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि समाज की दिशा जनता की मनोदशा और लोकतांत्रिक मूल्यों का भी ‘‘प्रतिबिम्ब’’ होते हैं।
‘‘ सफल रणनीतिकार अमित शाह’’!
अनके दृष्टियों से चुनाव प्रक्रिया व परिणाम अप्रत्याशित रहे। प्रथम बार मतदाता सूची बनाने में "तार्किक विसंगतियां " के आधार पर लगभग 27 लाख मतदाताओं को चुनाव आयोग ने "वैध सूची" से हटा दिया। जस्टिस बागची ने उन्हें यह कर मताधिकार से वंचित कर दिया कि वे अगली बार मतदान कर सकेंगे। यह भी देश में पहली बार हुआ हैं। पहली बार जजेस को शुद्ध मतदाता सूची बनाने में लगाया गया।
एग्जिट पोल से ज्यादा सीटें आई भाजपा की
सर्वप्रथम एग्जिट पोल के अनुमानों/अरमानों (इसलिए कह रहा हूं, कुछ लोगों की दृष्टि में एग्जिट पोल ‘‘मैनिपुलेटड’’ होते हैं) से कहीं ज्यादा भाजपा के पक्ष में परिणाम आए। एग्जिट पोल का ‘‘औसत’’ भाजपा को 157 सीट दे रहा था और तृणमूल कांग्रेस को 131 सीटें। परंतु वास्तविक परिणाम में 208 सीटें भाजपा को और 80 सीटें तृणमूल कांग्रेस को मिली। 15 साल बाद तृणमूल कांग्रेस को इस बुरी हार से सामना करना पड़ा। भाजपा के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के ‘‘गृह प्रदेश’’ जो अभी तक भाजपा के लिए राजनीतिक दृष्टि से ‘‘सूखा प्रदेश’’ रहा, में पहली बार में ही ‘‘दो तिहाई बहुमत’’ से भाजपा की सरकार की स्थापना के शिल्पकार, रणनीतिकार, संगठन क्षमता के धनी, चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने भविष्य के दावे’’ पर अपनी मजबूत स्थिति को और सुदृढ़ की है। इस जीत ने एक बार फिर से यह सिद्ध किया कि, अमित शाह बीजेपी की ‘‘जीत’’ के ‘‘पर्यायवाची’’ हो चुके हैं। राजनीति में जीत का ‘‘सेहरा’’ उसी के सिर बंधता है, जो समय रहते ‘‘चाल और चरित्र’’ दोनों समझ लें।
‘‘ जनादेश का सम्मान नहीं ।’’
पश्चिम बंगाल में क्या वास्तविक अर्थों में ‘‘जनादेश’’ का सम्मान किया जा रहा है, यह एक बड़ा प्रश्न नई परिस्थितियों के कारण उत्पन्न हुआ है। यदि मिले ‘‘मतों की प्रतिशत’’ की बात करें, तो हार जीत में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। भाजपा को 45.91% व तृणमूल कांग्रेस को 40.70% मत मिले। सीटों और मतों के प्रतिशत को एक साथ रखकर निष्कर्ष निकालें तो, यह स्पष्ट है, जहां जनता ने ‘‘जनादेश’’ भाजपा को ‘‘सत्तारूढ़’’ होने के दिया, वहीं उतना ही ‘‘मजबूत जनादेश मजबूत विपक्ष’’ की भूमिका के लिए तृणमूल कांग्रेस को "सत्ता पर प्रभारी अंकुश" रखने के भी दिया। लोकतंत्र में चुनाव परिणाम आने के बाद हर कोई पार्टी यही कहती है कि ‘‘हम आए जनादेश का सम्मान करते हैं।’’ क्योंकि जनादेश सरकार बनाने के ‘‘अधिकार’’ के साथ विपक्ष को भी ‘‘वैधता’’ प्रदान करता है। राजनीति संभावनाओं का खेल है। दलबदल, और बनते बिगड़ते गठबंधन लोकतंत्र के दागदार हिस्से है। तथापि चुनाव परिणाम के तुरंत बाद तृणमूल कांग्रेस में एक बड़ी टूट होने जा रही है। विधायक दल में तो टूट की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। निष्कासित तृणमूल कांग्रेस के विधायक ऋतब्रत बनर्जी को अलग हुए धड़े (58 विधायकों) ने न केवल अपना नेता चुन लिया, जिसे 5 जून को न केवल विधानसभा अध्यक्ष ने मान्यता दी; बल्कि विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में उन्हें मान्यता भी दे दी। अलग गुट बनाने के फैसले के पूर्व ममता बनर्जी से किसी भी प्रकार की चर्चा किए बिना बागी गुट की ममता बनर्जी से यह अपील कि वे ‘‘मुख्य सलाहकार’’ (भाजपा के मार्गदर्शक मंडल समान) बनी रहें, लेकिन अभिषेक बनर्जी से दूरी बनाए रखें। यह एक ‘‘भद्दा मजाक’’ नहीं; तो क्या है?
