आज यानी बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों को लेकर सुनवाई हुई। इस दौरान पीठ ने कहा- ये कहा नहीं जा सकता की कुत्तों के मन में क्या चल रहा है और कब वो किसी को काट लें। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया कर रहे हैं।

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों को लेकर सुनवाई हुई।
नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
आज यानी बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों को लेकर सुनवाई हुई। इस दौरान पीठ ने कहा- ये कहा नहीं जा सकता की कुत्तों के मन में क्या चल रहा है और कब वो किसी को काट लें। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया कर रहे हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा-आवारा कुत्तों से सिर्फ रेबीज ही नहीं बल्कि सड़क दुर्घटना का भी खतरा बढ़ जाता है। कुत्ता प्रेमियों की ओर से पैरोकारी कर रहे वकील कपिल सिब्बल ने कहा- सभी कुत्तों को आश्रय स्थलों में रखना शारीरिक रूप से संभव नहीं है। आर्थिक रूप से भी यह व्यवहार्य नहीं है। मनुष्यों के लिए भी खतरनाक है। इसे वैज्ञानिक तरीके से ही करना होगा। समस्या यह है कि कानूनों का पालन नहीं किया जा रहा है। सिब्बल ने कहा-सभी कुत्तों को पकड़ना समाधान नहीं है।
मप्र सहित 10 राज्यों ने नहीं दिया हलफनामा
सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी ने यह जानकारी दी है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब समेत 10 राज्यों ने हलफनामा नहीं दिया है। राजस्थान और ओडिशआ ने हलफनामे देर से दाखिल किए, जिसकी वजह से उन्हें एमिकस नोट में शामिल नहीं किया जा सका। राज्यों ने हलफनामे में स्ट्रे डॉग्स को पकड़ने, जॉग पाउंड और एनिमल बर्थ कंट्रोल केंद्रों की पहचान से जुड़े अनुपालन आंकड़े बताए गए हैं।
रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर
इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने जवाब देते हुए कहा-रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर होती है। जस्टिस मेहता ने कहा-हम केवल यह निगरानी करने की कोशिश कर रहे हैं कि नियमों और कानूनों का पालन हो रहा है या नहीं, जो अभी तक नहीं हुआ है। जिन राज्यों ने जवाब नहीं दिया है, उनके खिलाफ हम सख्त कार्रवाई करेंगे।
यहां से कुत्तों को हटाना था
गौरतलब है कि सात नवंबर को न्यायालय ने स्कूलों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों जैसे संस्थागत परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाने और उचित नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें आश्रयों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया था। लेकिन आज तक कुछ नहीं किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी भी जताई।
राज्यों के हलफनामे में हाईवे का डेटा नहीं
राज्यों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के मुताबिक 2691 आवारा मवेशियों को सड़कों से हटाकर गौशालाओं में भेजा गया है। हालांकि, हाईवे के उन हिस्सों का कोई डेटा नहीं दिया गया है जो आवारा मवेशियों के कारण संवेदनशील हैं। हलफनामे में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि कितने शेल्टर उपलब्ध हैं। एनएचएआई और पशुपालन विभाग के बीच समन्वय का विवरण भी हलफनामे में नहीं है। पकड़े गए मवेशियों को आखिर कहां ले जाया जा रहा है, यह सवाल भी उठा है।
आरडब्ल्यूए पर छोड़ा जाए निर्णय
सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी है कि पूरा मुद्दा पशु प्रेमियों की बजाय केवल कुत्ता प्रेमियों के इर्द-गिर्द ही केंद्रित हो गया है। गेटेड कॉलोनी में कुत्तों को घूमने दिया जाए या नहीं, यह फैसला आरडब्ल्यूए को करना चाहिए। एसजी ने कहा-दिक्कत यह है कि कई मामलों में 90 फीसदी निवासी कुत्तों को खतरनाक मानते हैं, लेकिन 10 प्रतिशत लोग उन्हें रखने पर अड़े रहते हैं। अगर कल कोई कहे कि वह अपने घर में भैंस या गाय रखना चाहता है, तो उसका क्या होगा। उन्होंने कहा-व्यक्तिगत, भावनात्मक या सहानुभूतिपूर्ण तर्कों की बजाय निर्णय आरडब्ल्यूए पर छोड़ा जाना चाहिए।


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