जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। हर रविवार को सुशील शर्मा की कलम से

मंत्री पर भारी महिला अधिकारी
शिक्षा से जुड़े महकमे के मंत्री जी पर एक महिला अधिकारी भारी पड़ गईं। साहब ने जैसे-तैसे उनका तबादला करवाकर अपनी पसंद के अधिकारी को उस कुर्सी पर बैठा तो दिया, ताकि मलाई काटी जा सके, लेकिन जाते-जाते महिला अधिकारी ऐलानिया कह गईं कि वह जल्द ही इसी सीट पर वापस लौटेंगी। उस वक्त अधीनस्थों ने उनकी बात को मजाक में लिया, मगर जब महिला अधिकारी की उसी पद पर वापसी हो गई तो सबके सुर बदल गए। अब वही अधीनस्थ दबे स्वर में कह रहे हैं, पहुंच हो तो ऐसी! दरअसल, मंत्री जी ने महिला अधिकारी को हटाने के लिए जो गुणा-भाग लगाया था, वह कामयाब नहीं हो पाया। महिला अधिकारी की वापसी ने साहब के पूरे खेल को ही बिगाड़ दिया। अब मंत्री जी के सामने नई चुनौती है और वे नए सिरे से अपनी अगली चाल चलने की कोशिश में जुट गए हैं। उधर, महकमे में चर्चा है कि जब अधिकारी की वापसी हो ही गई, तो अब आगे साहब कौन-सा दांव चलते हैं!
पूर्व के गुण गाएंगे, इकने काम न आएंगे
प्रदेश सरकार ने स्वामित्व योजना को बड़े लाव-लश्कर के साथ लॉन्च किया था। उम्मीद थी कि योजना जमीन पर उतरेगी तो आम लोगों को फायदा होगा और सरकार की मंशा भी पूरी होगी। लेकिन पटवारियों की आनाकानी और योजना से जुड़े जोखिमों को लेकर उनके पीछे हटने से पूरा मामला उलझ गया। हालात ऐसे बने कि पूरे 20 दिन तक एक भी रजिस्ट्री नहीं हुई। विभागीय मंत्री जी मीडिया के सामने पटवारियों को गरियाते रहे, लेकिन सियासी गलियारों में कहानी कुछ और ही सुनाई जा रही है। चर्चा है कि विभाग संभालने वाले मंत्री जी जब पूर्व मुखिया के गुणगान में मंच से लेकर मंच के पीछे तक जुटे रहते हैं, तो फिर मौजूदा मुखिया की राह आसान बनाने की उम्मीद इन मंत्रीजी से की भी जाए तो कैसे? मंत्री जी के करीबियों के हवाले से तो यह भी कहा जा रहा है कि सरकार की किरकिरी से उन्हें कोई खास बेचैनी नहीं थी। उलटे, इसे पूर्व मुखिया तक एक सियासी संदेश पहुंचाने के मौके के तौर पर देखा जा रहा था। अब सवाल यही है कि जब सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ही अटक जाए, तो जिम्मेदारी तय करने और उसे पटरी पर लाने का काम कौन करेगा? मंत्री पद सिर्फ विभाग संभालने का नाम नहीं, सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने की जवाबदेही भी है।
माननीय के कितने दागी
वैसे तो माननीय का चुनावी जलवा कम नहीं है। जहां से चुनाव लड़ते हैं, जीतकर ही लौटते हैं और अपनी छवि भी बेहद सहज, सरल और डाउन टू अर्थ नेता की बनाए रखते हैं। लेकिन अब उनके इर्द-गिर्द उठते सवालों ने इस छवि पर चर्चा तेज कर दी है। मामला उनके एक ओएसडी पर लगे कथित रिश्वतखोरी के आरोपों से जुड़ा है। आरोप सामने आते ही माननीय ने आनन-फानन में उन्हें अपने यहां से हटा दिया, लेकिन सियासी गलियारों में सवाल उठने लगे हैं कि आखिर उनके यहां पदस्थ होने वाले अधिकारियों पर बार-बार ऐसे आरोप क्यों लगते हैं? चर्चा इसलिए भी गर्म है, क्योंकि इससे पहले उनके एक पूर्व ओएसडी का नाम परिवहन विभाग की भर्तियों से जुड़े कथित विवाद में सामने आ चुका है। उधर, उनके विधानसभा क्षेत्र में एमडी ड्रग्स बनाने वाली फैक्ट्री पकड़े जाने के बाद आरोपियों के साथ माननीय की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल होने की चर्चा रही। माननीय की दिल्ली तक मजबूत पकड़ होने की चर्चाएं भी राजनीतिक हलकों में होती रहती हैं। शायद यही वजह है कि विरोधियों के सवालों के बावजूद उनकी कुर्सी पर अब तक कोई आंच नहीं आई। लेकिन इस बार मामला सीधे कथित रिश्वतखोरी के आरोपों से जुड़ा है। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि माननीय इस विवाद से कैसे पार पाते हैं। फिलहाल सवाल यही है, क्या इस बार भी सियासी रसूख भारी पड़ेगा या जवाबदेही का सामना करना होगा?
