सतना जिले के उचेहरा में ट्रेन से गिरकर घायल हुए युवक की मौत इलाज के अभाव में हो गई। डॉक्टर ने रेफर किया लेकिन 108 एम्बुलेंस तीन घंटे तक नहीं आई। घायल स्ट्रेचर पर तड़पता रहा और आखिरकार दम तोड़ दिया। मौत के बाद भी शव शाम तक अस्पताल के बाहर पड़ा रहा। सरकारी सिस्टम की लापरवाही ने गोल्डन आवर की हत्या कर दी।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
सरकारी दावे चीख-चीखकर कहते हैं कि सड़क हादसे में घायल को जल्द अस्पताल पहुंचाओ, जान बचेगी, लेकिन हकीकत इतनी बेरहम है कि यहां घायल अस्पताल तक तो पहुंचा, पर इलाज नहीं, एम्बुलेंस नहीं, जवाब नहीं और आखिर में जान भी नहीं बची। सरकार बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर छपवाती है कि हादसे के 60 मिनट 'गोल्डन आॅवर' होते हैं - लेकिन उचेहरा में तो 180 मिनट तक सिर्फ इंतजार ही मिला। इस 'गोल्डन आॅवर' की हत्या सरकारी निष्क्रियता ने कर दी। प्राप्त जानकारी के अनुसार शुक्रवार सुबह करीब 10 बजे, अज्ञात युवक ट्रेन से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गया। पुलिस की डायल 112 टीम तत्परता दिखाते हुए उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, उचेहरा लाई। शरीर लहूलुहान था, हालत नाजुक, बोलने की ताकत तक नहीं बची थी। ड्यूटी पर तैनात डॉ. अजीत यादव ने प्राथमिक इलाज कर उसे सतना रेफर कर दिया — और यहीं से शुरू हुआ सरकारी सिस्टम का सुस्त, संवेदनहीन, और जानलेवा रवैया।
108 एम्बुलेंस- आई ही नहीं!
डॉक्टर ने गंभीर स्थिति को देखते हुए तुरंत 10:49 बजे 108 इमरजेंसी सेवा को फोन किया। लेकिन सिस्टम ने जैसे अपनी आंखें मूंद लीं। एक-एक मिनट कीमती था, पर एम्बुलेंस अगले तीन घंटे तक नहीं आई। घायल युवक स्ट्रेचर पर तड़पता रहा। कोई रिश्तेदार साथ नहीं, न बोलने की हालत, और न कोई सुनने वाला और फिर, दोपहर 2:30 बजे, उसने दम तोड़ दिया। शर्मनाक बात ये रही कि युवक की मौत के बाद भी उसका शव शाम 5 बजे तक अस्पताल के बाहर स्ट्रेचर पर ही पड़ा रहा। कोई एम्बुलेंस, कोई शव वाहन, कोई जिम्मेदार अधिकारी-कोई नहीं आया। क्या 108 एम्बुलेंस सेवा अब सिर्फ एक हेल्पलाइन नंबर बनकर रह गई है?


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