सतना में गैस की किल्लत के बीच जलाऊ लकड़ी के दाम बढ़ गए हैं। मेमू ट्रेनों से खुलेआम लकड़ी ढुलाई हो रही है, जिससे यात्रियों की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
मुंबई लोकल की तर्ज पर रेलवे ने छोटे स्टेशनों में सफर करने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए हाई टेक मेमू ट्रेन तो दौड़ाई, लेकिन इसमें 'लकड़ी' की भी सवारी हो रही है। ट्रेन यात्रियों से ज्यादा लकड़ी ढोने का साधन बनती नजर आ रही है। खुलेआम जंगलों से जलाऊ लकड़ी के बड़े-बड़े गट्ठे सतना जंक्शन के प्लेटफार्म क्रमांक-1 पर उतारकर शहर में खपा दी जाती है।
गैस की किल्लत के बीच अब इन लकड़ी के गट्ठों के दाम बढ़ गए हैं। बताया गया कि 130 रुपये में अभी तक बिकने वाले गट्ठे अब 150 रुपये के हो गए हैं। 20 रुपये प्रति गट्ठे के दाम बढ़ा दिए गए हैं। जानकारी के अनुसार मानिकपुर-सतना मेमू ट्रेन से रोजाना बड़ी मात्रा में जलाऊ लकड़ी लाई जा रही है। बाकायदा प्लेटफार्म क्रमांक एक में उतरती है और महिलाएं आनन-फानन में स्टेशन एंड की तरफ लेकर निकल पड़ती हैं। भीड़-भाड़ वाले प्लेटफार्म में लकड़ी के गट्ठे यात्रियों के लिए कभी भी खतरा बन सकते है। हालांकि लकड़ी लेकर आने वाली महिलाएं गरीब परिवार की रहती है। लकड़ी बेच कर ही इनके घरों का चूल्हा जलता है।
एक रुपये का भी राजस्व नहीं
कोरोना काल के पहले जब मेमू ट्रेन के पहले पैसेंजर ट्रेन चलती तो उस वक्त जबलपुर मंडल रेल प्रबंधक ने ट्रेन में लकड़ी लाने वाली महिलाओं के लिए एमएसटी बनवाने के निर्देश दिए थे। यह भी स्पष्ट किया था कि केवल पैसेंजर ट्रेन के पार्सल यान लकड़ी लाई जा सकेगी। बताया जाता है कि मेमू में पार्सल यान का डिब्बा ही नहीं है।
बैठने की जगह नहीं और गट्ठों की भरमार
एक तरफ ट्रेनों में यात्रियों को बैठने की जगह तो दूर पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती है। मेमू का भी कई बार यही हाल रहता है। ऐसे में लकड़ी के गट्ठों की ठुलाई यात्रियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर रही है। बताया गया कि मानिकपुर-सतना मेमू ट्रेन में गट्ठे सतना जंक्शन में एवं उचेहरा स्टेशन में उतरते हैं। सतना आने के बाद यह गाड़ी सतना-कटनी मेमू बनकर चलती है। जानकार बताते हैं कि मेमू ट्रेन में सर्वाधिक लकड़ी बांसा पहाड़, चितहरा, मझगवां सहित अन्य प्वाइंट्स से चढ़ाई जा रही है।


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