मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।

मप्र की 47 आरक्षित सीटों के लिए आदिवासी क्षेत्र बने दोनों दलों का केंद्र
छात्र कार्ड बनाम स्वामित्व योजना के बहाने युवा को लुभाने की सीधी जंग
छात्रों की गूंज की काट में नितिन नवीन ने हुंकारभर दिखाया भाजपा का दम
संघ का वैचारिक चक्रव्यूह और हारी 66 सीटों पर बिप्लब देब की घेराबंदी
शाही मास्टरस्ट्रोक से सहकारिता-गोपालकों के जरिए ओबीसी-ग्रामीण गणित
अरविंद मिश्र। भोपाल
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है। दरअसल, मध्यप्रदेश की सत्ता का रास्ता मुख्य रूप से युवा मतदाताओं, आदिवासी वर्ग और किसानों से होकर गुजरता है। यही वजह है कि दोनों ही राजनीतिक दल भाजपा-कांग्रेस इन्हीं तीन बड़े वोट बैंकों को केंद्रित कर अपनी रणनीति बुन रहे हैं। कांग्रेस अपनी खोई जमीन वापस पाने और संगठन में नई ऊर्जा भरने के लिए आक्रामक तेवर अपना रही है, तो वहीं भाजपा अपने माइक्रो-मैनेजमेंट और एंटी-इंकंबेंसी से निपटने के लिए किसी भी स्तर पर ढील देने के मूड में नहीं है। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
युवा: गणित बनाने-बिगाड़ने वाली ताकत
मध्यप्रदेश के आगामी चुनाव में युवा मतदाता सबसे निर्णायक भूमिका में रहने वाले हैं। प्रदेश में फर्स्ट टाइम वोटर्स और नए युवाओं की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, जो किसी भी दल का समीकरण पलटने की क्षमता रखते हैं। इसी कारण दोनों ही दल युवाओं को आकर्षित करने के लिए सीधी रणनीति पर काम कर रहे हैं। युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर, पारदर्शी और समयबद्ध प्रतियोगी परीक्षाएं, स्टार्टअप को बढ़ावा देने वाली योजनाएं और प्रत्यक्ष जुड़ाव के लिए युवा संवाद जैसे कार्यक्रमों पर फोकस किया जा रहा है।
युवा इसलिए खास: मध्य प्रदेश में 18 से 29 वर्ष की आयु के युवा मतदाताओं की संभावित संख्या 1.52 करोड़ से 1.63 करोड़ के बीच है।
आदिवासी: सत्ता का संतुलन तय करने वाला फैक्टर
राज्य की सत्ता का संतुलन काफी हद तक आदिवासी वर्ग के मतों पर निर्भर करता है। मध्यप्रदेश में आदिवासियों के लिए 47 सीटें पूरी तरह आरक्षित हैं, जबकि कई अन्य सामान्य विधानसभा सीटों पर भी इनका सीधा और प्रभावी दखल रहता है। यही वजह है कि राहुल गांधी और भाजपा के शीर्ष नेता सीधे आदिवासी इलाकों में दस्तक दे रहे हैं। इस वर्ग को साधने के लिए पेशा कानून का क्रियान्वयन, जल-जंगल-जमीन से जुड़े वनाधिकार, आदिवासी संस्कृति का मान-सम्मान और बुनियादी विकास योजनाओं को मुख्य एजेंडे में रखा गया है।
आदिवासी अहम: मध्यप्रदेश में 21 से 22 फीसदी हिस्सा एसटी वर्ग का है। जहां मतदाताओं की संख्या करीब 1.53 करोड़ है।
किसान: कृषि प्रधान राज्य की सबसे बड़ी सियासी जंग
मध्यप्रदेश मूलत: एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां की अधिकांश ग्रामीण आबादी सीधे तौर पर खेती-किसानी से जुड़ी है। इस कारण किसान वर्ग हमेशा से चुनावों में एक बड़ा और असरदार वोट बैंक रहा है। किसानों को अपने पाले में लाने के लिए राजनीतिक दलों का पूरा ध्यान कृषि अर्थव्यवस्था पर केंद्रित रहता है। फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद, खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए सिंचाई परियोजनाएं, सस्ती और निर्बाध बिजली दरें। समय पर खाद-बीज की उपलब्धता जैसे मुद्दे इस वर्ग के बीच सबसे प्रमुख हैं।
अन्नदाता बने केंद्र: मध्यप्रदेश की 170 सीटें ऐसी हैं जहां किसान वोट निर्णायक भूमिका में हैं। 80 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों से है।
कांग्रेस का मिशन-2028 एमपी: वोटर को साधने की मास्टर रणनीति

