मध्यप्रदेश सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के माध्यम से बाजार से 3,600 करोड़ रुपए का नया कर्ज लिया है। इस नई उधारी के बाद राज्य पर कुल कर्ज का बोझ 5.40 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है। जानिए क्या हैं इसके आंकड़े और शर्तें।

मध्यप्रदेश के सरकार पर और कर्ज1
मध्य प्रदेश सरकार की वित्तीय स्थिति और उधारी को लेकर एक बार फिर बड़ी खबर सामने आई है। राज्य सरकार ने अपनी विकास योजनाओं और वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के जरिए बाजार से 3,600 करोड़ रुपए का नया कर्ज उठाया है। इस ताजा उधारी के बाद राज्य के खजाने पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे प्रदेश पर कुल बकाया देनदारी का आंकड़ा 5.40 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है। सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम से राज्य के वित्तीय प्रबंधन और बजट पर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
यह पूरा ऋण भारतीय रिजर्व बैंक के मुंबई कार्यालय के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) की नीलामी के जरिए जुटाया गया है। इस प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाते हुए आरबीआई के कोर बैंकिंग सिस्टम यानी ई-कुबेर (E-Kuber) प्लेटफॉर्म पर आयोजित किया गया। इस नीलामी में विभिन्न वित्तीय संस्थानों, बैंकों और पात्र संस्थागत निवेशकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके अलावा, आम निवेशकों के लिए भी 'नॉन-कॉम्पिटिटिव बिडिंग' के जरिए निवेश करने का विकल्प खुला रखा गया था, ताकि बाजार से सुगमता से राशि जुटाई जा सके।
सरकार द्वारा लिए गए इस 3,600 करोड़ रुपए के कुल कर्ज को दो अलग-अलग और रणनीतिक किश्तों में विभाजित किया गया है, जिनकी अवधि और ब्याज दरें इस प्रकार हैं:
पहली किश्त (1,600 करोड़ रुपए):
यह कर्ज 18 साल की लंबी अवधि के लिए लिया गया है। इस राशि पर सरकार निवेशकों को 7.61 प्रतिशत की वार्षिक ब्याज दर का भुगतान करेगी। इस ऋण की परिपक्वता अवधि वर्ष 2044 तय की गई है, और इसका ब्याज हर साल जनवरी और जुलाई के महीनों में चुकाया जाएगा।
दूसरी किश्त (2,000 करोड़ रुपए):
यह हिस्सा 30 साल की बेहद लंबी अवधि के लिए उठाया गया है। लंबी परिपक्वता अवधि के चलते इस पर ब्याज दर नीलामी की कट-ऑफ यील्ड के आधार पर तय की गई है। इस कर्ज का पूरा निपटान सितंबर 2056 तक किया जाएगा, जिसका ब्याज हर साल मार्च और सितंबर में देय होगा।
यह कोई पहला मौका नहीं है जब चालू वित्त वर्ष के दौरान सरकार ने बाजार का रुख किया हो। इससे पहले भी अगस्त और अन्य महीनों में लगातार सरकारी सिक्योरिटीज की नीलामी के जरिए फंड जुटाए गए हैं। इन तमाम उधारी को जोड़ने के बाद चालू वित्त वर्ष में अब तक सरकार द्वारा लिए गए कुल कर्ज का आंकड़ा 51,400 करोड़ रुपए के आसपास पहुंच चुका है। लगातार हो रही इन कटौतियों और ऋणों से राज्य के वित्तीय संसाधनों पर दबाव साफ तौर पर देखा जा सकता है।
राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य पर नजर डालें तो स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, गत 31 मार्च की स्थिति तक मध्य प्रदेश सरकार पर कुल 4,88,714.17 करोड़ रुपए का कर्ज पहले से ही दर्ज था। अब इस नए 3,600 करोड़ रुपए के ऋण के जुड़ जाने के बाद प्रदेश पर कुल बकाया कर्ज बढ़कर 5,40,114 करोड़ रुपए (यानी 5.40 लाख करोड़ से अधिक) हो गया है। जानकारों का मानना है कि इस तरह लगातार बढ़ रहा कर्ज राज्य के भविष्य के बजट और बुनियादी विकास कार्यों के वित्तीय आवंटन को प्रभावित कर सकता है।
सरकार का पक्ष है कि बाजार से जुटाई गई इस धनराशि का उपयोग प्रदेश में बुनियादी ढांचे के विकास, सड़क निर्माण, सिंचाई परियोजनाओं, ऊर्जा क्षेत्र और अन्य उत्पादक विकासात्मक कार्यों के वित्तपोषण में किया जाएगा। हालांकि, विपक्ष और आर्थिक विश्लेषकों का तर्क है कि जिस तरह से सरकारें लगातार पुराना कर्ज चुकाने और नए ऋण लेने के चक्र में फंस रही हैं, उससे राज्य की राजकोषीय स्थिति पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है। वित्तीय पारदर्शिता और बजट संतुलन बनाए रखना आने वाले समय में सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा।

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