बच्चों का गुस्सा अब सिर्फ छोटी-मोटी जिद या शरारत तक सीमित नहीं रह गया है। कम उम्र में मारपीट, हिंसक प्रतिक्रिया और दूसरों को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं कई सवाल खड़े कर रही हैं। क्या मोबाइल और सोशल मीडिया पर देखी जा रही सामग्री बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर रही है? क्या सोशल मीडिया के इस दौर में परिवार में बदलते रिश्ते, उपेक्षा और तनाव भी इसकी वजह बन रहे हैं? क्या इन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं? बच्चों के व्यवहार से जुड़े शोध और विशेषज्ञों की राय इन्हीं सवालों की पड़ताल करते हैं।

मोबाइल की दुनिया और सोशल मीडिया के दौर में परिवार का माहौल कैसे गढ़ रहे हैं उनका व्यवहार ?
छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन, गुस्सा और हिंसक प्रतिक्रिया की बढ़ती प्रवृत्ति।
भावनात्मक दूरी, अकेलापन, लगातार उदासी और अवसाद का बढ़ता खतरा।
-मीतेन्द्र नागेश | भोपाल
स्कूल में बच्चे अक्सर एक-दूसरे को परेशान करते हैं। यह स्कूल में उनके खेल और मस्ती का एक हिस्सा होता है। स्कूल का परिसर तीसरी क्लास का एक बच्चा केजी की एक बच्ची के साथ कुछ शरारत करता है, जिससे परेशान होकर बच्ची उसे पागल कह देती और टीचर्स से उसकी शिकायत करने का बोलती है। यहां तक दृश्य सामान्य है। कुछ देर बाद बच्चा फिर उस बच्ची के पास आता है। बहाने से उसे एक खाली क्लासरूम में ले जाता है और उस बच्ची पर पैरों और र्इंटों से हमला कर देता। आक्रामकता इतनी की वह बच्ची की जान लेने पर उतारू था। एक दूसरी घटना, 4 साल का बच्चा चॉकलेट खा रहा था। पड़ोस की एक 12 साल की लड़की उस बच्चे से चॉकलेट लेकर खा लेती। इस पर छोटे बच्चे की मां उस लड़की को डांट देती है। नाराज लड़की बच्चे को चॉकलेट देने के बहाने अपने घर बुलाती और पानी से भरी एक टंकी में धक्का दे देती है। पानी में डूबने से मासूम की मौत हो गई।
ये घटना सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर मासूम मन में झुंझलाहट क्यों?
रिसर्च कहती है कि बच्चों और किशोरों के व्यवहार में सोशल मीडिया के उपयोग के असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। तमिलनाडु और केरल के 220 विद्यार्थियों पर किए गए एक अध्ययन में सोशल मीडिया की लत और आक्रामक व्यवहार के बीच कड़ियां जुड़ी मिलती है। ‘इंडियन जर्नल आॅफ साइकोलॉजिकल साइंस’ के जुलाई 2024 अंक में प्रकाशित इस अध्ययन में पाया गया कि सोशल मीडिया की लत का संबंध केवल गुस्से और दूसरों के प्रति नकारात्मक सोच से ही नहीं, बल्कि शारीरिक आक्रामकता से भी है।
कर्नाटक के कुंदापुरा तालुक में 960 स्कूली विद्यार्थियों पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया कि 10 से 12 साल के 28.8% बच्चों के सोशल मीडिया प्रोफाइल थे। वहीं, 13 से 16 साल के किशोरों में यह आंकड़ा 60.8% था। चिल्ड्रन एंड यूथ सर्विसेज रिव्यू के जुलाई 2026 अंक में प्रकाशित इस अध्ययन में साइबरबुलिंग सहित आॅनलाइन गतिविधियों से जुड़े जोखिमों का भी आकलन किया गया। हालांकि अध्ययन सीधे बच्चों की मारपीट या शारीरिक आक्रामकता पर केंद्रित नहीं था, लेकिन कम उम्र में ही बच्चों का डिजिटल दुनिया से जुड़ जाना, सोशल मीडिया पर फैली आक्रमता का प्रभाव इनके कोमल मन पर पड़ना और इनके व्यवहार में आक्रामकता आ जाने से इंकार नहीं किया जा सकता।
हाल की घटनाएं-
पागल कहने पर 6 साल की बच्ची पर जानलेवा हमला
