मध्य प्रदेश में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को प्रोबेशन पीरियड में 100% वेतन देने के हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। वित्तीय भार और नियमों का हवाला देते हुए सरकार ने रोक की मांग की है।

मध्य प्रदेश में सीधी भर्ती के जरिए नियुक्त होने वाले तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के प्रोबेशन पीरियड (िवीक्षा अवधि) में 70%, 80% और 90% वेतन दिए जाने के नियम पर घमासान छिड़ गया है। राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डबल बेंच के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें इस व्यवस्था को रद्द करते हुए कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से ही 100% पूरा वेतन देने का आदेश दिया गया था। सरकार ने अपनी याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग करते हुए 13 प्रमुख आधार पेश किए हैं।
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य रूप से वित्तीय प्रभावों का हवाला दिया है। सरकार का कहना है कि वर्ष 2019 से अब तक प्रोबेशन अवधि पर रहे कर्मचारियों को 100% वेतन के हिसाब से एरियर (बकाया राशि) का एकमुश्त भुगतान करने से राज्य के खजाने पर भारी अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।
भविष्य की भर्तियों पर प्रभाव: पुराने कर्मचारियों के एरियर और बढ़े हुए वेतन का सीधा असर आगामी और वर्तमान भर्तियों (जैसे पुलिस, पटवारी और शिक्षक भर्ती) के बजट प्रबंधन पर पड़ेगा।
विकास कार्यों में बाधा: सरकार के मुताबिक, वित्तीय संसाधनों के इस तरह के डायवर्जन से राज्य के पूंजीगत कार्यों (Capital Works) और महत्वपूर्ण जनकल्याणकारी योजनाओं के बजट पर विपरीत असर पड़ सकता है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 309 का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। सरकार का तर्क है कि सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति और उनकी सेवा शर्तों से जुड़े नियम निर्धारित करने का पूर्ण अधिकार राज्य सरकार के पास है।
प्रशासनिक प्रक्रिया: सरकार ने स्पष्ट किया है कि 70-80-90% वेतन की यह व्यवस्था किसी मनमाने फैसले के तहत नहीं, बल्कि वित्त विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) में लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया, परीक्षण और विचार-विमर्श के बाद सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी से लागू की गई थी।
न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा: सरकार ने यह भी दलील दी है कि नीतिगत और वित्तीय मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, जब तक कि नियमों का कोई स्पष्ट उल्लंघन न हुआ हो।
राज्य सरकार ने 1966 के सेवा नियमों एवं वित्तीय नियमों का हवाला देते हुए बताया कि शुरुआती सेवा काल में कर्मचारियों को प्रशिक्षण और दक्षता (Efficiency) के आकलन से गुजरना होता है, इसलिए चरणबद्ध वेतन भुगतान का प्रावधान किया गया था।
अन्य राज्यों का उदाहरण: सरकार ने छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों में प्रोबेशन के दौरान स्टाइपेंड या कम वेतन देने की प्रथा का उल्लेख किया। हालांकि, यह भी तथ्य है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने 2023 में इस नियम को समाप्त कर दिया था, लेकिन पुराने एरियर का भुगतान वहां भी नहीं किया गया था।
यह पूरा कानूनी विवाद पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में बना हुआ है। कर्मचारियों के पक्ष में अदालती फैसलों का क्रम इस प्रकार रहा है:
6 जनवरी 2026 का फैसला: हाईकोर्ट ने सीधी भर्ती के कर्मचारियों को नियुक्ति की तिथि से पूर्ण वेतन और 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ बकाया राशि देने का निर्देश दिया था।
9 सितंबर का डबल बेंच का आदेश: हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 12 दिसंबर 2019 से लागू इस वेतन व्यवस्था को पूरी तरह निरस्त कर दिया और नियुक्ति तिथि से 100% वेतन देने का आदेश दोहराया।
अब राज्य सरकार के इस विशेष अनुमति याचिका (SLP) के बाद मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी, हालांकि अभी अगली तारीख तय नहीं की गई है।
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