किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष

साक्षात्कार ...... शिल्प विशेषज्ञ एवं उद्यमी
मध्य प्रदेश के पत्थरों में मंदिर निर्माण और मूर्तिकला की अपार संभावनाएं
मध्य प्रदेश के उद्यमी एवं शिल्प विशेषज्ञ
सवाल : क्या मध्य प्रदेश में ऐसा पत्थर उपलब्ध नहीं है, जिससे मूर्तियां और देवालय बनाए जा सकें?
जवाब : मध्य प्रदेश में प्रचुर मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाले पत्थर उपलब्ध हैं। समस्या यह रही कि यहां के पत्थरों को व्यापक स्तर पर एक्सप्लोर नहीं किया गया। प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मौजूद खनिज और पत्थर संसाधनों को सामने लाने में भी समय लगा। दुनिया में किसी एक क्षेत्र को ही अच्छे पत्थरों का स्रोत मानना उचित नहीं है। जियोलॉजिकल स्ट्रक्चर के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग विशेषताओं वाले उत्कृष्ट पत्थर मिलते हैं।
सवाल : पत्थरों की वैज्ञानिक श्रेणियां क्या हैं और मूर्तियों के लिए किस तरह का पत्थर उपयुक्त होता है?
जवाब : वैज्ञानिक दृष्टि से चट्टानों को मुख्य रूप से आग्नेय, परतदार और कायांतरित चट्टानों में बांटा जाता है। ग्रेनाइट, क्वार्ट्ज और स्फटिक जैसी चट्टानें अत्यधिक ठोस होती हैं। चूना पत्थर और डोलोमाइट परतदार चट्टानों में आते हैं, जबकि अत्यधिक दबाव और ताप से परिवर्तित चट्टानों को कायांतरित चट्टानें कहा जाता है।
मूर्तिकला के लिए ऐसे पत्थर बेहतर माने जाते हैं जिनकी डेंसिटी अधिक, पोरोसिटी कम और मजबूती ज्यादा हो। पोरस पत्थरों में मौसम और रासायनिक प्रभाव जल्दी पड़ते हैं, जिससे उनकी उम्र प्रभावित होती है। फाइन ग्रेन और मोन्यूमेंट ग्रेड पत्थर मूर्तिकला के लिए विशेष रूप से उपयुक्त होते हैं।
सवाल : नर्मदा के नर्मदेश्वर और नेपाल की गंडकी नदी के शालीग्राम जैसे नदी से प्राप्त पत्थरों का क्या विशेष महत्व है?
जवाब : धार्मिक दृष्टि से इन पत्थरों का विशेष महत्व माना गया है। प्राकृतिक रूप से नदी के तेज प्रवाह और चट्टानों के संपर्क से इनके स्वरूप में विशेष परिवर्तन आता है। नर्मदेश्वर शिवलिंग और शालीग्राम को सनातन परंपरा में पूजनीय माना गया है और इन्हें विशेष धार्मिक मान्यता प्राप्त है।
सवाल : उत्तर और दक्षिण भारत के मंदिरों में अलग-अलग प्रकार के पत्थरों का इस्तेमाल क्यों होता है?
जवाब : मंदिरों की स्थापत्य शैली, क्षेत्रीय उपलब्धता और शास्त्रीय परंपराओं के अनुसार पत्थरों का चयन किया जाता रहा है। द्रविड़ शैली के मंदिरों में काले पत्थर का व्यापक उपयोग मिलता है। शास्त्रीय मान्यताओं में विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों के लिए अलग-अलग प्रकार के पत्थरों का उल्लेख मिलता है। पत्थर की मजबूती, घनत्व और उसमें मौजूद दरारें भी उसके चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सवाल : क्या मध्य प्रदेश के पत्थरों का उपयोग देश के बड़े मंदिरों और निर्माण कार्यों में हुआ है?
