रैगांव क्षेत्र में डालमिया सीमेंट के लिए कृषि भूमि प्रक्रिया के विरोध में ढाई हजार किसान 500 से अधिक ट्रैक्टर लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे। किसानों ने उपजाऊ जमीन बचाने की मांग रखी, जनसुनवाई स्थगित।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
डालमिया सीमेंट के लिए कृषि भूमि दिए जाने की प्रक्रिया के विरोध में मंगलवार को रैगांव विधानसभा क्षेत्र के किसानों का आक्रोश सड़कों पर उतर आया। कोलाड, डाम्हा, रजरवारा, महकोना, बसुधा, नवस्ता, छींदा, सप्ती, हिलौंधा, हिलौधा सहित आसपास के गांवों से करीब ढाई हजार किसान 500 से अधिक ट्रैक्टरों में सवार होकर मौहारी टोल प्लाजा पहुंचे। सुबह करीब नौ बजे शुरू हुई ट्रैक्टर रैली सिविल लाइन होते हुए दोपहर करीब एक बजे कलेक्ट्रेट पहुंची। करीब 15 किलोमीटर का यह सफर चार घंटे में तय हुआ। सैकड़ों ट्रैक्टरों के कलेक्ट्रेट पहुंचने के बाद शहर की यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हुई।
कलेक्ट्रेट पहुंचते ही किसानों को बैरिकेडिंग कर रोक दिया गया। इसके बाद किसान सड़क पर ही धरने पर बैठ गए। उनकी मांग थी कि वे अपनी जमीन से जुड़े मुद्दे पर जिला कलेक्टर से सीधे बात करेंगे और ज्ञापन भी उन्हीं को सौंपेंगे। दोपहर एक बजे से शाम साढ़े पांच बजे तक किसान धरने पर डटे रहे। करीब साढ़े चार घंटे की ट्रैक्टर यात्रा के बाद पांच घंटे से अधिक चला यह धरना प्रशासन के लिए भी बड़ा संदेश बन गया।
कलेक्टर नहीं पहुंचे, फिर प्रतिनिधिमंडल से हुई चर्चा
किसान लंबे समय तक कलेक्टर के आने का इंतजार करते रहे। अपर कलेक्टर विकास सिंह ज्ञापन लेने पहुंचे तो किसानों ने पहले ज्ञापन देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि वे अपनी बात सीधे कलेक्टर के सामने रखना चाहते हैं। हालांकि बाद में कलेक्टर ने किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने जमीन से जुड़े किसानों की आपत्तियां और मांगें उनके सामने रखीं। कलेक्टर ने किसानों को आश्वस्त किया कि उनकी मांगों को राज्य शासन तक भेजा जाएगा और किसानों के हितों पर आंच नहीं आने दी जाएगी। किसानों की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि कुछ सरपंचों पर दबाव बनाकर ज्ञापन लेने का प्रयास किया गया।
2014 में रिलायंस के विरोध के बाद रुकी थी प्रक्रिया
किसानों ने प्रशासन के सामने वर्ष 2014 का उदाहरण भी रखा। उनका कहना है कि इसी तरह की प्रक्रिया उस समय रिलायंस के लिए भी अपनाई गई थी। ग्रामीणों के विरोध के बाद वह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी और निरस्त कर दी गई। अब एक बार फिर उसी क्षेत्र में औद्योगिक परियोजना के लिए जमीन से जुड़ी प्रक्रिया शुरू होने से किसानों में असंतोष है। किसानों का सवाल है कि जब पहले भी ग्रामीणों के विरोध के कारण ऐसी प्रक्रिया रोकनी पड़ी थी तो अब किसानों को विश्वास में लिए बिना दोबारा वही स्थिति क्यों पैदा की जा रही है?
