केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल में केंद्रीय संस्कृत विवि भोपाल और आदिवासी बाल कल्याण एवं संस्कृत शिक्षा समिति, रायसेन के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय ज्ञान परंपरा में संतों का योगदान विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का अयोजन किया गया।

भारतीय ज्ञान परंपरा में संतों का योगदान विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का अयोजन किया गया।
भोपाल। स्टार समाचार वेब
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल में केंद्रीय संस्कृत विवि भोपाल और आदिवासी बाल कल्याण एवं संस्कृत शिक्षा समिति, रायसेन के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय ज्ञान परंपरा में संतों का योगदान विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का अयोजन किया गया। यह संगोष्ठी ब्रह्मऋषि देवराहा बाबा की स्मृति में की गई थी। केंद्रीय संस्कृत विवि नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी के नेतृत्व में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह जानकारी इंजी. कुलदीप मिश्रा प्रांत प्रचार टोली सदस्य मध्यभारत प्रांत संस्कृत भारती भोपाल ने दी। वहीं संगोष्ठी को संबोधित करते हुए स्वामी रामकृष्णा आचार्य वेदांती ने कहा कि यह आयोजन ब्रह्मऋषि देवराहा बाबा की स्मृति में किया जा रहा है। यह परिसर इस कार्य के लिए अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि यह संस्कृत की सेवा और हमारी परंपरा के संरक्षण का केंद्र है। सनातन धर्म का संरक्षण ही सनातनियों की सेवा है। सनातन धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण जीवन पद्धति है, जो नैतिकता, करुणा और ज्ञान पर आधारित है। जहां धर्म के सार को बचाना महत्वपूर्ण है। वहीं युगों-युगों से चले आ रहे धर्म और संस्कृति को बाहरी प्रभावों से सुरक्षित रखना भी जरूरी है। सेवा का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानवता की सेवा भी शामिल है। यह प्रकृति और समाज के प्रति सम्मान और सेवा के भाव को दर्शाता है।
संगोष्ठी में यह रहे मौजूद
उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में आचार्य चंद्रशेखर शर्मा,पूर्व प्रचारक भोपाल, मुख्य अतिथि स्वामी रामकृष्णा आचार्य वेदांती संस्थापक ब्रह्मर्षि देवराहा बाबा लोकसेवा आश्रम भोपाल, जितेंद्र पवार क्षेत्र संगठनमंत्री विहिप छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश, विशिष्ट वक्ता डॉ. जागेश्वर पटले प्रांत संगठन मंत्री, मध्य भारत,संस्कृत भारती मौजूद रहे।
विश्व कल्याण की भावना हमारी परंपरा
संगोष्ठी के दौरान मुख्य वक्ता आचार्य चंद्रशेखर शर्मा ने कहा कि भारत संतों की धरती है। महान ऋषियों के योगदान ने इस धरती को पवित्र बनाया है। मुख्य अतिथि जितेंद्र पंवार ने कहा कि हमारी भारतीय परंपरा में संतों के महत्त्व एवं उनके योगदान को हमें प्रेरणा के रूप में ग्रहण करना चाहिए। सभी के सुख में विश्वास और विश्व कल्याण की भावना हमारी परंपरा रही है।
नई पीढ़ी को करना होगा जागरुक
विशिष्ट वक्ता डॉ. जागेश्वर पटले ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि अपनी परंपरा को सहेज कर रखना हम सभी का दायित्व है। नई पीढ़ी को इस कार्य के लिए जागरूक करना और ज्ञान देना आवश्यक है। भारतीय ज्ञान और परंपरा का स्थान विश्व में श्रेष्ठ और अग्रणी है। युवाओं से खुलकर बातचीत करें। उन्हें बताएं कि यह कार्य क्यों महत्वपूर्ण है और इसका उनके भविष्य और समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सफल लोगों या साथियों के उदाहरण दें जिन्होंने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। केवल सिद्धांत न बताएं, बल्कि उन्हें यह कार्य करने का व्यावहारिक अनुभव दें। जानकारी को उनकी उम्र और रुचियों के अनुसार सरल और प्रासंगिक बनाएं।

भारतीय ज्ञान को रखें सुरक्षित
प्रो. हंसधर झा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा ऐसी परंपरा है जिसने भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों को एक साथ जोड़कर मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है। यह वैज्ञानिक सोच नैतिक मूल्यों और संपूर्ण मानव जाति के कल्याण की भावना पर आधारित है। हम सभी का दायित्व है कि भारतीय ज्ञान और परंपरा को सुरक्षित रखें।
संगोष्ठी में इन्हें मिला पुरस्कार
डॉ. अवधेश कुमार श्रोत्रिय कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विवि दरभंगा बिहार, डॉ. नरेश शर्मा, ज्योतिष विभाग अध्यक्ष महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विवि कैथल हरियाणा को आचार्य वराहमिहिर राष्ट्रीय पुरस्कार, डॉ. नीतेश शर्मा भाजपा शिक्षक प्रकोष्ठ संयोजक मध्यप्रदेश, डॉ. विद्याराम शर्मा असिस्टेंट प्रोफेसर बदायूं को समाज गौरव राष्ट्रीय पुरस्कार यूपी, महा मंडलेश्वर 1008 राम भूषण महाराज को ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा राष्ट्रीय पुरस्कार दिए गए।
50 शोध पत्रों का वाचन
संगोष्ठी के दौरान शोध पत्र वाचन के दो सत्रों में 50 शोध पत्रों का वाचन किया गया। जिसमें प्रमुख रूप से व्यकरण, ज्योतिष, दर्शन, गणित, राजनीति, साहित्य आदि विषयों से संबंधित शोध पत्रों का वाचन किया गया। इसके साथ ही संगोष्ठी में लखनऊ, नासिक, मंदसौर, उज्जैन, रायसेन, ग्वालियर, बदायू आदि स्थानों से आए विद्वानों ने शोधपत्रों का वाचन किया।


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