जल निकायों की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों को आर्द्रभूमियों की जमीनी जांच कर सीमाएं तय करने के लिए 4 महीने का समय दिया और कहा कि पानी जीवन के अधिकार से जुड़ा है।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
देश में लगातार कम हो रहे और उपेक्षित पड़े जल निकायों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब बात इतने महत्वपूर्ण और मूल्यवान जल स्रोतों के संरक्षण की हो, तो अदालतें मूकदर्शक बनी नहीं रह सकतीं। पीठ ने कहा कि पीने के पानी का मुख्य स्रोत होने के कारण जल निकाय बेहद कीमती हैं और ये संविधान द्वारा दिए गए 'जीवन के अधिकार' के तहत आते हैं। अदालत ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) की मौके पर जाकर भौतिक जांच करें और उनकी सीमाओं को स्पष्ट रूप से चिह्नित करें।
सर्वोच्च अदालत (न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ) ने पर्यावरण संरक्षण के इस कार्य को गंभीरता से लेते हुए राज्यों और आर्द्रभूमि प्राधिकरणों को पूर्व में जारी निर्देशों का स्मरण कराया। पीठ ने निर्देश दिया कि यदि अभी तक किसी क्षेत्र में जल निकायों की जमीनी स्तर पर पड़ताल पूरी नहीं हुई है, तो उसे तुरंत पूरा किया जाए। इसके साथ ही अधिकारियों को यह बताना होगा कि उन्होंने जांच के लिए किस कार्यप्रणाली को अपनाया और इसका पूरा ब्यौरा अनुपालन हलफनामे में देना होगा।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि आर्द्रभूमि से जुड़े नियमों को अधिसूचित हुए 9 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी इनकी सीमाओं का निर्धारण और भौतिक सत्यापन अधूरा है। शुरुआत में शीर्ष अदालत ने हलफनामा दाखिल करने के लिए केवल चार सप्ताह की मोहलत देने की बात कही थी। हालाँकि, वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा जमीनी स्तर पर लगने वाली विस्तृत मेहनत और विभिन्न विभागों के आपसी तालमेल में होने वाली देरी का हवाला दिए जाने के बाद, अदालत ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए चार महीने की अंतिम समय-सीमा तय की।
सुप्रीम कोर्ट यह महत्वपूर्ण आदेश पर्यावरण कार्यकर्ता और पक्षी प्रेमी आनंद आर्य, अधिवक्ता एम.के. बालकृष्णन और गैर-सरकारी संगठन 'वनशक्ति' द्वारा दाखिल की गई जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान सुनाया। अदालत ने माना कि व्यापक जमीनी कार्य और अंतर-विभागीय समन्वय में समय लगता है, लेकिन जल निकायों को बिना सुरक्षा के लावारिस छोड़ना पर्यावरण और नागरिकों के अधिकारों के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है।
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