मध्य प्रदेश में चुनावी बिसात बिछ चुकी है, और कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी के ताबड़तोड़ दौरे इस बात का सीधा संकेत हैं कि पार्टी अब किसी भी मोर्चे पर ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। 15 दिनों के भीतर मध्य प्रदेश का दूसरा और एक ही साल में चौथा दौरा केवल संयोग नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस की एक सोची-समझी और आक्रामक चुनावी रणनीति का हिस्सा है।
बालाघाट दौरा: 47 आदिवासी सीटों का पावर गेम
राहुल गांधी का अचानक बालाघाट दौरा आदिवासी वोट बैंक को साधने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। मध्य प्रदेश की 47 आरक्षित आदिवासी विधानसभा सीटें राज्य का राजनीतिक संतुलन तय करती हैं। इतिहास गवाह है कि आदिवासियों का दिल जीतने वाली पार्टी ही भोपाल की गद्दी तक पहुंचती है। बालाघाट जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में आदिवासियों के बीच पहुंचकर सीधा संवाद कर राहुल गांधी ने जल, जंगल-जमीन और स्वास्थ्य सेवाओं का तीखा मुद्दा उठाया।
इंदौर में छात्रों की गूंज: युवाओं पर नजर
19 सितंबर को इंदौर में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम की सफलता ने कांग्रेस के चुनावी अभियान में नई ऊर्जा भरी है। इंदौर में कांग्रेस का यह कार्यक्रम देश के सबसे सफल आयोजनों में से एक रहा, जहां भारी संख्या में युवा राहुल गांधी को सुनने पहुंचे। युवाओं और छात्रों के साथ संवाद के जरिए कांग्रेस ने रोजगार, शिक्षा और सिस्टम की असफलताओं को सीधे युवा वोटरों के सामने रखा।
केन-बेतवा: प्रभावित किसानों से मुलाकात
राहुल गांधी ने केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित पन्ना और छतरपुर के किसानों और आदिवासियों से भी मुलाकात की थी। 20 प्रभावित किसान दिल्ली पहुंचकर राहुल गांधी से मिले थे और उन्होंने इस मुद्दे को संसद में उठाने, उचित मुआवजा तथा पुनर्वास की मांग करने का कड़ा वादा किया था।
संगठन सृजन अभियान: नेताओं को कसने की नींव
जून 2025 में राहुल गांधी का भोपाल दौरा पूरी तरह से कांग्रेस के आंतरिक संगठन को मजबूत करने के लिए समर्पित था। बिना किसी बड़े जनसैलाब के, केवल पार्टी कार्यकतार्ओं और नेताओं के साथ संवाद करके उन्होंने बूथ और ब्लॉक स्तर पर संगठन की कमियों को दूर करने की कोशिश की और नेताओं को गुटबाजी छोड़ काम पर फोकस करने की सख्त हिदायद दी।
पचमढ़ी प्रशिक्षण: आंदोलन का पढ़ाया पाठ
नवंबर 2025 में मध्यप्रदेश कांग्रेस ने अपने नवनियुक्त 71 जिला अध्यक्षों के लिए 10 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन पचमढ़ी में किया था। इस शिविर में राहुल गांधी मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए और उन्होंने कांग्रेस नेताओं को अपसी गुटबाजी छोड़ जनांदोलन का सख्त पाठ पढ़ाया।
मध्यप्रदेश में मोर्चे पर डटी भाजपा...छात्र कार्ड की हवा निकालने उतरे नवीन