पंचकूला के शहीद मेजर अनुज राजपूत राजकीय संस्कृति मॉडल स्कूल के तीसरी क्लास में पढ़ने वाला एक 8 साल के बच्चा केजी में पढ़ने वाली 6 साल की बच्ची पर जानलेवा हमला करता है। बताया गया कि आरोपी छात्र ने बच्ची के साथ कुछ शरारत की। उसकी शरारत से परेशान होकर बच्ची ने उसे पागल कह दिया और टीचर्स से उसकी शिकायत करने की बात कही। थोड़ी देर बाद लड़का फिर उसके पास आया और कहा कि उसके पापा उसे ऊपर कमरे में बुला रहे हैं। उसका विश्वास कर बच्ची उसके साथ स्कूल के फर्स्ट फ्लोर के एक क्लास रूम में चली गई, जहां बच्चे ने उस पर बेहरमी से हमला कर दिया।
चॉकलेट पर डांट का बदला लेने मासूम की हत्या
मंदसौर जिले के शामगढ़ की पंजाबी कॉलोनी में भी एक मामला सामने आया चॉकलेट को लेकर हुई मामूली कहासुनी के बाद एक नाबालिग लड़की ने 4 साल के बच्चे की हत्या कर दी गई। घटना से कुछ दिन पहले छोटा बच्चा चॉकलेट खा रहा था। इसी दौरान लड़की ने उससे चॉकलेट लेकर खा ली थी। इस पर बच्चे की मां ने उसे डांट दिया था। इसी बात से नाराज होकर 12 साल की नाबालिग ने बच्चे को चॉकलेट देने के बहाने अपने घर बुलाया। टंकी के ढक्कन से स्टोन (पत्थर) हटाया और बच्चे को पानी में धक्का दे दिया, जिससे डूबने से उसकी मौत हो गई।
अध्ययन क्या कहते हैं-
कम उम्र में स्क्रीन का इस्तेमाल बच्चों के गुस्से से जुड़ा
छोटे बच्चों में टैबलेट और मोबाइल का इस्तेमाल उनके भावनात्मक व्यवहार से भी जुड़ा हो सकता है। जामा पीडियाट्रिक्स में 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन में कनाडा के 315 बच्चों पर शोध किया गया। इसमें पाया गया कि साढ़े तीन साल की उम्र में टैबलेट का अधिक इस्तेमाल करने वाले बच्चों में एक साल बाद गुस्से और चिड़चिड़ेपन की प्रवृत्ति अधिक थी। यह अध्ययन गुस्से और भावनात्मक व्यवहार पर था।
छोटे बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याओं का खतरा
पुर्तगाल में 2 से 6 साल के 940 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में स्मार्टफोन के इस्तेमाल और बच्चों की व्यवहार संबंधी समस्याओं के बीच संबंध पाया गया। चिल्ड्रन एंड यूथ सर्विसेज रिव्यू के मई 2026 अंक में प्रकाशित शोध के अनुसार, रोजाना स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं अधिक देखी गईं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि भोजन के समय स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याओं की आशंका अधिक थी। दो साल या उससे कम उम्र में स्मार्टफोन से परिचित हुए बच्चों में भी ऐसी समस्याओं का संबंध सामने आया।
मासूम हाथों में मोबाइल, माता-पिता की भूमिका भी अहम
छह साल या उससे कम उम्र के बच्चों में मोबाइल और टैबलेट के इस्तेमाल पर 17 देशों के 39 अध्ययनों की समीक्षा की गई। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (बीएमजे) पब्लिक हेल्थ में जून 2026 में प्रकाशित इस शोध ‘कोरिलेट्स आॅफ मोबाइल डिवाइस यूज इन यंग चिल्ड्रेन: अ सिस्टेमैटिक रिव्यू एंड मेटा-एनालिसिस’ में बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल और माता-पिता के अपने मोबाइल इस्तेमाल के बीच संबंध पाया गया। माता-पिता के टैबलेट और स्मार्टफोन इस्तेमाल के साथ बच्चों के इन उपकरणों के इस्तेमाल का भी संबंध सामने आया। इसके अलावा, माता-पिता के तनाव और बच्चों के स्मार्टफोन इस्तेमाल के बीच भी संबंध मिला।
एक्सपर्ट व्यू-
बच्चों से ज्यादा माता-पिता को है काउंसलिंग की जरूरत...