एक ही नारा उपजाऊ जमीन नहीं देंगे
किसानों ने दो टूक कहा कि जिस जमीन पर पीढ़ियों से खेती कर परिवारों का जीवन चल रहा है, उसे खनन अथवा औद्योगिक उपयोग के लिए नहीं दिया जाएगा। किसानों का कहना था कि उन्हें उद्योग और विकास से आपत्ति नहीं है, लेकिन विकास की कीमत उनकी उपजाऊ जमीन क्यों हो? किसानों ने कहा कि डालमिया कंपनी को जमीन देने की प्रक्रिया किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जाएगी। जरूरत पड़ी तो गांव-गांव से फिर किसान जुटेंगे और आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा।
17 अक्टूबर की कोलाड में जनसुनवाई स्थगित
किसानों के विरोध का तत्काल असर आगामी प्रक्रिया पर भी पड़ा है। 17 अक्टूबर को कोलाड में प्रस्तावित जनसुनवाई फिलहाल स्थगित कर दी गई है। किसानों के अनुसार जनसुनवाई को लेकर क्षेत्र में पहले से ही विरोध की स्थिति थी। मंगलवार की बड़ी ट्रैक्टर रैली और कलेक्ट्रेट धरने के बाद प्रशासन ने इसे स्थगित करने का निर्णय लिया। अब किसानों की नजर आगे की प्रक्रिया पर है। उनका कहना है कि केवल जनसुनवाई स्थगित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीन से जुड़ी पूरी प्रक्रिया में किसानों को स्पष्ट जानकारी और उनकी सहमति सुनिश्चित की जानी चाहिए।
किसानों के प्रदर्शन को हर दल का समर्थन
मंगलवार के आंदोलन की एक खास बात यह रही कि इसे किसी एक राजनीतिक दल के बैनर तले संचालित नहीं किया गया। गांव-गांव से किसान स्वयं ट्रैक्टर लेकर पहुंचे। आन्दोलन को समर्थन देने किसान कांग्रेस के जिÞलाध्यक्ष संतोष पाण्डेय, पूर्व विधायक कल्पना बर्मा ,पुष्पराज बागरी ,प्रभाजित्तू बागरी ,शिवम सिंह हेलोधा, रूपेश बागरी, राम सिंह बागरी ,वीरेंद्र तिवारी ,शिवंम सिंह कचनार, सीमा बागरी, देवराज बागरी, आनंद उर्मलिया ,रामबाबू त्रिपाठी सहित रैगांव बिधान सभा की सभी पंचायतों से किसान आन्दोलन में शामिल रहे। रैगांव विधानसभा क्षेत्र में राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी की विधानसभा होने के कारण भी किसान आंदोलन चर्चा का विषय बना रहा। हालांकि किसानों ने इसे राजनीतिक आंदोलन के बजाय जमीन बचाने का संघर्ष बताया।
जमीन किसान की, फैसला कौन करेगा?
डालमिया की प्रस्तावित परियोजना को लेकर किसानों का विरोध अब केवल जमीन की लीज या औद्योगिक उपयोग का सवाल नहीं रह गया है। इसके केंद्र में बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि जिस जमीन पर किसान पीढ़ियों से खेती कर रहा है, उसके भविष्य का फैसला उसकी सहमति के बिना कैसे हो सकता है? पहले रिलायंस के लिए चली प्रक्रिया विरोध के बाद रुक चुकी है। अब डालमिया को लेकर वही क्षेत्र फिर आंदोलित है। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती केवल कानून और प्रक्रिया पूरी करने की नहीं, बल्कि किसानों का भरोसा कायम करने की भी है।मंगलवार को कलेक्ट्रेट पहुंचे किसानों ने साफ कर दिया कि वे अपनी जमीन को लेकर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। कलेक्टर की ओर से किसानों की मांग राज्य शासन तक भेजने और उनके हितों की रक्षा का आश्वासन जरूर मिला है, लेकिन जमीन का सवाल अभी खत्म नहीं हुआ है। किसानों का कहना है कि जनसुनवाई स्थगित हुई है, आंदोलन नहीं। जरूरत पड़ी तो फिर ं किसान ट्रैक्टर लेकर सड़क पर उतरेंगे औरसरकार का ध्यान अपनी पीड़ा की ओर आकृष्ट कराएंगे।
किसानों की आवाज सुने प्रशासन
रैगांव के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी एवं पूर्व जिला पंचायत सदस्य प्रागेन्द्र सिंह बागरी ने किसानों की ट्रैक्टर रैली का समर्थन करते हुए कहा कि प्रशासन को किसानों की बात सुननी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई गांवों के किसान अपनी जमीन और आजीविका बचाने के लिए लामबंद हैं। बागरी ने कलेक्टर से किसानों की आपत्तियों पर गंभीरता से विचार करने तथा उनकी सहमति के बिना प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण और संबंधित कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की। किसान कांग्रेस जिलाध्यक्ष संतोष पांडेय ने भी किसानों के आंदोलन को समर्थन देते हुए कहा कि खेती की जमीन केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि किसान परिवारों की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों का आधार है। पुष्पराज बागरी ने कहा कि क्षेत्र के किसान अपनी जमीन को लेकर गंभीर हैं और इसी का परिणाम ट्रैक्टर रैली के रूप में सामने आया है। उन्होंने कहा कि किसानों की मांग को नजरअंदाज करने के बजाय प्रशासन को संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। किसानों की जमीन, खेती और भविष्य से जुड़े इस मामले में पारदर्शिता के साथ निर्णय लिया जाना जरूरी है।

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