पन्ना-खजुराहो रेल परियोजना में पहले 54,578 पेड़ों की कटाई के बाद अब नए एलाइनमेंट से 50 हजार और पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है। दूरी, लागत और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर रेलवे की योजना सवालों के घेरे में है।

हाइलाइट्स:
पन्ना, स्टार समाचार वेब
ललितपुर-सिंगरौली रेल खण्ड के पन्ना-खजुराहो रेल लाइन परियोजना एक बार फिर चर्चा और विवादों के केंद्र में आ गई है। रेलवे द्वारा इस परियोजना के लिए दोबारा सर्वे कराए जाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों ने कई सवाल खड़े किए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब पन्ना और खजुराहो के बीच सड़क मार्ग की दूरी महज 35 किलोमीटर है, तो रेलवे लाइन को लगभग 72 किलोमीटर लंबा क्यों बनाया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, परियोजना के प्रारंभिक सर्वे और निर्माण कार्यों के दौरान रेलवे ने लगभग 24.78 करोड़ रुपये खर्च कर 54,578 पेड़ों की कटाई करवाई थी। लेकिन अब सामने आया है कि पहले निर्धारित रूट में कई तकनीकी और सुरक्षा संबंधी खामियां थीं। बताया जा रहा है कि पुराने रूट में खतरनाक मोड़ और जटिल संरचनात्मक चुनौतियां सामने आने के कारण रेलवे ने उसे बीच में ही छोड़ दिया और ट्रैक को लगभग एक किलोमीटर दूर नए एलाइनमेंट पर ले जाने की योजना बनाई है। इस नए एलाइनमेंट के कारण करीब 50 हजार अतिरिक्त पेड़ों की कटाई की आशंका जताई जा रही है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि शुरूआती सर्वे सही तरीके से किया गया होता तो हजारों पेड़ों की अनावश्यक कटाई और करोड़ों रुपये के खर्च से बचा जा सकता था। स्थानीय नागरिकों का तर्क है कि यदि पन्ना टाइगर रिजर्व को रेल लाइन के सीधे मार्ग में बाधा बताया जा रहा है, तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इसी क्षेत्र में केन-बेतवा लिंक परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और निर्माण कार्य पहले से जारी हैं। ऐसे में कम दूरी वाले सीधे रेल मार्ग का विकल्प क्यों नहीं अपनाया गया, यह एक महत्वपूर्ण सवाल बन गया है। बढ़ते विवाद और जनचर्चा को देखते हुए रेलवे ने अब पुराने और नए दोनों रूटों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए जांच समिति गठित की है। लोगों की मांग है कि समिति केवल तकनीकी पहलुओं तक सीमित न रहे, बल्कि दूरी, लागत, पर्यावरणीय नुकसान और जनहित को ध्यान में रखते हुए सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन करे। अब सभी की निगाहें रेलवे की नई सर्वे रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि पुन: सर्वे में कम दूरी वाला मार्ग व्यवहारिक साबित होता है, तो इससे न केवल परियोजना की लागत कम हो सकती है बल्कि हजारों पेड़ों को कटने से भी बचाया जा सकता है।
यह परियोजना अब केवल रेलवे विकास का नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और योजनागत जवाबदेही का भी बड़ा मुद्दा बन चुकी है।


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