जवाब : इसके कई उदाहरण हैं। अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर के गर्भगृह के निर्माण के लिए एलएंडटी और टाटा के इंजीनियरों द्वारा पत्थरों की टेन्साइल स्ट्रेंथ, ग्रेविटी, हार्डनेस और पोरोसिटी जैसे मानकों पर जांच की गई थी। इसमें मध्य प्रदेश का पत्थर उपयुक्त पाया गया। इसके अलावा बनारस के लिए 10 से 14 फीट तक के बड़े नंदी और अन्य मूर्तियां मंडला स्थित हमारी फैक्ट्री में तैयार की गई हैं।
सवाल : मध्य प्रदेश में स्टोन इंडस्ट्री की संभावनाएं कितनी हैं?
जवाब : महाकौशल, रीवांचल और गोंडवाना बेल्ट में मार्बल, ग्रेनाइट और सैंडस्टोन की अच्छी गुणवत्ता उपलब्ध है। यदि प्रत्येक जिले में लघु उद्योग इकाइयां और आधुनिक कार्यशालाएं स्थापित की जाएं तथा पत्थरों की वैज्ञानिक टेस्टिंग के आधार पर उनका उपयोग हो, तो रोजगार के बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे सरकार को भी राजस्व प्राप्त होगा। वर्तमान में स्थानीय पत्थरों का उपयोग उनकी क्षमता की तुलना में काफी कम है, जबकि प्रदेश विभिन्न प्रकार के पत्थरों की बड़ी जरूरत पूरी कर सकता है।
सवाल : क्या मंदिर के अलग-अलग हिस्सों के लिए अलग-अलग पत्थरों का चयन किया जाता है?
जवाब : हां। मूर्ति, गर्भगृह, मंडप, परकोटा, फर्श और सजावटी हिस्सों के लिए पत्थर का चयन उसकी उपयोगिता और आवश्यक गुणवत्ता के आधार पर किया जाता है। मूर्तियों के लिए अलग मानदंड होते हैं, जबकि फर्श और ऑर्नामेंटल कार्य के लिए अलग प्रकार के पत्थर उपयोगी होते हैं।
सवाल : सरकारी टेंडरों में किसी खास क्षेत्र के पत्थर का नाम तय कर देने से स्थानीय उद्योग प्रभावित होता है। इसमें क्या सुधार होना चाहिए?
जवाब : टेंडर में किसी एक स्थान विशेष का नाम लिखने के बजाय पत्थर के डेंसिटी, पोरोसिटी, हार्डनेस, पॉलिश और टिकाऊपन जैसे वैज्ञानिक पैरामीटर तय किए जाने चाहिए। जो पत्थर इन मानकों पर खरा उतरे, उसे उपयोग का अवसर मिलना चाहिए, चाहे वह मध्य प्रदेश, राजस्थान या ओडिशा से आए। प्राकृतिक पत्थरों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और रासायनिक तरीके से रंग बदलकर बेचे जाने वाले घटिया पत्थरों पर नियंत्रण होना चाहिए।
सवाल : क्या वेदों, उपनिषदों और सनातन संस्कृति पर आधारित वैदिक शोध केंद्र स्थापित करने की भी योजना है?
जवाब : यह मेरी गहरी इच्छा है और मैं अपने स्तर पर प्रयास भी कर रहा हूं। एक ऐसा शोधपीठ होना चाहिए, जहां आगम शास्त्र, स्कंद पुराण, अग्नि पुराण और अन्य प्राचीन ग्रंथों का वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन हो। इससे दुनिया को भारतीय परंपरा में मौजूद ज्ञान, स्थापत्य और विज्ञान की वास्तविक विरासत को समझने का अवसर मिलेगा। इस दिशा में शासन की सहभागिता भी महत्वपूर्ण होगी।
किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
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स्टार समाचार, स्टार स्ट्रेट, सुशील शर्मा, साप्ताहिक कॉलम
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