मध्य प्रदेश में फायर सेफ्टी और नगर निगम की अनुमति के बिना निजी अस्पतालों के पंजीयन पर हाईकोर्ट सख्त। लॉ स्टूडेंट एसोसिएशन की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई, सरकार से मांगी गई ताजा स्टेटस रिपोर्ट।

जबलपुर। स्टार समाचार वेब
मध्य प्रदेश में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के पंजीयन (Registration) को लेकर चल रहे नियमों के उल्लंघन का मामला इन दिनों गंभीर रूप से गरमाता जा रहा है। फायर सेफ्टी (Fire Safety) और नगर निगम (Municipal Corporation) की अनिवार्य अनुमतियों के बिना ही अस्पतालों को धड़ल्ले से पंजीयन दिए जाने के गंभीर आरोपों को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पांच जनहित याचिकाएं (PIL) दायर की गई हैं। सोमवार को इस अहम मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार से ताजा स्टेटस रिपोर्ट तलब की है।
लॉ स्टूडेंट एसोसिएशन व अन्य की ओर से दायर की गई इन जनहित याचिकाओं में निजी अस्पतालों के पंजीयन की पूरी प्रक्रिया और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। आरटीआई (RTI) से मिली आधिकारिक जानकारी का हवाला देते हुए याचिकाओं में बताया गया है कि केवल जबलपुर शहर में ही लगभग 160 निजी अस्पताल और नर्सिंग होम संचालित किए जा रहे हैं। इनमें से चौंकाने वाली बात यह है कि 63 अस्पतालों का पंजीयन वर्ष 2019 से 2021 के बीच की अवधि में किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का यह मुख्य आरोप है कि जबलपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय में नए अस्पतालों के पंजीयन के दौरान निर्धारित नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन किया जा रहा है। आरोप है कि अस्पतालों के स्थल पर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करने के बजाय केवल ऑनलाइन आवेदनों और आधे-अधूरे दस्तावेजों के आधार पर ही पंजीयन प्रमाण पत्र जारी कर दिए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर मरीजों की जान से खिलवाड़ और नियमों के विपरीत है।
याचिकाओं में सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा यह उठाया गया है कि यदि किसी निजी अस्पताल के पास अग्नि सुरक्षा यानी फायर सेफ्टी की जरूरी मंजूरी या नगर निगम की आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मौजूद नहीं है, तो आखिर किस आधार पर उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन का पंजीयन दे दिया गया? याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से मांग की है कि पूरे पंजीयन प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में सभी अस्पताल तय सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करें।
सोमवार को इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने अदालत को अवगत कराया कि सरकार पहले ही इस संबंध में अपना जवाब दाखिल कर चुकी है। हालांकि, वर्तमान और अद्यतन स्थिति को स्पष्ट करने वाली ताजा स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के लिए उन्होंने अदालत से चार दिन का अतिरिक्त समय मांगा।
कोर्ट ने सरकार के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए चार दिन का समय दे दिया है। साथ ही, अदालत ने यह भी निर्देश दिए हैं कि नई स्टेटस रिपोर्ट की प्रतियां जल्द से जल्द याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं को भी उपलब्ध कराई जाएं। अब इस मामले की अगली और महत्वपूर्ण सुनवाई आगामी 12 अक्टूबर को होगी, जहां कोर्ट सरकार द्वारा पेश की जाने वाली ताजा रिपोर्ट और लगाए गए आरोपों की वैधता पर आगे विचार करेगा।
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