जब दिग्गी को याद आए शाह
वैसे तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते, लेकिन पिछले दिनों सियासी कहानी में दिलचस्प मोड़ आ गया। अपनी सनातन यात्रा की जानकारी देने के लिए बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में माननीय शाह की तारीफों के पुल बांधते नजर आए। यह सुनकर वहां मौजूद मीडियाकर्मी भी कुछ पल के लिए भौंचक रह गए।दिग्गी राजा ने नर्मदा परिक्रमा का किस्सा सुनाते हुए बताया कि जब उनकी यात्रा गुजरात पहुंची थी, तब वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अमित शाह का संदेश लेकर आए थे। संदेश यह था कि माननीय की यात्रा में किसी तरह की परेशानी न हो, इसका पूरा ध्यान रखा जाए। अब शाह के इस पुराने प्रसंग को याद कर दिग्विजय सिंह ने उनकी तारीफ की तो सियासी गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू होना लाजिमी था। बहरहाल, राजनीति में विरोध अपनी जगह है और व्यक्तिगत अनुभव अपनी जगह। लेकिन अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि दिग्गी राजा की सनातन यात्रा जब उत्तर प्रदेश में प्रवेश करेगी, तब वहां का सियासी और प्रशासनिक अनुभव कैसा रहता है। क्या वहां भी ऐसा ही संदेश मिलेगा, या फिर कहानी कुछ अलग होगी? फिलहाल, इस यात्रा के अगले पड़ाव का इंतजार रहेगा!
माननीय के क्षेत्र में ही गोकशी
माननीय सनातन और गो-संरक्षण के मुद्दे पर खुलकर बोलते हैं। उनके बयानों में इतना दम होता है कि मीडिया को भी सुर्खियों के लिए मसाला मिल जाता है। इसकी एक वजह उनका बजरंग दल से जुड़ा राजनीतिक सफर भी माना जाता है। लेकिन दो दिन पहले उनके विधानसभा क्षेत्र में गोवध से जुड़ा कथित कसाईखाना उजागर होने के बाद अब उनके दावों और जमीनी हकीकत को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि माननीय के क्षेत्र में उनकी मर्जी के बिना परिंदा भी पर नहीं मार सकता। नगर निगम से लेकर पुलिस और स्थानीय प्रशासन में पदस्थापना में भी उनका दखल रहता हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि यदि इतना बड़ा अवैध कारोबार लंबे समय से चल रहा था, तो स्थानीय तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? और यदि जानकारी थी, तो कार्रवाई में देरी क्यों हुई? बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले की चर्चा अब संघ स्तर तक भी पहुंच गई है। बड़ा सवाल यह है कि गोकशी की जानकारी गोरक्षकों को मिल गई और माननीय के सिपहसलारों को गोकशी की भनक तक नहीं थी। अब देखना यह है कि गो-संरक्षण की बात करने वाले माननीय इस मामले में जवाबदेही तय करने की पहल करते हैं या फिर जिम्मेदारी किसी दूसरे के सिर डालकर आगे बढ़ जाते हैं।
साहब का काफिला फिर बढ़ा हो गया
मध्यप्रदेश के एक कद्दावर मंत्री ने बड़े जोर-शोर से अपने वाहनों के काफिले में गाड़ियां कम करने का ऐलान कर खूब वाहवाही बटोरी थी। संदेश भी यही दिया गया कि प्रधानमंत्री मोदी की सादगी और मितव्ययिता की सीख पर अमल हो रहा है। लेकिन लगता है कि यह संदेश कुछ दिनों तक ही प्रभावी रहा। चंद दिनों बाद ही साहब के काफिले में गाड़ियों की संख्या फिर बढ़ने लगी। साहब भी क्या करें! जब से दिल्ली गए हैं, मप्र की याद बार-बार सताने लगी है। मन तो आखिर अपने प्रदेश में ही रमता है। मगर अब मामला थोड़ा पेचीदा हो गया है। साहब के कुछ शुभचिंतकों ने उनके काफिले की गाड़ियों का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया है और इसकी खबरें दिल्ली तक पहुंचाने की चर्चा है। अब देखना यह है कि साहब का काफिला फिर छोटा होता है या गाड़ियों की संख्या बढ़ने का सिलसिला यूं ही जारी रहता है!

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किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
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ग्वालियर की चंबल माटी से छात्र राजनीति के शिखर तक पहुंचे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता से मध्य प्रदेश युवा आयोग के अध्यक्ष बने प्रवीण शर्मा के साथ स्टार समाचार की खास बातचीत।
मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है।
पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है।
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2021 से 2025 तक जब 20% तक एथेनॉल मिलाया जा रहा था, तब कोई विरोध नहीं हुआ। अब संसद सत्र से ठीक पहले विरोध का माहौल बनाया जा रहा है, जिसके पीछे विदेशी ताकतें और ऑयल लॉबी का हाथ है।
स्टार समाचार, स्टार स्ट्रेट, सुशील शर्मा, साप्ताहिक कॉलम