बारिश थमने के बाद सतना में जलजनित और संक्रामक बीमारियां बढ़ीं तो जिला अस्पताल में 1610 मरीज पहुंचे और 174 गंभीर मरीज भर्ती हुए। वार्डों में बेड कम पड़े और आईसीयू का एसी बंद रहा।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
बारिश बंद होने के बाद जिले में जल जनित संक्रामक बीमारियों का भी ग्राफ बढ़ने लगा है। शहरी कालोनियों और ग्रामीण इलाकों में जगह-जगह खाली प्लाटों और गड्ढों में गन्दा पानी इकट्ठा हो गया है, जिसमे मलेरिया और डेंगू के लार्वा मिलने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं। मानसून के बदलते ही जिला अस्पताल में वायरल, मलेरिया, डेंगू, डायरिया, उलटी दस्त एवं श्वांस जैसे मरीजों की बाढ़ सी आ गई। तीन दिन के अवकाश के बाद सोमवार को जैसे अस्पताल खुला ओपीडी पंजीयन कक्ष मरीजों से पटा दिखा। सुबह से ही मरीजों की लम्बी कतार देखी गई, वहां खड़े होने तक को जगह नहीं थी। हर कोई जल्दबाजी में आपने नंबर का इंतजार करते नजर आया। ओपीडी पर्ची कटाने के बाद चिकित्सक से परामर्श लेने में भी मरीजों को जद्दोजहद करना पड़ा। अस्पताल प्रबंधन से मिले आंकड़ों के अनुसार सोमवार को 1610 मरीजों ने अपना पंजीयन कराकर चिकित्स्कीय परामर्श लिया जिसमे से 174 गंभीर मरीजों को भर्ती किया गया।
वार्डों में कम पड़ी जगह
भर्ती बढने की वजह से वार्डों में बेड और जगह कम पड़ रही है। हालात ये है कि मरीजों को गैलरी में स्ट्रेचर या फिर फर्श में गद्दे डालकर भर्ती किया जा रहा है। वार्डों में एक साथ 20 मरीज भर्ती करने की क्षमता है लेकिन 50 से ज्यादा मरीज भर्ती हैं। डॉक्टर बताते हैं कि भर्ती के एवज में डिस्चार्ज का प्रतिशत कम है, जिससे अधिक परेशानी हो रही है। चारसौ बिस्तरीय अस्पताल में रोजाना 16 सौ के पार मरीज पहुंच रहे हैं जिनमे से 160-170 मरीजों को भर्ती में किया भी जा रहा है।
आभा के लिए लगी लम्बी कतार
चिकित्सक को दिखाने के बाद मरीजों की कतार आभा आईडी बनाने में दिखी। अपना नंबर पहले आने की होड़ में यहां लोग एक दूसरे से लड़ते भी नजर आए। गौरतलब है कि खून जांच और सीटी स्कैन के लिए आभा आईडी अनिवार्य कर दी गई है।
आइसोलेशन वार्ड में क्षमता से ज्यादा मरीज
चिकित्सा विशेषज्ञों ने बताया कि बरसाती मौसम में नमी और उमस कि चलते खाना जल्दी खराब हो जाता है, जिसकी वजह से लोग बीमार हो रहे हैं। इंफेक्शन बढ़ने से मरीज को उलटी-दस्त जैसी समस्या शुरू हो जाती है। इन मरीजों को जिला अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती करना पड़ता है। वार्ड प्रभारियों की माने तो वर्तमान में अस्पताल का आइसोलेशन वार्ड में छमता से अधिक मरीज इलाज के लिए भर्ती किए गए हैं जिनमे टायफाइड और उलटी-दस्त जैसी समस्या से पीड़ित हैं।
जिला अस्पताल में इस समय ज्यादा केस वायरल और संक्रामक रोगों के आ रहे हैं, जिसमे सर्दी जुखाम , उलटी-दस्त, मलेरिया और स्क्रब टायफस जैसी बीमारियां शामिल हैं। मेडिसिन वार्डों के साथ आईसीयू भी फुल है। बारिश के मौसम में दूषित खाने से परहेज करें।
डॉ. बद्री विशाल सिंह एमडी मेडिसिन एवं आईसीयू प्रभारी, जिला अस्पताल सतना
बदलते मौसम के चलते बच्चों में बुखार और डायरिया जैसी बीमारियां देखने को मिल रही हैं। गंभीर बच्चों को भर्ती भी कराया जा रहा है।
डॉ. संजीव प्रजापति, शिशु रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल सतना
इस मौसम में सर्दी, खांसी, बुखार के साथ चेस्ट में तकलीफ के मरीज भी ओपीडी में पहुंच रहे हैं। मरीजों में सांस फूलने की समस्याएं भी बढ़ती हैं। ऐसे में जरूरी है कि इलाज में लापरवाही नहीं करें। समय से डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