‘‘जनादेश की भावना’’ को चोट
पार्टी में ‘‘सीधा’’ नहीं; दो तिहाई से ज्यादा विभाजन के लिए निश्चित रूप से तृणमूल कांग्रेस भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। लेकिन चूंकि अलग हुआ गुट अभी भाजपा में शामिल नहीं हुआ है, इसलिए तकनीकी रूप से सीधे तौर पर भाजपा को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। परन्तु यह भी स्पष्ट है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के सक्रिय सहयोग के बिना अलग गुट को मान्यता नहीं मिल सकती थी। इसलिए भाजपा जनादेश के उल्लंघन की ‘‘जिम्मेदारी’’ से दूर नहीं भाग सकती है। अभी तक जनादेश का अपमान चुनी गई सरकारों को ‘‘सत्ताच्युत’’ करने से होता रहा है, जैसा की 2018 में चुनी गई कमलनाथ की सरकार को हटाया गया था। लेकिन यह पहला मौका है, जब विपक्ष को तोड़ने के लिए ‘‘जनादेश की भावना’’ को चोट पहुंचाई है। यद्यपि इसके लिए ममता की संगठन की स्थिति व नेतृत्व शैली भी कम जिम्मेदार नहीं है।
‘विभाजनः आत्मनिरीक्षण का अवसर ।
तृणमूल कांग्रेस का यह विभाजन सिर्फ चुनावी राजनीति तक सीमित न रहकर कई संकेतों और चिताओं को भी जन्म देता है। यह विभाजन अन्य पार्टियों में हुए विभाजन के समान कदापि नहीं है, क्योंकि किसी पार्टी के चुनाव में हारने के तुरंत बाद इस तरह का विभाजन नहीं हुआ है। दूसरी प्रमुख बात तृणमूल कांग्रेस की चुनाव में ‘‘सम्मानजनक’’ हार हुई है, जहां लगभग मात्र 5% मतों से पीछे रहने के बावजूद मुख्य विपक्षी दल का दर्जा जनादेश द्वारा तृणमूल कांग्रेस को दिया था। इससे यह सिद्ध होता है कि तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमों दीदी ममता की ‘‘ब्रांड वैल्यू’’ कम नहीं हुई है। इस का ही प्रभाव था कि गुजरात के क्रिकेटर, गैर राजनीतिक यूसुफ पठान और बिहार से शत्रुघ्न सिन्हा व कीर्ति आजाद को बंगाल लाकर चुनाव जितवा कर लोकसभा में भेज दिया। 15 साल का सत्ता विरोधी कारक, भ्रष्टाचार, कार्यकर्ता और नेताओं की अवैध कट वसूली आदि अनेकोनेक कारण ममता की हार के कारण बने। एक महत्वपूर्ण कारण पिछले विधानसभा व लोकसभा के चुनाव में ममता की विजय की अप्रत्याशित मार्जिन ने ममता को एक और जहां घमंडी बना दिया वहीं दूसरी तरफ भाजपा को अगले 5 साल काम करने के लिए सबक दे दिया। दोनों अपने-अपने कामों में लगे रहे, जिसका परिणाम आपके सामने हैं।
विश्वास, अविश्वास, भीतरघात/विश्वासघात ?
तृणमूल कांग्रेस के विभाजन को सिर्फ राजनीतिक दृष्टि से राजनीतिक परिणाम तक देखना सही नहीं होगा। यह हमारे मानवीय स्वभाव की प्रवृत्ति पर भी उंगली उठाता है। परिवार समाज व संस्थाएं लिखित अनुबंध पर नहीं, बल्कि एक दूसरे के सहयोग व योगदान से ‘‘परस्पर विश्वास’’ पर ही चलती हैं। जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को ‘‘अपना’’ मानकर अवसर, सहयोग मंच व पहचान देकर आगे बढ़ाता हैं और वह व्यक्ति अचानक अकारण ही उसके विरुद्ध खड़ा होकर विश्वास, अविश्वास में बदलकर "भीतरघात" करते हुए "विश्वासघात" की सीमा तक चला जाय, तब निश्चित रूप से सामाजिक संरचना कमजोर होती है। ‘‘विश्वास’’ राजनीति सहित किसी भी संस्था की ‘‘ अदृश्य पूंजी’’ हैं। तृणमूल कांग्रेस के विभाजन में वैसे तो दीदी के प्रति कई प्रतिबद्ध सांसद जिन्हे दीदी ने ‘‘जीरो से हीरो या हीरोइन’’ बनाया, का साथ छोड़ना आश्चर्य की बात है। लेकिन सबसे बड़ा आश्चर्य सांसद सयानी घोष के ‘‘विश्वासघात’’ जिसने मुझे यह लेख लिखने में मजबूर किया, से देश सदमे में है। अभिनेत्री एवं गायिका, सयानी घोष को चुनाव जितवाना, राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर फायरब्रांड स्टार प्रचारक बनाकर अंदर छुपी प्रतिभा को दिखाने का मंच प्रदान करना कर, मात्र 5 साल में जादवपुर लोकसभा से देशव्यापी चर्चित सांसद बना देना, सिर्फ ममता दीदी ही कर सकती हैं। ऐसे शख्स द्वारा दीदी को छोड़ देना, एक चिंता जनक संदेश पूरे देश में जा रहा है कि आखिर व्यक्ति अपने आस-पास के किस व्यक्ति पर विश्वास करें? ‘‘अविश्वास की यह खाई’’ कहीं हमारी सामाजिक ढांचे और संरचना छिन्न-भिन्न न कर दे? ममता दीदी को हुए राजनीतिक से बड़ा नुकसान एक नागरिक के विश्वास करने की प्रवृत्ति पर धक्का लगना है। इसीलिए कहा जाता है, "राजनीति में कोई स्थायी ‘‘मित्र या शत्रु’’ नहीं होते, ‘‘हित’’ होते हैं।
(लेखक: कर सलाहकार एवं बैतूल सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष हैं)