पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत सरकार ने 'प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम उत्पाद वितरण आदेश 2026' जारी किया है। अब पीएनजी वाले क्षेत्रों में एलपीजी कनेक्शन सरेंडर करना अनिवार्य होगा। जानें नए नियम और समय-सीमा।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आए व्यवधानों के बीच भारत सरकार ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए एक दूरगामी कदम उठाया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 'प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम उत्पाद वितरण आदेश, 2026' जारी किया है, जिसका सीधा असर देश के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
सरकार के इस आक्रामक नीतिगत बदलाव का प्राथमिक उद्देश्य किसी एक ईंधन (LPG) पर निर्भरता को कम करना है। वर्तमान में होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण एलपीजी के आयात में बाधाएं आ रही हैं। सरकार चाहती है कि उन विकसित शहरी क्षेत्रों में एलपीजी की खपत को पूरी तरह समाप्त किया जाए जहाँ पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) का बुनियादी ढांचा उपलब्ध है। इससे बचे हुए एलपीजी सिलेंडरों को देश के उन दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में भेजा जा सकेगा जहाँ पाइपलाइन बिछाना फिलहाल संभव नहीं है।
नए आदेश के तहत, यदि किसी क्षेत्र में पीएनजी की सुविधा उपलब्ध है और वहां का उपभोक्ता कनेक्शन लेने से इनकार करता है, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। अधिकृत गैस एजेंसी द्वारा सूचना दिए जाने के तीन महीने के भीतर यदि पीएनजी कनेक्शन नहीं लिया गया, तो उस घर की एलपीजी आपूर्ति स्थायी रूप से रोक दी जाएगी। यह नियम स्पष्ट करता है कि अब पीएनजी केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य आवश्यकता होगी।
अक्सर देखा गया है कि कई हाउसिंग सोसायटियाँ गैस पाइपलाइन बिछाने की अनुमति देने में आनाकानी करती हैं। नए नियमों ने ऐसी सोसायटियों की शक्तियों को सीमित कर दिया है:
संबंधित संस्थाओं को आवेदन मिलने के तीन कार्य दिवसों के भीतर अनुमति देनी होगी।
अनुमति मिलने के 48 घंटे के भीतर अंतिम-छोर कनेक्टिविटी प्रदान करना अनिवार्य है।
यदि कोई सोसाइटी सहयोग नहीं करती है, तो नोटिस के तीन महीने बाद पूरे कॉम्प्लेक्स की एलपीजी आपूर्ति बंद की जा सकती है। विवादों के निपटारे के लिए अधिकारियों को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्रदान की गई हैं।
सरकार ने केवल उपभोक्ताओं ही नहीं, बल्कि कंपनियों के लिए भी सख्त समय-सीमा तय की है:
सार्वजनिक प्राधिकरणों को पाइपलाइन बिछाने की मंजूरी तय समय में देनी होगी, अन्यथा उसे 'डीम्ड अप्रूवल' (स्वतः मंजूर) माना जाएगा।
गैस वितरण कंपनियों को मंजूरी मिलने के चार महीने के भीतर काम शुरू करना होगा। ऐसा न करने पर उन पर भारी जुर्माना लग सकता है या उनकी क्षेत्रीय विशिष्टता (Exclusivity) रद्द की जा सकती है।
नियमों में व्यावहारिकता का भी ध्यान रखा गया है। यदि कोई गैस कंपनी यह प्रमाणित करती है कि किसी विशेष घर या स्थान पर पाइपलाइन पहुंचाना 'तकनीकी रूप से असंभव' है, तो उपभोक्ता को छूट मिलेगी। ऐसे मामलों में कंपनी 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (NOC) जारी करेगी, जिससे उपभोक्ता का एलपीजी कनेक्शन सुरक्षित रहेगा। हालांकि, भविष्य में तकनीकी समाधान मिलते ही यह छूट वापस ले ली जाएगी।
पेट्रोलियम सचिव नीरज मित्तल के अनुसार, यह सुधार 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। पीएनजी न केवल सुरक्षित और निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करती है, बल्कि यह सिलेंडरों की बुकिंग और डिलीवरी के झंझटों को भी खत्म करती है। यह बदलाव भारत को वैश्विक आपूर्ति के झटकों से बचाने और एक गैस-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने का प्रयास है।

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