सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई जिसमें रेत खनन रॉयल्टी को वास्तविक खनन से जोड़ा गया था। अब अंतिम सुनवाई तक MP के रेत ठेकेदारों को पूरी ठेका राशि का भुगतान करना होगा, भले ही खनन कम हुआ हो। जानें इस फैसले के मायने और प्रभाव।

रेत ठेकेदारों को नहीं मिलेगी 'छूट', पूरी रॉयल्टी चुकाने का आदेश!
मध्यप्रदेश सरकार को रेत खनन विवाद में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है, जबकि राज्य के रेत ठेकेदारों को करारा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि सरकार ठेकेदारों से केवल उतनी ही रॉयल्टी वसूल सकती है, जितनी रेत का खनन वास्तव में हुआ है। इस अंतरिम आदेश के बाद, अब अंतिम सुनवाई होने तक मध्यप्रदेश के रेत ठेकेदारों को अपने ठेके की पूरी भुगतान राशि सरकार को देनी होगी, भले ही उन्होंने तय मात्रा से कम खनन किया हो।
दरअसल, विवाद की जड़ मध्यप्रदेश की खनन नीति 2019 है। इस नीति के तहत, राज्य सरकार रेत खदानों की नीलामी करती है, जिसमें ठेकेदारों को एक निश्चित मात्रा में रेत निकालने की अनुमति मिलती है। इसके लिए एक निर्धारित रॉयल्टी कीमत भी होती है। नीति का मुख्य प्रावधान यह है कि बोली में लगाई गई कीमत ठेकेदार को हर हाल में सरकार को देनी होती है। शुरुआत में यह भुगतान हर तीन महीने में होता था, लेकिन बाद में इसे बदलकर मासिक कर दिया गया। इस नियम के कारण, यदि ठेकेदार किसी कारणवश तय मात्रा में रेत का खनन नहीं कर पाता, तब भी उसे सरकार को पूरी बोली राशि का भुगतान करना पड़ता है।
ठेकेदारों ने इस नियम को चुनौती दी थी, क्योंकि उन्हें अक्सर पर्यावरणीय स्वीकृतियों में देरी या अन्य कारणों से खनन में बाधाओं का सामना करना पड़ता था। उदाहरण के तौर पर, नर्मदापुरम जिले के एक रेत ठेकेदार ने 118 खदानों के लिए बोली लगाई थी, जिसमें उसे लगभग 80 लाख घन मीटर खनन की अनुमति मिली थी और 110 करोड़ रुपये सरकार को देने थे। लेकिन पर्यावरणीय स्वीकृति न मिलने के कारण वे खनन नहीं कर पाए और पैसा नहीं दिया, जिस पर खनन विभाग ने नोटिस भेज दिया।
24 फरवरी 2025 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ठेकेदारों को बड़ी राहत देते हुए फैसला सुनाया था कि सरकार का यह नियम "गैरकानूनी" है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सुरेश कुमार कैत की बेंच ने कहा था कि कानून के अनुसार, केवल निकाली गई रेत (खनिज) पर ही रॉयल्टी ली जा सकती है। इसलिए, हाईकोर्ट ने उन नियमों को रद्द कर दिया था जो ठेकेदारों को कम खनन के बावजूद पूरा भुगतान करने के लिए बाध्य करते थे।
मध्यप्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सरकार ने तर्क दिया कि ठेकेदारों से ली जाने वाली यह राशि "रॉयल्टी" नहीं, बल्कि एक "ठेका भुगतान" है, जो नीलामी की शर्तों के तहत तय होता है। सरकार ने यह भी दलील दी कि यदि ठेकेदारों को इस तरह की छूट दी गई, तो राज्य के राजस्व को हजारों करोड़ रुपये का भारी घाटा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के तर्कों को स्वीकार करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। जब तक अंतिम सुनवाई नहीं होती, तब तक ठेकेदारों को अपनी पूरी ठेका राशि का भुगतान करना होगा।
खनन विभाग के सूत्रों के अनुसार, इस पूरे विवाद में एक 'खेल' भी होता है। अक्सर रेत ठेकेदार एक जगह की बोली लगाते हैं, लेकिन खनन कहीं और करते हैं। चूंकि उन्हें दूसरी जगह से निकाली गई रेत पर रॉयल्टी नहीं देनी पड़ती, इसलिए वे तय जगह से रेत निकालने से बचते हैं। इसके बाद वे पर्यावरणीय स्वीकृति न मिलने का बहाना बनाते हैं, जिससे सरकार को करोड़ों का चूना लगता है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश से ऐसे 'खेल' पर कुछ हद तक लगाम लगने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आहत मध्यप्रदेश सरकार को फिलहाल मामूली लेकिन महत्वपूर्ण राहत मिली है। इस आदेश ने राज्य सरकार को कानूनी बल प्रदान किया है, जिसके आधार पर वह अब ठेकेदारों से करोड़ों रुपये का बकाया वसूल कर सकती है। कई रेत ठेकेदारों पर पहले से ही करोड़ों रुपए की देनदारी बकाया है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अंतिम सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि मध्यप्रदेश की खनन नीति और रेत ठेकेदारों का भविष्य क्या होगा।
ठेकेदारों की स्थिति
यह फैसला रेत ठेकेदारों के लिए एक बड़ा झटका है, और यह उनके लिए एक कठिन स्थिति पैदा कर सकता है।
पर्यावरण संरक्षण
यह फैसला पर्यावरण संरक्षण के लिए एक सकारात्मक कदम हो सकता है, क्योंकि इससे रेत खनन की अनियमितता को रोका जा सकता है।
377 रेत खदानें
मध्य प्रदेश में कुल 377 रेत खदानें हैं। 2023-24 के दौरान 394 रेत खदानों ने एमसीडीआर रिटर्न जमा किया है। राज्य खनिज निगम 18 जिलों में रेत खदानें संचालित करता है। इसमें ग्वालियर, भिंड, दतिया, देवास, हरदा, होशंगाबाद, सीहोर, रायसेन, टीकमगढ़, जबलपुर, नरसिंहपुर, खरगौन, धार, बड़वानी, खण्डवा, कटनी, सतना और उमरिया शामिल है।
कुल खदानें:
मध्य प्रदेश में कुल 377 रेत खदानें हैं जिनकी पर्यावरण स्वीकृति के लिए जनसुनवाई की जाती है।
उत्खनन:
44 जिलों में 101 रेत खदानों से अग
ले तीन साल में तीन करोड़ 11 लाख घन मीटर रेत निकालने की योजना।
नीलामी:
मध्य प्रदेश सरकार ने 42 जिलों में 1150 रेत खदानों की कुल 3 करोड़ 79 लाख घन मीटर रेत की नीलामी के लिए 947 करोड़ का रिजर्व प्राइज रखा था।

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