डॉ. एमएस तोमर, चेस्ट स्पेशलिस्ट, जिला अस्पताल
एसी बंद, तड़पते रहे मरीज, हाथ पंखों का सहारा
जिला अस्पताल का आईसीयू सोमवार को इलाज का केंद्र कम और यातना गृह ज्यादा नजर आया। बरसात और बाढ़ के बाद मौसम में ज्यादा गर्मी और उमस नहीं है इसके बावजूद आईसीयू भभक रहा है। नैदानिक केन्द्र के प्रथम तल में स्थित आईसीसीयू फर्स्ट में लगे सभी सेंट्रल एसी सिस्टम कई दिनों से बंद पड़े हैं जिसके चलते मरीजों को उमस वाली गर्मी का सामना करना पड़ रहा है। घुटन के चलते मजबूरी में परिजन अपने मरीजों को हाथ के पंखों और टेबिल पंखों से हवा करते नजर आए।
बिजली की ट्रिपिंग ने बिगाड़ा खेल
जानकारी के मुताबिक वार्ड में ऐसी व्यवस्था है कि एक एसी बंद होने पर दूसरा स्वत: चालू हो जाए, लेकिन बिजली की आंख-मिचौली ने दोनों सिस्टम को ठप कर दिया। बिजली ट्रिपिंग और ओवरलोड के कारन कई सिस्टम थप हो गए। एसी शुरू करने पर कई मशीने एवं फंक्शनल यूनिट बंद होने लगी जिसके चलते एसी को बंद भी किया गया। मरीज के परिजनों एवं चिकित्सकीय स्टाफ द्वारा आईसीयू प्रबंधन से शिकायत भी की गई लेकिन कोई हल नहीं निकला। उमस के चलते आईसीयू के दरवाजे को खोला गया क्योंकि यहां हवा आने-जाने का कोई प्राकृतिक रास्ता नहीं है।
देशी इंतजामों से मरीजों को राहत
ऐसे में एसी बंद होते ही अंदर का तापमान भट्ठी जैसा हो गया। सांसों के सहारे जिंदगी से जूझ रहे मरीज गर्मी से तड़पते रहे और उनकी बेचैनी साफ नजर आई। मजबूरी में परिजन अपने मरीजों को हाथ के पंखों और बांस के पंखों से हवा करते दिखे। कई परिजन घर से टेबिल फैन भी लेकर पहुंचे। जिस जगह आधुनिक मशीनों और जीवनरक्षक सुविधाओं की जरूरत थी, वहां परिजन देशी इंतजामों से मरीजों को राहत देने की कोशिश करते रहे।
स्क्रब टायफस वाले मरीजों में वृद्धि
इस समय अस्पताल में सर्दी जुकाम और गले के इंफेक्शन के मरीजों में लगातार बृद्धि दर्ज की जा रही है। इसके अलावा वेक्टरजनित बीमारियों के मरीज जैसे मलेरिया, डेंगू और स्क्रब टायफस के मरीज मिल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक मेडिसिन ओपीडी में सोमवार को वायरल इंफेक्शन के 300 से अधिक मरीज अपना इलाज कराने पहुंचे। बताया जाता है कि इस समय मच्छर जनित बीमारियों के मरीजों में प्लेटलेट में गिरावट की समस्या देखने को मिल रही है।
पीकू और आईसीयू में भी ठौर नहीं
अस्पताल में सामान्य वाडों के साथ-साथ आईसीयू और बच्चों के लिए बनाए गए पीडियाट्रिक इन्टेंसिव केयर यूनिट में भी जगह कम पड़ रही है। यहां बेड के लिए मरीज सिफारिश भी लगवा रहे हैं। वाडों में इस कदर भीड़ है कि बॉटल स्टैंड तक रखने की जगह नहीं बची है।
बैकअप व्यवस्था भी फेल
अस्पताल प्रबंधन की संवेदनहीनता पर इस समय सवाल उठ रहे हैं, लेकिन राहत के नाम पर कोई त्वरित इंतजाम नजर नहीं आ रहा है। न बैकअप कूलिंग सिस्टम, न वैकल्पिक व्यवस्था और न ही जिम्मेदारों की मौजूदगी। इस मौसम में आईसीयू जैसी संवेदनशील इकाई की यह दुर्दशा स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारियों की पोल खोलती है। सवाल यह है कि अगर जिला अस्पताल का आईसीयू ही सुरक्षित नहीं, तो आम मरीज किस भरोसे इलाज कराने पहुंचे?
भाई को लेकर बीते दो दिन से आईसीयू में हूं, लेकिन यहां का एसी कार्य नहीं कर रहा है। शिकायत के बाद भी कुछ नहीं हुआ।
रंजना साकेत
पिताजी को हार्ट की बीमारी है, दो दिन से आईसीयू में भर्ती है। बिजली ट्रिपिंग और एसी की व्यवस्था धड़ाम है। यहां सुनने वाला कोई नहीं है। मरीज के लिए घर से पंखा मंगाया गया है।
शुभम गुप्ता

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