मोबाइल और सोशल मीडिया एक बड़ी वजह है।
बहुत हद तक कम उम्र में बच्चों के हाथ में मोबाइल और टैब जैसे गेजेट आ जाना और सोशल मीडिया से उनका परिचय हो जाना, उनके व्यवहार में नकारात्मकता का बीज बो रहे हैं। बच्चों के व्यवहार में जिद्दीपन और आक्रामकता के पीछे उनके हाथों में कम उम्र मोबाइल आ जाना एक बड़ा कारण है। सोशल मीडिया पर कई तरह का कंटेंट बिखरा पड़ा है। इसमें ऐसे कंटेंट भी हैं, जो मस्तिष्क पर एक नकारात्मक आघात करते हैं, खासतौर पर बच्चों के कोमल मन पर। बच्चों में जिद्द करने की प्रवृत्ति, अभिभावकों पर गुस्सा और हिंसक व्यवहार के रूप में इसके नतीजे हमारे सामने हैं।
बच्चों से बात करने की फुरसत किसके पास है।
बच्चों की बात सुनने का समय किसी के पास नहीं है। न ही परिवार में और न ही स्कूल में बच्चों को ज्यादा सुना जाता है। जब भी बच्चे अपने मन की बात शेयर करना चाहते हैं, तो उन्हें रोक-टोक और डांट का सामना करना पड़ता है। उनके विचारों को कोई सुनना नहीं चाहता है।
हिंसा का उसे बहुत एक्सपोजर मिलता है।
ऐसे में उसके मन में बदला लेने की भावना पैदा होती है और किसी से झगड़े या अन्य किसी कारण से ऐसी स्थिति बनने पर वह आक्रामक व्यवहार करता है। साफतौर पर कहे तो वह बदला ही लेना चाहता है, हर उस बात का जिसके कारण उसके अंदर गुस्सा, तनाव और दबाव की स्थिति निर्मित हुई है।
हिंसा उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं होती, अफसोस भी नहीं करते।
जब बच्चा अपने घर में, समाज में और सोशल मीडिया में हिंसा को रोजमर्रा की दिनचर्या में देखता है, तो उसके लिए यह एक सामान्य बात हो जाती है। उनके लिए हिंसा करना कोई बड़ी बात नहीं होती। बस गुस्सा आया और कर दिया। सबसे खतरनाक तो यह है कि उनको इसका कोई अफसोस नहीं होता, बल्कि उनके लिए यह सामान्य होता है।
केमिकल डिस-आॅर्डर भी एक कारण हो सकता है
घर में किसी मानसिक बीमार व्यक्ति के आक्रामक और हिंसक व्यवहार का असर भी बच्चों के बालमन पर पड़ता है। इसे केमिकल डिस-आॅर्डर कहा जाता है। जब भी इस तरह का व्यवहार करने लगते हैं।
माता-पिता की चूके, काउंसलिंग की जरूरत उनको ज्यादा
अक्सर इन मामलों में बच्चों की काउंसलिंग की जाती है, लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण माता-पिता की काउंसलिंग है। आज अक्सर माता-पिता दोनों ही जॉब करते हैं। इस व्यस्ता में वे बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते। बच्चों को जन्म देना और उसकी जरूरतें पूरी करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसकी अच्छी परवरिश करना, जिसका सबसे मजबूत और जरूरी हिस्सा है उसके व्यक्तित्व का निर्माण करना। उसके व्यवहार को उम्र के मुताबिक सामान्य बनाये रखने के लिए अच्छा माहौल देना, लेकिन माता-पिता यही चूक जाते हैं। नतीजा आसपास के माहौल में बच्चा ढलने लगता है।
-डॉ. काकोली रॉय, कंसल्टेंट क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, ‘हर-हेल्थ’ हॉस्पिटल भोपाल
क्या सोशल मीडिया के इस दौर में परिवार में बदलते रिश्ते, उपेक्षा और तनाव बचपन में बढ़ती हिंसा और बच्चों में आक्रामकता की एक वजह है?
