सतना जिला अस्पताल के पीएनसी वार्ड में पुरुषों की भीड़ से प्रसूताओं की निजता और सुरक्षा खतरे में है। अव्यवस्था, गेट पास बंद और अटेंडरों की अनियंत्रित संख्या से संक्रमण और विवाद की आशंका बढ़ी।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
जिला अस्पताल का पीएनसी (पोस्ट नेटल केयर) वार्ड, जहां प्रसव के बाद महिलाओं को आराम, उपचार और सुरक्षा मिलनी चाहिए, वहां सोमवार को अव्यवस्था और लापरवाही का चिंताजनक दृश्य सामने आया। वार्ड में महिलाओं से ज्यादा अटेंडरों की भीड़ नजर आई, जबकि कई पुरुष प्रसूता महिलाओं के लिए निर्धारित बिस्तरों पर आराम फरमाते दिखे। यह दृश्य सिर्फ अनुशासनहीनता का मामला नहीं, बल्कि महिलाओं की निजता, गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल है। जिस वार्ड में नई माताएं शारीरिक पीड़ा, कमजोरी और मानसिक संवेदनशीलता के दौर से गुजर रही हों, वहां अनियंत्रित पुरुषों की आवाजाही और भीड़ किसी भी सभ्य स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है। जानकारी के अनुसार प्रदेश स्तर पर महिलाओं की डिलीवरी करने में सतना जिला अस्पताल दूसरे नंबर पर आता है। इस समय भी रिकॉर्ड तोड़ डिलीवरी का आंकड़ा दर्ज किया जा रहा है। अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक प्रतिदिन 50 से अधिक महिलाएं प्रसव के लिए जिला अस्पताल में भर्ती हो रही हैं।
नवजात शिशु और प्रसूता के संक्रमण का खतरा
पीएनसी वार्ड वह स्थान है जहां नवजात शिशु और प्रसूता दोनों संक्रमण के सबसे अधिक खतरे में रहते हैं। भीड़भाड़, अनधिकृत प्रवेश और अस्वच्छ माहौल संक्रमण फैलने का कारण बन सकता है। इसके बावजूद जिम्मेदारों की चुप्पी हालात की गंभीरता को और बढ़ा रही है। जरूरत है कि अस्पताल प्रबंधन तुरंत सख्त कदम उठाए। वार्ड में पुरुषों के प्रवेश पर नियंत्रण, सीमित अटेंडर नीति, सुरक्षा गार्डों की तैनाती और नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए। क्योंकि अस्पताल अगर सुरक्षित नहीं रहेगा, तो मरीज भरोसा कहां करेगा?
गेट पास की सुविधा भी बंद
जिला अस्पताल में प्रतिदिन मरीजों से ज्यादा उनके साथ आये चार से पांच अटेंडरों की वजह से भीड़ नजर आती है, जबकि निजी अस्पतालों में यह नियम लागू नहीं होता है। नियमानुसार मरीज के साथ एक अटेंडर ही साथ रहने का नियम है जो कि जिला अस्पताल में लागू नहीं होता। कुछ वर्षों पूर्व मरीजों की सुरक्षा को देखते हुए अटेंडरों को गेट पास की सुविधा जारी की गई थी वो भी अब ठन्डे बस्ते में चली गई है। सुरक्षा की दृष्टि से अस्पताल प्रबंधन को अटेंडरों की भीड़ को कंट्रोल करना जरूरी है, ताकि अनाधिकृति लोगों को अस्पताल में प्रवेश न मिले और कोई बड़ी घटना घटित न हो।
निर्मित होती है विवाद की स्थिति
अस्पताल सूत्रों के मुताबिक यह कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि रोज का घटनाक्रम बन चुका है। वार्ड में निर्धारित नियमों के बावजूद अटेंडरों की संख्या पर नियंत्रण नहीं है। कई बार नर्सिंग स्टाफ बाहरी लोगों को बाहर निकालने की कोशिश करता है, लेकिन बात विवाद तक पहुंच जाती है। ऐसे में कर्मचारी भी असहाय नजर आते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान में सुरक्षा व्यवस्था आखिर किसके भरोसे चल रही है? क्या वार्डों में गार्ड तैनात नहीं हैं? क्या महिला मरीजों की निजता और सुरक्षा अब प्रशासन की प्राथमिकता नहीं रही?
भीड़ कंट्रोल करने के लिए दिन भर माइकिंग की जाती है। अटेंडरों को बाहर करने पर विवाद बढ़ता है, जिसे रोकने के लिए सिक्युरिटी गार्ड की संख्या बढाई जा रही है। गेट पास के लिए मैन पॉवर बढ़ाना पड़ेगा और मल्टीपल इंट्री को भी बंद करना होगा। नियमानुसार मरीज के साथ एक अटेंडर रुकने का नियम लागू है।
डॉ. शरद दुबे, आरएमओ, जिला अस्पताल
महिला वार्ड में महिला गार्ड की डियूटी लगाई गई है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर सिक्युरिटी गार्ड भी चक्कर लगते रहते हंै ताकि मरीजों के परिजन और पैरामेडिकल स्टाफ के बीच विवाद की स्थिति निर्मित न हो। गायनी और महिला वार्ड में तो गेट पास की सुविधा चालू करनी चाहिए।
डॉ. मंजू सिंह, एचओडी गायनिक, जिला अस्पताल


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