रतहरा-चोरहटा सड़क पर पहली बारिश के बाद कई हिस्सों में धंसाव और क्षति सामने आई। स्थानीय लोगों ने निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए जांच और जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

हाइलाइट्स:
रीवा, स्टार समाचार वेब
रतहरा से चोरहटा तक की यह सड़क सिर्फ डामर और गिट्टी का टुकड़ा नहीं थी, बल्कि इस इलाके के हजारों लोगों के लिए बेहतर भविष्य, रफ्तार और सुविधा का एक सपना थी। लेकिन पहली ही बारिश ने इस सपने की रीढ़ तोड़कर रख दी है।
कहते हैं बारिश मिट्टी की सोंधी खुशबू और राहत लेकर आती है, लेकिन रतहरा से चोरहटा के बीच रहने वाले लोगों के लिए इस बार की पहली बारिश एक कड़वा सच लेकर आई। वह सच जो पिछले कई महीनों से विकास के बड़े-बड़े विज्ञापनों और 5 सौ करोड़ के भारी-भरकम बजट के पीछे छुपाया जा रहा था। इस 19 किलोमीटर की सड़क पर सफर करने वाले राहगीरों को उम्मीद थी कि अब उनका सफर आसान होगा, लेकिन पहली ही बौछार ने इस विकास की बुनियाद को हिलाकर रख दिया। सड़क की चमचमाती ऊपरी परत के नीचे का खोखलापन अब साफ दिखने लगा है। कई जगहों पर आलम यह है कि सड़क के नीचे की मिट्टी पानी के साथ बह चुकी है और डामर की कंक्रीट हवा में लटकी हुई है। कलवर्टों के पास की जमीन धंस गई है। हर रोज इस मार्ग से गुजरने वाले लोगों का कहना है कि हम तो सोच रहे थे कि करोड़ों की लागत से हाईवे जैसी सड़क मिल रही है, लेकिन अब इस पर चलते हुए डर लगता है। पता नहीं कब पैर के नीचे की सड़क धंस जाए। यह सड़क नहीं, हादसों को न्योता है।
राखड़ के ढेर तले सच को दबाने की कोशिश
तकनीकी रूप से जो काम मजबूती से किया जाना चाहिए था, उसे अब लीपापोती के सहारे बचाने की कोशिश हो रही है। राहगीरों और ग्रामीणों ने देखा कि निर्माण एजेंसी केसीसी कंपनी के डंपर रात के अंधेरे में उन गड्ढों और धंसते किनारों पर राखड़ और ढीली मिट्टी डाल रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे किसी गहरे घाव पर बिना इलाज किए सिर्फ एक कमजोर पट्टी बांध दी जाए। सच को छिपाने की यह जल्दबाजी खुद बयां कर रही है कि पर्दे के पीछे सब कुछ ठीक नहीं था।
कागजी मॉनिटरिंग और टूटता भरोसा
इस पूरी तस्वीर का सबसे दुखद पहलू वह जुगलबंदी है, जो अमूमन ऐसी बड़ी परियोजनाओं में देखने को मिलती है। एक तरफ वो आलीशान दफ्तर हैं जहां बैठकर इंजीनियरों और जिम्मेदार अफसरों ने इन फाइलों पर आॅल ओके के दस्तखत किए होंगे, और दूसरी तरफ यह जमीनी हकीकत है जहां पहली ही बारिश में करोड़ों रुपये पानी में बह गए। बताया गया कि काम के दौरान कई बार गुणवत्ता को लेकर आवाज उठाई गई, लेकिन ठेकेदार के रसूख और अफसरों की अनदेखी के आगे उनकी आवाज दबा दी गई। यह कहानी सिर्फ एक सड़क के टूटने की नहीं है, यह कहानी है उस जनता के भरोसे के टूटने की जो हर सुबह टैक्स चुकाती है ताकि उसे एक सुरक्षित सफर मिल सके। क्षेत्र के लोग अब जांच और कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, लेकिन सवाल वही है क्या इस बार सच का सामना किया जाएगा, या फिर अगली बारिश आने तक इस भ्रष्टाचार को भी राखड़ के ढेर के नीचे हमेशा के लिए दबा दिया जाएगा। सड़क की गुणवत्ता जानने के लिए महाप्रबंधक एमपीआरडीसी को फोन लगाया गया पर उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।


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