मध्य प्रदेश में सियासी पारा शबाब पर है। मालवा-निमाड़ की राजनीति के केंद्र इंदौर में 19 सितंबर को होने वाले राहुल गांधी के छात्रों की गूंज से ठीक 48 घंटे पहले भाजपा ने अपने संगठनात्मक हथियार यानी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन को मोर्चे पर उतार दिया। नितिन नवीन ने राहुल गांधी के इवेंट का नैरेटिव बनने से पहले ही माहौल को अपने पक्ष में मोड़ दिया। भाजपा ने इस जवाबी हमले से साफ संकेत दे दिया कि वह विपक्ष को बढ़त का कोई मौका नहीं देगी।
गवर्नेंस और डिलिवरी का ठोस मॉडल
राहुल गांधी की रणनीति पर पानी फेरते हुए भाजपा ने कांग्रेस को जवाब किसी खोंखले भाषण से नहीं, बल्कि ठोस डिलिवरी मॉडल से दिया। इंदौर में स्वामित्व योजना के तहत फ्री रजिस्ट्री वितरण कर भाजपा अध्यक्ष ने ग्रामीण युवाओं और परिवारों को सीधे जमीन का मालिकाना हक सौंपने का कड़ा संदेश दिया।
बूस्टर डोज और बूथ की किलेबंदी
नितिन नवीन ने सीधे भाजयुमो और पार्टी के मूल कैडर की बैठकें लीं। उन्होंने युवा मोर्चे को निर्देश दिए कि राहुल गांधी के आरोपों की काट के लिए सीधे कॉलेज कैंपस, कोचिंग सेंटरों और बूथ स्तर तक युवाओं से संपर्क साधा जाए।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: उज्जैन का दीपोत्सव
भाजपा ने अपने पारंपरिक और सबसे मजबूत कार्ड सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का खुलकर इस्तेमाल किया। उज्जैन में प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित दीपोत्सव और शिप्रा आरती में नितिन नवीन शामिल हुए। बाबा महाकाल की नगरी से निकला यह संदेश पूरे मालवा अंचल में गूंजा।
आरएसएस का चक्रव्यूह...उज्जैन में युवा धर्म संसद से भागवत ने साधा यूथ एजेंडा

मध्य प्रदेश में एक तरफ जहां राजनीतिक दलों के बीच चुनावी शह-मात का खेल तेज है। वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी जमीनी स्तर पर युवाओं के बीच अपनी वैचारिक किलेबंदी मजबूत कर दी है। उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देशभर से जुटे युवाओं से सीधा संवाद किया। गीता भवन में आयोजित इस तीन दिवसीय महासंगम में भागवत ने देश के कोने-कोने से आए लगभग 1,700 युवाओं की शंकाओं का समाधान किया और उन्हें राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने का मंत्र दिया। युवाओं के बीच फैलते भ्रम और दिशाहीनता पर चिंता जताते हुए उन्होंने आह्वान किया कि वे किसी भी तरह के दुष्प्रचार का शिकार होने के बजाय देश के विकास में नेतृत्व संभालें।

बिप्लब देब की घेराबंदी- साफ संदेश- निष्क्रियता बर्दाश्त नहीं होगी
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के मध्य प्रदेश दौरे से ठीक 24 घंटे पहले भाजपा ने अपनी राजनीतिक और सांगठनिक मशीनरी को पूरी तरह झोंक दिया। भाजपा के प्रदेश प्रभारी बिप्लब कुमार देब और सह-प्रभारी रेखा वर्मा ने भोपाल पहुंचकर मोर्चा संभाला। भाजपा कोर कमेटी की मैराथन बैठक के बाद यह साफ हो गया कि पार्टी का पूरा फोकस उन 66 हारी हुई सीटों और कम अंतर से जीती गई विधानसभाओं पर है, जहां संगठन को अभेद्य किला बनाने की नई बिसात बिछाई जा रही है। बैठक का सबसे अहम राजनीतिक पहलू पिछली विधानसभा में हारी हुई 66 सीटों की एक्सेरे रिपोर्ट तैयार करना रहा। बूथ, मंडल और विधानसभा स्तर पर संगठन की जहां भी दरारें हैं, उन्हें तुरंत भरने के निर्देश दिए गए हैं। जिन सीटों पर भाजपा 5,000 या उससे कम वोटों के मामूली अंतर से जीती थी, वहां खतरे की घंटी मानते हुए जनप्रतिनिधियों और संगठन के बीच तालमेल बिठाने का कड़ा टास्क दिया गया है।

