छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम के केस में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दुर्घटना दावों में मुआवजा तय करते समय केवल आधार कार्ड में दर्ज उम्र को ही आयु का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।

फैसले की महत्वपूर्ण बातें
उम्र निर्धारण: आधार कार्ड आयु का अंतिम प्रमाण नहीं, अन्य साक्ष्यों पर भी विचार करना जरूरी।
बीमा जिम्मेदारी: पॉलिसी में दर्ज तारीख से ही शुरू होता है इंश्योरेंस, केवल प्रीमियम जमा होने से नहीं।
मुआवजे का आकलन: ट्रिब्यूनल को सभी विरोधाभासी सबूतों की गहन जांच करनी चाहिए।
रायपुर।स्टार समाचार वेब
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम के केस में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दुर्घटना दावों में मुआवजा तय करते समय केवल आधार कार्ड में दर्ज उम्र को ही आयु का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल को दावेदार की उम्र तय करने के लिए रिकॉर्ड में मौजूद सभी साक्ष्यों और सबूतों का समग्र आकलन करना चाहिए। दरअसल, जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की पीठ ने तीन जुड़ी हुई अपीलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया। इसके जरिए हाई कोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के उस आकलन में सुधार किया, जिसमें केवल आधार कार्ड के आधार पर दावेदार की उम्र 60 साल मान ली गई थी।
केवल आधार कार्ड पर निर्भर रहना सही नहीं
हाई कोर्ट ने तथ्यों को देखते हुए नोट किया कि दावेदार ने हर स्तर पर लगातार अपनी उम्र 58 साल बताई थी, जबकि उसके आधिकारिक विकलांगता प्रमाण पत्र में उसकी उम्र 60 साल दर्ज थी। इस मामले को लेकर कोर्ट स्पष्ट तौर पर कहा कि ऐसी विरोधाभासी परिस्थितियों में, ट्रिब्यूनल द्वारा अन्य साक्ष्यों को नजरअंदाज कर विशेष रूप से केवल आधार कार्ड पर निर्भर रहना कानूनी रूप से सही नहीं था।
एक नजर में पूरा मामला
यह पूरा मामला एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें एक टाटा सूमो गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। इस हादसे में दो लोगों की मौत हो गई थी, जबकि एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया था और उसका पैर काटना पड़ा था। ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ टाटा सूमो के मालिक और ड्राइवर ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। वहीं, पीड़ित पक्ष ने भी मुआवजे की राशि बढ़ाने के लिए क्रॉस-आब्जेक्शन दाखिल किया था।
प्रीमियम जमा होने से तय नहीं होती कंपनी की जिम्मेदारी
इस मामले में गाड़ी मालिक की ओर से एक और बड़ा तर्क इंश्योरेंस को लेकर दिया गया था। मालिक का कहना था कि उसने 19 अप्रैल 2019 को शाम 4:35 बजे ही इंश्योरेंस कंपनी के एजेंट को प्रीमियम का भुगतान कर दिया था और पैसा कंपनी के खाते में जमा हो गया था। दुर्घटना उसी रात 10:00 बजे हुई, जबकि इंश्योरेंस पॉलिसी की अवधि अगले दिन (20 अप्रैल 2019) से शुरू हो रही थी। गाड़ी मालिक का तर्क था कि चूंकि पैसा पहले जमा हो गया था, इसलिए मुआवजे की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की होनी चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सिर्फ इंश्योरेंस प्रीमियम मिल जाने से ही इंश्योरेंस कंपनी की जिम्मेदारी तय नहीं हो जाती। इंश्योरेंस का कॉन्ट्रैक्ट उसी तारीख और समय से प्रभावी माना जाएगा, जो पॉलिसी में स्पष्ट रूप से दर्ज है, न कि प्रीमियम जमा होने के समय से।


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