मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस अधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान ने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर संस्था के कामकाज में बाधा डालने तथा 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी करने में अनियमितताओं के दोषी तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी एवं सदस्य सचिव उमा महेश्वरी पर कार्रवाई की मांग की है।

सिया के अध्यक्ष शिवनारायण सिंह चौहान
से स्टार समाचार की खास बातचीत-
दोषी आईएस अधिकारी की सीबीआई जांच के लिए मुख्य सचिव को लिखा पत्र
मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस अधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान ने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर संस्था के कामकाज में बाधा डालने तथा 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी करने में अनियमितताओं के दोषी तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी एवं सदस्य सचिव उमा महेश्वरी पर कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल को पत्र लिखकर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और सीबीआई जांच का अनुरोध किया है। ‘स्टार समाचार’ से विशेष बातचीत में उन्होंने अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश—
सवाल: आपने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर अधिकारियों पर क्या आरोप लगाए हैं?
जवाब: मैंने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और ‘सिया’ के सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मेरे अनुसार, इन अधिकारियों ने प्राधिकरण के वैधानिक कार्यों में बाधा डाली, पोर्टल और इंटरनेट बंद कर कार्यालय का कामकाज प्रभावित किया। मैंने मुख्य सचिव से संबंधित अधिकारियों के निलंबन, आपराधिक प्रकरण दर्ज करने और सीबीआई जांच की मांग की है।
सवाल: 237 अनुमतियों को लेकर विवाद क्या है? आप पर भी बैठकें नहीं बुलाने के आरोप हैं।
जवाब: यह आरोप गलत है। नियमों के अनुसार ‘सिया’ की बैठक 45 दिनों के भीतर होनी चाहिए। मैंने बैठक बुलाने के लिए दर्जनों पत्र लिखे, लेकिन सदस्य सचिव एक भी बैठक आयोजित नहीं की। इसके बाद 45 दिनों के भीतंर बैठक नहीं होने से जुड़े प्रावधान का इस्तेमाल कर तत्कालीन सदस्य सचिव उमा महेश्वरी और प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी ने 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी कर दीं। ये अनुमतियां अवैध हैं। जब अध्यक्ष लगातार बैठक बुलाने के लिए पत्र लिख रहा था, तो बैठक क्यों नहीं हुई? इसकी जांच होनी चाहिए कि ये अनुमतियां किस प्रक्रिया के तहत जारी की गईं।
सवाल: अध्यक्ष बनने के बाद से ही अधिकारियों के साथ आपका टकराव चल रहा है?
जवाब: ‘सिया’ केंद्रीय कानून के तहत गठित एक स्वतंत्र संस्था है। लेकिन यहां की नौकरशाही खुद को मालिक समझती है और चाहती है कि सब कुछ उसके हिसाब से हो। मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूंगा। संस्था को कानून और नियमों के अनुसार काम करना चाहिए, न कि अधिकारियों की मनमर्जी से। मैं किसी भी दबाव में नियम-कायदों से समझौता नहीं करूंगा।
सवाल: इसी कारण क्या प्रशासनिक सहयोग भी नहीं मिल रहा है?
जवाब: यही तो मुख्य समस्या है। वल्लभ भवन में बैठे अधिकारी चाहते हैं कि ‘सिया’ ठीक से काम ही न कर सके। मुझे जो स्टेनोग्राफर दिया गया है, उसे टाइपिंग तक नहीं आती और चपरासी फाइलें इधर से उधर रखने को तैयार नहीं है। यह कैसा सहयोग है? ऐसा लगता है कि संस्था को परेशान कर उसका कामकाज प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
सवाल: ‘सिया’ की स्वतंत्रता और शासन के हस्तक्षेप को लेकर न्यायालयों में भी निर्णय हुए हैं?
जवाब: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और सुप्रीम कोर्ट में ‘सिया’ से जुड़े मामलों में इसकी स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली को लेकर स्पष्ट निर्णय हुए हैं, जिसमें सिया को अधिकार सम्पन्न स्वतंत्र संस्था माना गया है। जब संस्था की अपनी वैधानिक व्यवस्था और जिम्मेदारियां हैं, तो उसे स्वतंत्र रूप से काम करने देना चाहिए। शासन के अधिकारियों को उसके कामकाज में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
सवाल: आप आर्थिक और कानूनी अनियमितताओं के आरोप हैं, फिर ईओडब्ल्यू या किसी अन्य जांच एजेंसी में शिकायत क्यों नहीं ?
जवाब: मैंने अपनी बात शासन के उच्च स्तर तक पहुंचा दी है। अब जांच और कार्रवाई करना शासन तथा संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है। जिन अनुमतियों पर सवाल उठे हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय कर कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
सवाल: क्या अधिकारियों के एक तरफा फैसलों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका है?
जवाब: हां, भोपाल के पास 17 एकड़ जंगल के क्षेत्र में एक संस्था को अनुमति दी गई है। इससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है। दूसरा मामला नदी के भीतर मशीनों से रेत निकालने की अनुमति का है। नदी में पोकलेन जैसी मशीनों से खनन करना गलत है। इससे नदी की प्राकृतिक संरचना और पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ सकता है। पर्यावरणीय मंजूरी देते समय प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
सवाल: आपसे पहले भी कई नौकरशाह ह्यसियाह्ण के अध्यक्ष रहे हैं। आपके कार्यकाल में ही इस तरह का विवाद क्यों सामने आया?
जवाब: पहले क्या होता था, इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन वर्तमान में जो दखलंदाजी हो रही है, वह अनुचित है। किसी स्वतंत्र संस्था के कामकाज में इस तरह हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
सवाल: इस टकराव के बीच आपको डर नहीं लगता?
जवाब: डर उन्हें लगना चाहिए जो गलत काम करते हैं। मैंने कोई गलत काम नहीं किया है, इसलिए डरने का सवाल ही नहीं है। मेरी अपेक्षा है कि ‘सिया’ को कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाए। गलत तरीके से अनुमतियों के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होना चाहिए।
सवाल: प्रशासनिक सेवा में आने की प्रेरणा कहां से मिली और आपका सफर कैसा रहा?
जवाब: मेरा परिवार खेती-किसानी से जुड़ा रहा है और मुझसे पहले परिवार में कोई सरकारी सेवा में नहीं था। मैंने शुरूआत में प्रोफेसर के रूप में काम किया। इसके बाद प्रतियोगी परीक्षा के जरिए राज्य प्रशासनिक सेवा में चयनित हुआ और वर्ष 2002 में मुझे आईएएस अवॉर्ड मिला। प्रशासनिक सेवा के दौरान उज्जैन नगर निगम आयुक्त, भोपाल विकास प्राधिकरण के सीईओ तथा पन्ना और सिंगरौली के कलेक्टर सहित विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं। इन पदों पर काम करते हुए प्रशासनिक व्यवस्था, नियमों के क्रियान्वयन और जनहित से जुड़े मुद्दों को करीब से समझने का अवसर मिला।
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किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
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