इस विषय को केवल सोशल मीडिया को प्रभाव के रूप में देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे परिवार और समाज में तेजी से बदल रहे रिश्तों, संवाद की कमी, भावनात्मक उपेक्षा और तनावपूर्ण पारिवारिक माहौल की भी एक भूमिका लग रही है। आज कई परिवारों में साथ रहने के बावजूद आपसी संवाद और भावनात्मक जुड़ाव कम होता जा रहा है। माता-पिता अपनी व्यस्तताओं, काम के दबाव और अन्य तनावों में उलझे हैं, वहीं बच्चे अपनी भावनाओं, असुरक्षाओं और समस्याओं को साझा करने के लिए पर्याप्त समय और सहज माहौल नहीं पाते। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म इस स्थिति को और जटिल बना सकते हैं। बच्चे वहां जो हिंसक सामग्री, आक्रामक व्यवहार और संवाद के तरीके देखते हैं, उनका असर उनकी सोच और व्यवहार पर पड़ रहा है। समस्या सिर्फ स्क्रीन टाइम की नहीं, बल्कि यह भी है कि बच्चे देख क्या रहे हैं और उन्हें किस तरह का माहौल मिल रहा है।
-राकेश कुमार मालवीय, एसोसिएट डायरेक्टर, विकास संवाद भोपाल

बच्चों का गुस्सा अब सिर्फ छोटी-मोटी जिद या शरारत तक सीमित नहीं रह गया है। कम उम्र में मारपीट, हिंसक प्रतिक्रिया और दूसरों को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं कई सवाल खड़े कर रही हैं। क्या मोबाइल और सोशल मीडिया पर देखी जा रही सामग्री बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर रही है? क्या सोशल मीडिया के इस दौर में परिवार में बदलते रिश्ते, उपेक्षा और तनाव भी इसकी वजह बन रहे हैं? क्या इन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं? बच्चों के व्यवहार से जुड़े शोध और विशेषज्ञों की राय इन्हीं सवालों की पड़ताल करते हैं।
भारत की चक्रवात पूवार्नुमान प्रणाली में पिछले दशक में सुधार हुआ है। हालांकि, 2025 के आंकड़े एक दूसरी चुनौती भी दिखाते हैं। इस साल चक्रवात के मार्ग का अनुमान लगाने में त्रुटि पिछले पांच वर्षों के औसत से बढ़ी, जबकि तीव्रता का अनुमान बेहतर रहा। सवाल है कि इन आंकड़ों से भारत की पूवार्नुमान क्षमता में सुधार की कितनी स्पष्ट तस्वीर उभरती है।
यह कथा भारत के उस हृदय प्रदेश की है, जो आज भारत के नक्शे के ठीक बीचों-बीच एक समृद्ध राज्य के रूप में मुस्कुराता है। लेकिन समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाइए। 1947 का वह ऐतिहासिक सवेरा, जब देश की फिजाओं में आजादी की नई सांस घुली थी, उस वक्त मध्य प्रदेश नाम की कोई पहचान अस्तित्व में ही नहीं थी।
बीमा पॉलिसी बेचने के लिए कंपनियां एजेंटों, बैंकों, ब्रोकरों और दूसरे डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों को कमीशन देती हैं। इस व्यवस्था में कमीशन कितना हो, किस उत्पाद पर कितना भुगतान उचित है और क्या ज्यादा कमीशन पाने की होड़ में ग्राहक को उसकी जरूरत से अलग पॉलिसी बेची जा सकती है—इन सवालों पर भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने नए सिरे से विचार शुरू किया है।
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