नेपाल में चीन बॉर्डर के पास भीषण बाढ़ से भारी तबाही हुई है। सैकड़ों लोगों की मौत और लापता होने के बाद नेपाल ने घरेलू एजेंसियों पर भरोसा जताते हुए विदेशी रेस्क्यू टीमों के ऑफर्स ठुकरा दिए हैं।

नेपाल में चीन सीमा के पास स्थित कस्बों और गांवों में कुदरत का ऐसा कहर टूटा है कि चारों तरफ तबाही का मंजर नजर आ रहा है। भयानक बाढ़ और मलबे के सैलाब के कारण देश के कई हिस्से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन का बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है, लेकिन इस आपदा ने देश के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
इस विनाशकारी बाढ़ के कारण बुधवार से लेकर अब तक लगभग 472 लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि 1,500 से अधिक लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। घटनास्थल पर बचावकर्मी कीचड़, पत्थरों और मलबे के बीच फंसे लोगों को तलाशने में जुटे हुए हैं। इस बीच, नई झीलों के बनने से क्षेत्र में बाढ़ और तबाही का खतरा और ज्यादा बढ़ गया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री ने बताया कि मदद के प्रस्ताव आना स्वाभाविक है, लेकिन हमारी घरेलू सुरक्षा एजेंसियां सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन को पूरी मुस्तैदी से संभाल रही हैं और फिलहाल हमें बाहरी मदद की आवश्यकता नहीं है।
नेपाल सरकार को भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे कई प्रमुख देशों से अपनी सर्च और रेस्क्यू टीमों को इस संकट की घड़ी में भेजने की पेशकश मिली थी। हालांकि, प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि नेपाल ने अपनी सेना, पुलिस और अन्य स्थानीय एजेंसियों की दक्षता और क्षमताओं पर पूरा भरोसा जताने का निर्णय लिया है।
इससे पहले, भारत ने भारतीय वायुसेना (IAF) की दो उड़ानों के जरिए बाढ़ प्रभावित नेपाल को 47.5 टन की भारी-भरकम इमरजेंसी राहत सामग्री भेजी थी। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि नेपाल की हर संभव मांग पर तेजी से काम किया जा रहा है। इस राहत सामग्री में टेंट, कंबल, जीवन रक्षक दवाइयां, खाद्य सामग्री, जनरेटर और अन्य जरूरी सामान शामिल हैं। इसके अलावा, भारत नेपाल में कनेक्टिविटी को बहाल करने और राहत कार्यों को गति देने के लिए बेली ब्रिज का निर्माण भी कर रहा है।
नेपाली सेना और पुलिस की विशेष सिफारिश पर यह कड़ा निर्णय लिया गया है। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि नेपाल को चीन और अन्य मित्र देशों से भी बचाव टीमों को भेजने के प्रस्ताव मिले थे, जिन्हें प्रशासनिक कारणों से अस्वीकार करना पड़ा। यह फैसला मुख्य रूप से वर्ष 2015 के गोरखा भूकंप के दौरान के कड़वे अनुभवों से प्रभावित है, जब बड़ी संख्या में विदेशी बचाव टीमों के आने से आपसी तालमेल और प्रबंधन में भारी दिक्कतें पैदा हुई थीं। अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे के अनुसार, 2015 के उस भयानक भूकंप में लगभग 9,000 लोग मारे गए थे और 23,000 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
भले ही नेपाल ने प्रत्यक्ष रूप से विदेशी बचाव टीमों को अपने यहां आने से मना कर दिया हो, लेकिन देश 'वन-डोर मैकेनिज्म' (One-Door Mechanism) के तहत आर्थिक और वित्तीय सहायता स्वीकार कर रहा है। सरकार ने अपने विदेशी मिशनों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे केवल 'प्रधानमंत्री राहत कोष' (Prime Minister Relief Fund) के माध्यम से ही आर्थिक मदद मांगें। कई देशों ने पहले ही वित्तीय सहायता का ऐलान कर दिया है, जबकि अन्य देश राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण कार्यों के लिए आगे आए हैं। एप्पल के सीईओ टिम कुक ने भी इस आपदा में डोनेशन देने का वादा किया है। इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन और विश्व बैंक ने भी बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद की घोषणा की है।
एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के अध्यक्ष मासातो कांडा ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बातचीत कर बैंक के पूर्ण समर्थन का भरोसा दिलाया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि तात्कालिक आपातकालीन सहायता के अलावा, बैंक नेपाल में बेहतर जोखिम आकलन (Risk Assessment), अर्ली वार्निंग सिस्टम और मजबूत बुनियादी ढांचे के विकास के जरिए देश की आपदा तैयारी और सहनशक्ति को मजबूत करने में मदद जारी रखेगा।
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि अमेरिका नेपाल को हरसंभव मानवीय सहायता देने के लिए पूरी तरह तैयार है। वहीं, ब्रिटिश विदेश सचिव एड मिलिबैंड ने नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनल से बात कर ब्रिटेन सरकार के समर्थन से अवगत कराया और लापता ब्रिटिश नागरिकों की खोजबीन के प्रयासों समेत रेस्क्यू ऑपरेशन का अपडेट लिया।
इस बीच, नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बाढ़ की चपेट में आए विदेशी नागरिकों की सहायता और समन्वय के लिए एक विशेष 'इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम' (ERT) का गठन किया है। यह टीम मंत्रालय के भीतर एक केंद्रीय समन्वय निकाय के रूप में कार्य करेगी, जो प्रभावित, लापता या संकट में फंसे विदेशी नागरिकों के लिए खोज, बचाव, सूचना सत्यापन और कॉन्सुलर सहायता को सुगम बनाएगी।
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