नासा के सैटेलाइट ने प्रशांत महासागर में शक्तिशाली अल नीनो के संकेत दिए हैं। जानिए क्या है अल नीनो, 1997 के 'गॉडजिला' से इसकी तुलना और भारत के मानसून पर इसके संभावित प्रभाव।

अमेरिका। स्टार समाचार वेब
प्रशांत महासागर में एक बेहद शक्तिशाली 'अल नीनो' के विकसित होने की प्रक्रिया तेज हो गई है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के 'सेंटिनल-6 माइकल फ्रेलिच' सैटेलाइट द्वारा जुटाए गए डेटा से चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। सैटेलाइट ने भूमध्यरेखा के पास समुद्र के जलस्तर में असामान्य वृद्धि दर्ज की है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि समुद्र की गहराइयों में बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है और जलस्तर ऊपर उठता है, तो इसे अल नीनो की स्थिति माना जाता है। अमेरिकी एजेंसी NOAA ने भी आधिकारिक तौर पर इसकी शुरुआत की पुष्टि कर दी है।
वैज्ञानिकों ने इस अल नीनो की तुलना 1997 के विनाशकारी 'गॉडजिला अल नीनो' से की है। नासा की प्रयोगशाला द्वारा जारी समुद्र की सतह के नक्शे में लाल रंग के क्षेत्रों में जलस्तर की अधिकता को दर्शाया गया है, जो समुद्र के भीतर हलचल का संकेत देते हैं। सैटेलाइट ने गर्म पानी की विशाल लहरों (केल्विन वेव्स) को भी ट्रैक किया है, जो सैकड़ों मील तक फैल रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अल नीनो इसी तरह मजबूत होता रहा, तो यह पिछले 150 सालों के सबसे शक्तिशाली जलवायु घटनाओं में से एक बन सकता है, जिसका वैश्विक तापमान पर गहरा असर पड़ेगा।
अल नीनो का प्रभाव केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित करेगा। भारत के संदर्भ में यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि कमजोर मानसून देश की लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है। अल नीनो के कारण बढ़ते तापमान और बारिश के पैटर्न में अनिश्चितता पैदा होने की प्रबल संभावना है। यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन और देश की आर्थिक विकास दर पर पड़ सकता है।

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