मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव ने अब बेहद दिलचस्प राजनीतिक मोड़ ले लिया है। भाजपा ने इस बार बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाते हुए अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा पर दोबारा दांव लगाने के बजाय नए चेहरे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है। इस फैसले ने न केवल दतिया बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।


दतिया उपचुनाव में भाजपा ने बड़ा और चौंकाने वाला दांव खेला है। पार्टी ने पीढ़ी बदलाव का साफ संकेत दिया है। तीसरे नंबर की पीढ़ी को आगे बढ़ाने का सबसे सही समय यही था। जिस तरह के घटना क्रम दतिया में चल रहे हैं, उससे साफ है कि भाजपा में भी कांग्रेस जैसी स्थिति निर्मित हो गई है। इसी को दुरुस्त करने के लिए पार्टी आलाकमान ने चाबुक चलाया है। ताकि पुरानी भाजपा बनी रहे। यहां अब भाजपा की लड़ाई दूसरे दल से नहीं, बल्कि भाजपा से ही है। पार्टी का नया प्रत्याशी स्थानीय नहीं बाहरी है। वो भांडेर से तालुक रखते हैं। दतिया में अब कड़ा मुकाबला है।
देवश्री माली, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, चंबल
जीत की संभावनाएं उज्जवल

चुनावी राजनीति का एक सीधा नियम है-अगर पुराना सिपाही किला हार चुका हो, तो जंग जीतने के लिए सेनापति बदलना ही समझदारी है। आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारकर भाजपा ने दतिया में अपनी जीत की संभावनाओं को उज्जवल किया है। भाजपा ने उस जनतांत्रिक गुस्से को शांत कर दिया है जो नरोत्तम मिश्रा या उनके समर्थकों से नाराज था। हालांकि नरोत्तम की दावेदारी को नकारा नहीं जा सकता। इसलिए अब संगठन को चाहिए कि उन्हें बड़ा पद दे। अभी तक इस तरह के घटनाक्रम कांग्रेस में होते थे, लेकिन भाजपा का कांग्रेसीकरण होने के कारण यहां भी होने लगा है।
दिनेश गुप्ता, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, भोपाल
भाजपा अब वैज्ञानिक पार्टी

भाजपा अपने कड़े और चौंकाने वाले फैसलों के लिए जानी जाती है। दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से उपजा बवाल क्षणिक है। दतिया जैसा घटनाक्रम सीधी विधानसभा चुनाव में भी दिखा था। उपचुनाव सत्ता पक्ष ही जीतता है। भाजपा अब वैज्ञानिक पार्टी हो गई है। पहले ही सब भांप लेती है। पार्टी को बागी तेवर दिखाने वाले नेताओं के पास सीमित विकल्प बचते हैं। उपचुनाव सरकार बचाने का नहीं, बल्कि साख का खेल है। नरोत्तम का पेड न्यूज का भी मामला उछला था। फिर ये सुप्रीम कोर्ट चले गए थे। फिलहाल मामला अटका हुआ है।
जयराम शुक्ला, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, विंध्य
एक नजर में जातीय समीकरण
दतिया में किसी भी प्रत्याशी की जीत केवल एक जाति के भरोसे नहीं है। यहां ब्राह्मण लगभग 33,000 और जाटव-अहिरवार वर्ग के 33,000 मतदाताओं की संख्या बराबर है। कुशवाहा करीब 35,000, यादव 18,000, और ठाकुर, लोधी, मुस्लिम वर्ग से 8,000 से 10,000 वोटर हैं।

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हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से
जिस समाज में भगवान के घर में चोरी करने वाला हाथ नहीं कांपता, वहां चिंता चोरी की राशि से अधिक उस संस्कार की होनी चाहिए, जिसकी मृत्यु चुपचाप हमारे सामने हो रही है।
जी हाँ, मेरी प्राथमिकता है कि योग बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बने। मुझे खुशी है कि एनसीईआरटी ने इसे स्वीकार किया है।
हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से
सत्ता के शिखर पर दिखाई देने वाला चेहरा भले एक हो, पर उसकी सफलता के पीछे कई लोग होते हैं। किसी भी मुख्यमंत्री की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उनकी कोर टीम कितनी मजबूत है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को शुरुआती दौर में एक चौंकाने वाला चेहरा ‘सरप्राइज चॉइस’ के रूप में देखा गया, लेकिन बीते ढाई सालों में उन्होंने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत की है, बल्कि भाजपा संगठन के साथ भी बेहतरीन तालमेल बिठाया है।
जिस तरह से सीएम डॉ. मोहन यादव और प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में फैसले लिए जा रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि भाजपा पुराने स्थापित राजनीतिक घरानों से हटकर नए और युवा चेहरों को मौका दे रही है। स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट...।
भाजपा के राज्यसभा सांसद रजनीश अग्रवाल के साथ हमारी यह खास बातचीत।