सरकारी दफ्तरों के अंदर की हलचल, तबादलों में पारदर्शिता, और प्रशासनिक गलियारों के दिलचस्प किस्से। जानिए कैसे बदल रही है काम करने की संस्कृति और क्या है अधिकारियों के 'जुगाड़' का सच।

जब चाय की चुस्कियाँ अब बनीं युद्ध का मैदान

एक विभाग में नए अपर मुख्य सचिव का आना ऐसा लगा, मानो किसी सुस्त पड़े अस्पताल में अचानक "इमरजेंसी' का सायरन बज गया हो। कभी जो बाबू फाइलों के ढेर को तकिया बनाकर चाय की चुस्कियों के साथ गपशप में मशगूल रहते थे, आज वे रिव्यू मीटिंग में ऐसे मुस्तैद हैं जैसे कुरुक्षेत्र के मैदान में जाने की तैयारी हो। साहब की "सख्ती' का असर यह है कि अब केबिन में जाने से पहले अधिकारियों को अपनी फाइलें कम और अपनी धड़कनें ज्यादा चेक करनी पड़ रही हैं। अनुशासन का डंडा जब चलता है, तो सुस्ती का पैरालाइज्ड मरीज भी ओलंपिक एथलीट की तरह दौड़ने लगता है, यह हमने देख लिया है!
"स्ट्रेट-फॉरवर्ड' तड़का: सिफारिशों का "डिब्बा बंद'

एक बड़े विभाग में मंत्री जी और महिला प्रशासनिक प्रमुख की जुगलबंदी आजकल 'हॉट केक' बनी हुई है। मंत्री जी ने सिफारिशों की ऐसी झड़ी लगाई कि दफ्तर में कागजों का पहाड़ खड़ा हो गया, लेकिन मैडम की टेबल वह 'ब्लैक होल' है जहाँ हर सिफारिश जाकर 'डिब्बा बंद' हो जाती है। मंत्री जी के चेहरे पर जो असहजता है, वह साफ बताती है कि 'किंतु-परंतु' की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। अब जंग दिलचस्प है—मंत्री जी की 'राजनीतिक हठ' और मैडम के 'प्रशासनिक पत्थर' में से कौन पहले घिसेगा? फिलहाल तो मैडम का 'स्ट्रेट-फॉरवर्ड' तड़का, मंत्री जी की रसोई का जायका बिगाड़ने के लिए काफी है।
"तबादला उद्योग' का सन्नाटा: दलालों के लिए "मंदी का दौर'

जिस विभाग में कभी तबादलों का 'शेयर बाजार' बुलंदी पर होता था, वहाँ इस बार मंदी की ऐसी मार पड़ी है कि दलाल सड़क पर आ गए हैं। 10 हजार तबादले हुए और मजाल है कि किसी बिचौलिये की तिजोरी में एक चवन्नी भी खनक पाई हो! 9200 तबादले ऑनलाइन और विकल्प आधारित थे—यानी पूरी तरह से 'सिस्टम-सेट'। केवल 800 तबादलों में थोड़ा 'सियासी तड़का' लगा, वरना बाकी विभाग इस पारदर्शी नीति से इतना हैरान है कि उन्हें लग रहा है कहीं वे गलत दफ्तर तो नहीं आ गए! जो कल तक 'रेट कार्ड' लेकर घूमते थे, वे आज खुद को 'बेरोजगार' घोषित करने की कगार पर हैं।
आईपीएस की "यू-टर्न' वाली जुगाड़: कुर्सी का "कल्ट'

पुलिस मुख्यालय में एक आईपीएस अधिकारी की "जादूगरी' को देखकर जादूगर भी अपनी छड़ी तोड़ लें। साहब को सरकार ने क्या लूप-लाइन में भेजा, उन्होंने अपनी पहुंच के इतने सटीक तीर चलाए कि चंद महीनों में ही मलाईदार पोस्टिंग वापस पा ली। मगर "दबंगई' का रोग भी बड़ी बला है, साहब का मन अब यहाँ भी नहीं टिक रहा। सुना है, नई 'जुगाड़' की तलाश शुरू हो चुकी है, आखिर दबंगई और कुर्सी का साथ तो जन्मों-जन्मों का है। कुर्सी हिलती है तो साहब का मन डोलता है, और मन डोलता है तो फिर से नई "जुगाड़' का ताना-बाना बुना जाता है।
मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष एवं पूर्व आईएएस अधिकारी शिवनारायण सिंह चौहान ने पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी और सदस्य सचिव हर्षल पंचोली पर संस्था के कामकाज में बाधा डालने तथा 237 ‘डीम्ड ईसी’ जारी करने में अनियमितताओं के दोषी तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी एवं सदस्य सचिव उमा महेश्वरी पर कार्रवाई की मांग की है।
मैदान पर पसीना बहाता हुआ एक युवा खिलाड़ी, जिसकी आंखों में देश के लिए मेडल जीतने का सपना है, और दूसरी तरफ जिन्हें खेल का ‘क, ख, ग’ भी नहीं मालूम, वे नेता और उनके ‘राजदुलारे’ खेल संघों के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। पढ़िए स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है-क्या सूबे की अफसरशाही साहस के संकट से जूझ रही है। नियमों का इकबाल बुलंद करना तो दूर, व्यवस्था में कोई ऐसा दबंग चेहरा नजर नहीं आता जो मनमानी करने वालों पर सीधे नकेल कस सके।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। हर रविवार को सुशील शर्मा की कलम से
किशोर कल्पीवार, साक्षात्कार, स्टार विशेष
मध्यप्रदेश में भले ही अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना तय है, लेकिन राज्य का राजनीतिक पारा अभी से उफान पर आ गया है। दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व समय से दो साल पहले ही मैदान में उतर चुका है। इंदौर, उज्जैन, बालाघाट से लेकर भोपाल तक दिग्गजों की आवाजाही और बैठकों के दौर ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए घेराबंदी शुरू हो चुकी है।
जानिए मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों की अंदरूनी खबरें। निर्माण विभाग की वेबसाइट से संपत्ति का ब्योरा गायब, दो संभागों में अफसरों की तनातनी और अन्य चर्चित मामले विस्तार से पढ़ें।
ग्वालियर की चंबल माटी से छात्र राजनीति के शिखर तक पहुंचे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता से मध्य प्रदेश युवा आयोग के अध्यक्ष बने प्रवीण शर्मा के साथ स्टार समाचार की खास बातचीत।
मध्य प्रदेश भाजपा में संगठन महामंत्री का पद केवल एक राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच वैचारिक संतुलन, सख्त अनुशासन और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने वाली मुख्य धुरी माना जाता है। नौ महीनों से इस शीर्ष पद का खाली होना पार्टी के भीतर एक बड़ी ‘कमी’ को बयां कर रहा है।
पॉलिसी बेचते समय मुस्कुराते चेहरों के साथ कैशलेस इलाज और झटपट दावों का प्रलोभन देने वाली बीमा कंपनियों की असलियत क्लेम के वक्त सामने आ रही हैं। नियम-शर्तों की बारीक लाइनों का जाल बुनकर आम जनता की गाढ़ी कमाई हड़पने और उनके दावों को खारिज करने की मनमानी का यह खेल अब बड़ी समस्या बन चुका है।

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