जयपुर अस्पताल हादसे के बाद सतना जिला अस्पताल की फायर सेफ्टी व्यवस्था की हकीकत सामने आई है। अस्पताल में न तो फायर एनओसी है और न ही स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म और स्प्रिंकलर का काम पूरा हुआ है। करीब 70 लाख की लागत वाला सेफ्टी प्रोजेक्ट ठेकेदार और प्रबंधन के विवाद में फंसा है। अगर किसी वार्ड में आग लगती है तो सैकड़ों मरीजों की जान खतरे में पड़ सकती है।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
रविवार को जयपुर के एक अस्पताल में हुए अग्नि हादसे के बाद स्टार समाचार ने जिले के सबसे बड़े अस्पताल की अग्नि शमन व्यवस्थाओं को टटोला तो अग्नि सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी नजर आए। कुछ संवेदन शील वाडों में अग्नि शामक यन्त्र की व्यवस्थाएं तो की गई हैं लेकिन वे भी मरीजों के हिसाब से कम हैं। बताया गया कि जिला अस्पताल में फायर एनओसी भी नहीं है। फायर एनओसी लेने परिसर में फायर सेफ्टी का कार्य भी शुरू किया गया लेकिन ठेकेदार भी अधूरे कार्य को छोड़कर भाग खड़ा हुआ। अब जब तक फायर सेफ्टी का काम पूरा नहीं होगा फायर एनओसी भी नहीं मिलेगी। गौरतलब है कि सोमवार को जयपुर के एसएमएस अस्पताल में ट्रामा यूनिट में शार्ट सर्किट से आग लगने के कारण 8 मरीजों की मौत हो गई है। अगर ऐसे में जिला अस्पताल के किसी वार्ड में आगजनी की घटनाएं होती हैं तो इसका जिम्मेदार कौन होगा ?
70 लाख का कार्य अधर में
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिला अस्पताल में कई सालों बाद पहली बार फायर सेफ्टी का कार्य शुरू किया गया, जिसका ठेका अश्विनी इंफ्रस्ट्रक्चर लिमिटेड को दिया गया है। बताया गया कि जिला अस्पताल में फायर सेफ्टी के लिए स्मोक डिटेक्टर, अलार्म सिस्टम और स्प्रिंकलर लगाने करीब 70 लाख खर्च किया जाना है। फायर सेफ्टी सिस्टम में अलार्म सिस्टम, स्मोक डिटेक्टर, स्प्रिंकलर और पाइपलाइन के जरिये आग बुझाने का कार्य शामिल है। जानकारी के मुताबिक जिला अस्पताल में कुछ वाडों में पाइपलाइन तो बिछा दी गई है लेकिन अभी कई वाडों में काम बाकी है। बड़ी बात यह है कि ठेकेदार द्वारा किये जा रहे सेफ्टी कार्य को बंद कर दिया गया था जो अभी तक शुरू नहीं हुआ। सूत्रों ने बताया कि जिला अस्पताल का फायर एनओसी भी एक्सपायर हो चूका है। नए सिरे से एनओसी लेने के लिए फायर सेफ्टी का कार्य पूरा होना जरूरी है लेकिन ठेकेदार द्वारा काम बंद कर देने के कारण अभी फायर एनओसी लेने में समय लगना लाजमी है।
वाटर स्टोरेज में पेंच
फायर सेफ्टी में सबसे जरूरी तो पानी है जिसमे बड़ी पेंच फंसी है। बताया गया कि फायर सेफ्टी के लिए डेढ़ लाख लीटर के पानी स्टोरेज के लिए अंडर ग्राउंड वाटर टैंक आवश्यक है जिसके लिए जगह ही फाइनल नहीं हो पा रही है। प्रबंधन ने वाटर स्टोरेज के लिए अस्पताल परिसर के पीछे पड़ी जगह जहां किचन है वहां बनाना सुनिश्चित किया है, जबकि ठेकेदार द्वारा निर्माणाधीन 150 बिस्तरा अस्पताल के अंडर ग्राउंड में बनाने की जिद पकड़ रखी है। ठेकेदार और प्रबंधन के बीच ठनाठनी के चलते जिला अस्पताल में फायर सेफ्टी का काम अधूरा पड़ा है।
400 बिस्तरा अस्पताल
जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की मरीज क्षमता 400 बिस्तरा है जबकि पीक सीजन में 600 से अधिक मरीजों को भर्ती कर इलाज करना पड़ता है। बताया गया कि जिला अस्पताल में रोजाना औसतन 1200 के करीब मरीज ओपीडी में अपना इलाज कराने पहुंचते हैं। अगर ऐसे में आगजनी की घटना घटित होती है तो इतने लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है। गौरतलब है कि जिला अस्पताल के स्पेशल न्यूबोर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में वर्ष 2014 में भीषण आगजनी की घटना घटी थी। इस वार्ड में नवजात बच्चों को इलाज के लिए भर्ती किया जाता है। जानकारों ने बताया कि वर्ष 2014 में एयर कंडीशनर में शार्ट सर्किट होने के कारण आगजनी की घटना घटित हुई थी। इसके बाद इस प्रकार के संवेदनशील वार्डों में अग्निशामक यंत्रो के इंतजाम किए गए थे।
जिला अस्पताल के सभी संवेदनशील वार्डों में फायर सेफ्टी के इंतजाम किए गए हैं। अस्पताल परिसर के सभी वार्डों में भी फायर सेफ्टी का कार्य शुरू है। फायर सेफ्टी के कार्य का टेंडर डायरेक्ट्रेट से दिया गया है। अगर यह कार्य बंद है तो इसकी जांच कराई जाएगी।
डॉ. मनोज शुक्ला, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल


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