विंध्य विकास प्राधिकरण में नियुक्तियों के बाद भाजपा में खुशी के साथ असंतोष भी दिखा। समर्पित कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित मान रहे हैं, जबकि बिना कार्यालय और बजट के विकास कार्यों पर सवाल उठ रहे हैं।

हाइलाइट्स:
रीवा, स्टार समाचार वेब
लंबे इंतजार के बाद आखिरकार विंध्य विकास प्राधिकरण में नियुक्तियों का पिटारा खुल गया है। सत्ता और संगठन ने अपने खास सिपहसालारों को जिम्मेदारी की 'लाल बत्ती' तो थमा दी है, लेकिन इस फैसले ने भाजपा के भीतर वर्षों से पसीना बहा रहे समर्पित कार्यकर्ताओं के चेहरों पर मायूसी की लकीरें भी खींच दी हैं। पार्टी की गाइडलाइन और अनुशासन की घुट्टी पिए ये कार्यकर्ता अब 'मन मसोसकर' जिंदाबाद के नारे लगाने को मजबूर हैं।
पार्टी के गलियारों में यह चर्चा आम है कि जो कार्यकर्ता निष्ठा के साथ वर्षों से काम कर रहे थे, उन्हें उम्मीद थी कि इस बार संगठन उन्हें मुख्य धारा में लाएगा। हालांकि, बगावत के डर से कोई खुलकर नहीं बोल रहा, पर अंदरूनी मलाल साफ देखा जा सकता है। एक तरफ नियुक्तियों का जश्न है, तो दूसरी तरफ उन बुझे हुए चेहरों की खामोशी जो पार्टी के लिए 'रीढ़ की हड्डी' माने जाते हैं। कार्यकर्ता जिंदाबाद के नारे तो लगा रहे हैं, पर उनके मन की टीस यह है कि सत्ता और संगठन ने उनकी निष्ठा का उचित मोल नहीं लगाया।
दौड़ में थे कई दिग्गज, पर कइयों के हाथ खाली
प्राधिकरण में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पदों के लिए रीवा और आसपास के जिलों से दिग्गजों ने भोपाल की खाक छानी थी। पूर्व भाजपा अध्यक्ष अजय सिंह पटेल की सक्रियता रंग लाई और पार्टी ने उन्हें उपाध्यक्ष पद से नवाजा है। जबकि वरिष्ठ भाजपा नेत्री माया सिंह, जिन्होंने इस पद के लिए रीवा से भोपाल तक एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, उनके हाथ इस बार भी खाली रहे। चुरहट से आने वाले विंध्य विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष सुभाष सिंह भी भोपाल में डेरा डाले हुए थे। पुरानी रसूख और अपनी गुणा-गणित के सहारे वे फिर से कमान संभालने की जुगत में थे, लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी बिसात इस बार नहीं बैठ पाई।
बिना दफ्तर कैसे होगा 'विंध्य का विकास'
नियुक्तियां तो हो गईं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बैठेंगे कहां। सिरमौर चौराहे पर स्थित प्राधिकरण का पुराना कार्यालय अब इतिहास बन चुका है, क्योंकि वहां अब आईटी पार्क का निर्माण हो रहा है। फिलहाल प्राधिकरण के पास न तो बैठने के लिए जगह है और न ही कोई सुसज्जित सेटअप।
सिर्फ तमगा या धरातल पर काम
राजनैतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि भाजपा ने चुनाव और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के लिए नेताओं को 'पद का तमगा' तो दे दिया है, लेकिन प्राधिकरण के पास विकास कार्यों के लिए पर्याप्त बजट का प्रावधान अब तक स्पष्ट नहीं है। बिना कार्यालय और बिना बजट के विकास का पहिया रफ्तार पकड़ेगा या यह केवल कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने का एक राजनैतिक लॉलीपॉप बनकर रह जाएगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।


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