पहला विवाह छुपाकर दूसरी शादी करने के केस में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति गजेंद्रसिंह ने दूसरी शादी और भरण-पोषण से संबंधित एक केस में फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि अंतरिम भरण-पोषण तय करते समय कोर्ट पक्षकारों के आचरण और संबंधों की वास्तविकता को ध्यान में रखती है।

पहले पति की मौत के बाद रोहित से किया था मंदिर में विवाह
कोर्ट ने महिला की पांच हजार प्रतिमाह की मांग को सही माना
इंदौर। स्टार समाचार वेब
पहला विवाह छुपाकर दूसरी शादी करने के केस में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति गजेंद्रसिंह ने दूसरी शादी और भरण-पोषण से संबंधित एक केस में फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि अंतरिम भरण-पोषण तय करते समय कोर्ट पक्षकारों के आचरण और संबंधों की वास्तविकता को ध्यान में रखती है। केवल यह कहकर कि संबंध अवैध विवाह की श्रेणी में आता है, महिला को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता। विशेषकर जब रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य विवाह संबंध की पुष्टि कर रहे हों। दरअसल, उज्जैन जिला निवासी महिला ने 2015 में कुटंब न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया था। महिला का कहना था कि बीस वर्ष पूर्व उसका विवाह मंदसौर में हुआ था। इससे उसे दो बच्चे भी हैं। पहले पति कि 12 वर्ष पहले मौत हो गई थी। इसके बाद वह उज्जैन आ गई। यहां वह रोहित के संपर्क में आई और दोनों ने मंदिर में विवाह कर लिया। इसके बाद से वह रोहित के साथ पत्नी की तरह रह रही थी।
कुटुंब न्यायालय ने कहा-दूसरा विवाह शून्य
कुछ समय बाद रोहित ने उससे संबंध खत्म कर लिए और पैसे भी देना बंद कर दिया। इस दौरान महिला को पता चला कि रोहित पहले से ही शादीशुदा है और उसके दो बच्चे भी हैं। इसके बाद उसने उज्जैन कुटुंब न्यायालय में भरण पोषण के लिए परिवाद प्रस्तुत किया था, लेकिन कुटंब न्यायालय से उसे राहत नहीं मिली। कुटुंब न्यायालय ने कहा-पहले से ही विवाह होने की दशा में दूसरा विवाह शून्य है। ऐसी स्थिति में उसे भरण पोषण नहीं दिलवाया जा सकता।
हाई कोर्ट ने कुटुंब न्यायालय के फैसले को पलटा
पीड़िता ने कुटुंब न्यायालय फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में गुहार लगई। उसने रोहित से विवाह की तस्वीरें प्रस्तुत कीं जो उसका समर्थन करती थीं। कोर्ट ने पीड़िता की याचिका स्वीकारते हुए माना कि कुटुंब न्यायालय ने केवल विवाह शून्य है कहकर महिला का दावा खारिज कर गलती की। कोर्ट ने कहा-अंतरिम राहत देने का अधिकार न्यायालय का विवेक अधिकार है। इसमें पक्षकारों के व्यवहार व परिस्थितियों को देखा जाता है। कोर्ट ने महिला की पांच हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग को उचित माना।

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