सतना में सिविल लाइन से धवारी मोड़ तक 210 दुकानों और संरचनाओं को हटाने की कवायद फिर शुरू हुई। पट्टों की वैधता, विस्थापन, मुआवजा और पुनर्वास को लेकर संभागायुक्त के समक्ष सुनवाई जारी है।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
शहर में विकास और विस्थापन का सवाल एक बार फिर आमने-सामने है। सिविल लाइन से धवारी मोड़ तक नजूल भूमि पर दशकों से संचालित 200 से अधिक दुकानों और अन्य संरचनाओं को हटाने की प्रशासनिक कवायद फिर शुरू हो गई है। दुकानों को हटाने का प्रस्ताव पहले कलेक्टर स्तर पर रोक दिया गया था, लेकिन अब मामला संभागायुक्त के समक्ष पहुंच गया है, जहां दुकानदारों के धारणाधिकार संबंधी पट्टों की वैधता पर सुनवाई शुरू हो गई है।
जिला प्रशासन के प्रतिवेदन के आधार पर दुकानदारों से अपने पट्टों को विधि सम्मत साबित करने को कहा जा रहा है। लेकिन इसी के साथ सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है—यदि पट्टे नियमों के विपरीत जारी हुए थे तो उन्हें जारी करने वाले तत्कालीन अधिकारी-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया क्यों नहीं शुरू हुई? क्या दुकानदार स्वयं सरकारी जमीन पर कब्जा कर वहां बसे थे या प्रशासन ने ही उन्हें दुकानें उपलब्ध कराई थीं?
डीबी परियोजना से जोड़कर देखी जा रही कार्रवाई
राजेंद्र नगर से धवारी मोड़ तक की दुकानों को हटाने की कवायद को डीबी प्रोजेक्ट लिमिटेड की प्रस्तावित आवासीय-व्यावसायिक परियोजना से जोड़कर देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि परियोजना को मुख्य मार्ग से संपर्क उपलब्ध कराने के लिए संबंधित क्षेत्र को खाली कराने की आवश्यकता है। हालांकि प्रशासनिक दस्तावेजों में कार्रवाई का आधार भूमि की स्थिति और पट्टों की वैधता बताया गया है। खास बात यह है कि क्षेत्र की कई दुकानें ऐसे परिवारों को मिली थीं, जिन्हें शहर के दूसरे विकास कार्यों के दौरान विस्थापित किया गया था। अब वही परिवार दोबारा विस्थापन की आशंका में हैं।
210 दुकानों की सूची में केवल 13 बिना पट्टे
तहसीलदार की ओर से एसडीएम को भेजी गई 210 दुकानों की सूची मामले का महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखती है। सूची में केवल 13 लोगों के पास पट्टा नहीं होने का उल्लेख है। इनमें मो. नसीम कुरैशी पिता हमीद कुरैशी, संजय गुप्ता, अनिल रैकवार, सुदर्शन वर्मा पिता रज्जू वर्मा, कंधीलाल चौधरी पिता रामसिपाही, मनोज रैकवार पिता छोटेलाल रैकवार, आलोक पटेल पिता रमेश पटेल, रवि यादव, अमर कुरैशी पिता गुलाम मो. कुरैशी, गोलू उमर कुरैशी पिता गुलाम मो. कुरैशी, कल्लू कुरैशी पिता अल्ला बख्श, यूसुफ खान पिता इदरीश खान तथा इकबाल शामिल हैं। जब सूची में अधिकांश दुकानदार पट्टाधारी बताए गए हैं तो उनके अधिकारों की वैधानिक स्थिति और दस्तावेजों की जांच के साथ पट्टे जारी करने की प्रशासनिक प्रक्रिया की भी पड़ताल का सवाल उठना स्वाभाविक है।
पहले विकास के लिए हटे, फिर दुकानें मिलीं
प्रशासनिक विवरण के मुताबिक ओवरब्रिज से विस्थापित दुकानदारों को 18 दुकानें, जवाहर नगर स्टेडियम से हटाए गए परिवारों को तीन दुकानें तथा सिविल लाइन चौक से विस्थापित दुकानदारों को नौ दुकानें उपलब्ध कराई गई थीं। दुकानदारों का कहना है कि वे वर्षों से यहां कारोबार कर रहे हैं, बिजली बिल और अन्य देयकों का भुगतान करते हैं तथा कई के पास सरकारी पट्टे हैं।
रेलवे भूमि की लीज के बाद सामने आया नया विवाद
मामले में रेलवे की करीब 4.2 हेक्टेयर भूमि भी जुड़ी है। खसरा क्रमांक 361 की भूमि डीबी प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड को 99 वर्ष की लीज पर दिए जाने के बाद अब खसरा क्रमांक 262 में स्थित नजूल दुकानों को हटाने की प्रक्रिया सामने आई है। संभागायुक्त के समक्ष पहुंचे जिला प्रशासन के प्रतिवेदन में 64 दुकानें, नगर निगम का लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग का पंप हाउस, तीन मंदिर, एक इमामबाड़ा, 123 पट्टाधारी और 18 गैर-पट्टाधारी व्यक्तियों का उल्लेख है। वहीं अलग सूची में 210 दुकानों का विवरण सामने आया है।
आठ अप्रैल 2025 को दी गई थी हटाने की अनुशंसा
प्रकरण क्रमांक 5374/25-26 में आठ अप्रैल 2025 को कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत प्रतिवेदन में एसडीएम ने दुकानों को हटाने की अनुशंसा की थी। प्रतिवेदन में हल्का पटवारी और तहसीलदार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए राजस्व संहिता की कंडिका 3.4 (5) तथा 3.6 (3) (घ) का उल्लेख किया गया था। सार्वजनिक उपयोग की भूमि को धारणाधिकार के तहत दिए जाने पर सवाल उठाते हुए संबंधित पट्टों को निरस्त करने का अभिमत दिया गया था। कलेक्टर स्तर पर मुआवजे और पट्टा निरस्तीकरण के अधिकार की स्थिति स्पष्ट करने की टीप के साथ मामला रुका था। अब सुनवाई संभागायुक्त के समक्ष हो रही है।
विकास हो, लेकिन विस्थापन का समाधान भी हो
यदि दुकानों को हटाया जाता है तो पट्टाधारियों के अधिकार, मुआवजा, वैकल्पिक दुकान और पुनर्वास की व्यवस्था क्या होगी? वर्षों पहले विकास कार्यों से विस्थापित परिवारों को दुकानें देकर बसाने के बाद अब उन्हें दोबारा हटाया गया तो प्रशासन की जिम्मेदारी क्या होगी? फिलहाल यही सवाल दुकानदारों के साथ पूरे शहर के सामने खड़ा है।

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