भोपाल से साधा ओबीसी और ग्रामीण वोट बैंक
-भाजपा के चाणक्य अमित शाह का मेगा प्लान
-गौपालक और कामधेनु योजना का मास्टरस्ट्रोक
इधर, मध्य प्रदेश की राजनीति अब हाई-वोल्टेज मैराथन में तब्दील हो चुकी है। भाजपा के चाणक्य और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तय दौरा कार्यक्रम से एक दिन पहले ही देर रात राजधानी भोपाल पहुंचे। 23 घंटे के इस तूफानी दौरे के जरिए शाह ने न केवल कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव की हवा निकाली, बल्कि सहकारिता और पशुपालन के जरिए राज्य के सबसे बड़े ओबीसी और ग्रामीण वोट बैंक की किलेबंदी कर दी। भेल दशहरा मैदान में आयोजित गौपालक सम्मेलन भाजपा का बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। शाह ने पशुपालकों के लिए बोनस राशि जारी करने के साथ-साथ गौशालाओं की वित्तीय सहायता और गौपालक दीदियों का सम्मान कर सीधे ग्रामीण परिवारों में पैठ बनाई। डॉ. भीमराव आंबेडकर कामधेनु योजना के तहत स्वीकृति पत्र बांटकर भाजपा ने स्वरोजगार और दुग्ध उत्पादन को सामाजिक न्याय के एजेंडे से जोड़ दिया। समारोह के दौरान शाह का संदेश बिल्कुल साफ था-राज्य में डेयरी और सहकारिता नेटवर्क को गुजरात की तर्ज पर मजबूत कर बूथ स्तर के ग्रामीण मतदाताओं को पार्टी से सीधे जोड़ना। इस मेगा आयोजन ने साबित कर दिया कि भाजपा हर राजनीतिक चुनौती को निष्प्रभावी करने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।
मप्र: हर 5 में से 1 व्यक्ति आदिवासी
-सियासी समीकरण में बड़ा दखल
मध्यप्रदेश में करीब हर 5 में से 1 व्यक्ति आदिवासी है। 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य की आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी 21.1 फीसदी थी, जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर दिखता है। मध्यप्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीट हैं। इसमें 47 सीटें एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। यही नहीं 37 अन्य समान्य सीटों पर भी इस गर्व का दखल है। मध्यप्रदेश में कुल 84 सीटों पर आदिवासी वोट का सीधा असर है। वहीं बैतूल-हरदा मध्यक्षेत्र का हिस्सा है। बैतूल की दो सीटें भाजपा के पास और हरदा की एक सीट पर कांग्रेस काबिज है। इसी तरह मध्यप्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, जिसमें 6 सीटें एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं।
एसटी 47 सीटों का परिणाम
2018: कांग्रेस की सरकार
कांग्रेस: 30 सीटें जीती
भाजपा: 16 सीटें जीती
2023: भाजपा की वापसी
भाजपा: 25 सीटें जीती
कांग्रेस: 21 पर सिमटी
बाप: 01 सीट में सेध
2023:अंचलवार स्थिति
महाकोशल-विंध्य
कुल: 22 सीटें
भाजपा 14 सीट जीती
कांग्रेस 08 पर विजय
मालवा-निमाड़
कुल 22 सीटें
भाजपा 09 सीट जीती
कांग्रेस 12 पर सिमटी
बाप 01 सीट जीती

मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
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