जिस समाज में भगवान के घर में चोरी करने वाला हाथ नहीं कांपता, वहां चिंता चोरी की राशि से अधिक उस संस्कार की होनी चाहिए, जिसकी मृत्यु चुपचाप हमारे सामने हो रही है।

जब से अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन में कथित अनियमितता और चोरी के आरोपों से जुड़े वीडियो सार्वजनिक हुए हैं, तब से मन व्यथित है। यह पीड़ा केवल इसलिए नहीं कि कुछ नोट गायब हुए होंगे या किसी ने धन पर हाथ साफ किया होगा, बल्कि इसलिए कि यह धन किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार का नहीं था। यह करोड़ों रामभक्तों की आस्था, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक था।
जिस व्यक्ति ने एक रुपये का सिक्का चढ़ाया होगा, उसने भी उसी भावना से चढ़ाया होगा, जिस भावना से किसी ने लाखों का दान दिया होगा। मंदिर में चढ़ाया गया धन केवल मुद्रा नहीं होता, वह श्रद्धा का मूर्त रूप होता है। इसलिए यदि उस धन में सेंध लगती है, तो चोट तिजोरी पर नहीं, समाज की आत्मा पर लगती है। आज चर्चा इस बात की है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख चंपत राय, व्यवस्था संभालने वाले पदाधिकारी, निगरानी तंत्र, या वे लोग जो वीडियो में नोटों को इधर-उधर करते दिखाई दे रहे हैं। इन सबकी जवाबदेही जांच और कानून तय करेंगे। लेकिन एक प्रश्न ऐसा है जिसका उत्तर कोई जांच एजेंसी नहीं दे सकती, क्या हम इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि भगवान का धन भी अब सुरक्षित नहीं रहा? और आखिर वह कौन-सा सामाजिक और नैतिक पतन है, जिसने किसी व्यक्ति को रामलला के धन पर हाथ डालने का साहस दिया?
मंदिरों में चोरी की घटनाएं पहले भी होती रही हैं। गांव-कस्बों के छोटे मंदिरों से लेकर बड़े धार्मिक स्थलों तक ऐसी खबरें आती रही हैं। लेकिन उनमें भी अक्सर अपराधी के भीतर कहीं न कहीं भय दिखाई देता था। चोर अपराध करने के पहले या बाद भगवान के सामने हाथ जोड़कर क्षमा मांगता था। कहीं कोई चिट्ठी छोड़ जाता था कि मजबूरी में ऐसा किया। अपराध था, लेकिन अपराधबोध भी था। उसे भगवान के न्याय और दंड का भय था।
अयोध्या की घटना ने इसलिए अधिक विचलित किया है क्योंकि यहां यदि आरोप सही सिद्ध होते हैं तो चोरी किसी मजबूरी का परिणाम नहीं, बल्कि निर्लज्जता की पराकाष्ठा प्रतीत होती है। यहां न झिझक दिखाई देती है, न संकोच, न पश्चाताप। यहां अपराध से अधिक भयावह बात अपराधबोध का समाप्त हो जाना है। ऐसा लगता है मानो किसी को यह एहसास ही नहीं कि वह किसी व्यक्ति का धन नहीं, बल्कि करोड़ों रामभक्तों की आस्था को छू रहा है। मानो अपराधी को न समाज का भय रहा, न कानून का और न ही भगवान का।
सोचिए, जब इनमें से किसी ने जब पहली बार भगवान के चरणों में चढ़ाए गए नोटों की गड्डी को चोरी की नीयत से अलग कर उठाया होगा, तब क्या उसे यह एहसास नहीं हुआ होगा कि वह किसी व्यक्ति की जेब नहीं काट रहा, बल्कि करोड़ों लोगों की श्रद्धा में हाथ डाल रहा है? क्या उसका हाथ एक क्षण के लिए भी नहीं कांपा होगा? क्या उसे अपने माता-पिता द्वारा सिखाए गए संस्कार याद नहीं आए होंगे? क्या उसे भगवान के कोप का भय नहीं लगा होगा? क्या घर लौटकर उसने अपने परिवार से यह कहने का साहस किया होगा कि यह धन मैंने रामलला के चरणों से उठाया है? यदि नहीं, तो फिर यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि आत्मा के विरुद्ध अपराध है। और यह केवल उस व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की चिंता का विषय है। हो सकता है मेरी इस बात से कई लोग सहमत न हों, लेकिन मैं इसे केवल चोरी नहीं मानता। यह संस्कारों के पतन की पराकाष्ठा है। इसके पीछे केवल कुछ व्यक्तियों का चरित्र दोषी नहीं है। इसके पीछे वर्षों से बदलती सामाजिक मानसिकता भी जिम्मेदार है।
एक समय था जब व्यक्ति अपनी विषम परिस्थितियों में भी संतोष रखकर ईमानदारी से आगे बढ़ने का प्रयास करता था। संघर्ष था, अभाव थे, लेकिन नैतिकता से समझौता नहीं किया जाता था। सफलता का अर्थ केवल धन नहीं, बल्कि सम्मान, चरित्र और विश्वास भी होता था। व्यक्ति अपनी स्थिति सुधारने का प्रयास करता था, परंतु उसके लिए अपने चरित्र का सौदा नहीं करता था।
आज परिस्थितियां बदल गई हैं। इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। जीवन की हर सुविधा तुरंत चाहिए। हर व्यक्ति अपने परिवार को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा, सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य सेवा और सभी आधुनिक सुख-सुविधाएं देना चाहता है। यह आकांक्षा गलत नहीं है, लेकिन जब इन आकांक्षाओं की पूर्ति का एकमात्र पैमाना धन बन जाए, तब नैतिक सीमाएं टूटने लगती हैं। आज सफलता का अर्थ संतोष और सम्मान नहीं, बल्कि संपत्ति का आकार बन गया है। व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके आचरण से नहीं, उसके बैंक खाते और भौतिक उपलब्धियों से मापी जाने लगी है। परिणाम यह हुआ कि धन कमाना लक्ष्य रह गया और उसे कैसे कमाया गया, यह प्रश्न गौण हो गया।
दूसरा कारण है व्यवस्था पर भरोसे का कमजोर होना। एक समय था जब आम आदमी अपनी अधिकांश आवश्यकताओं के लिए सरकारी व्यवस्था पर भरोसा करता था। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती थी। सरकारी अस्पतालों में इलाज होता था। सार्वजनिक संस्थानों पर विश्वास था। नेता, अधिकारी और समाज के प्रभावशाली लोग भी उन्हीं संस्थानों पर भरोसा करते थे, जिन पर आम नागरिक करता था।
लेकिन धीरे-धीरे निजीकरण बढ़ा। इससे प्रतिस्पर्धा आई, सुविधाएं भी बढ़ीं, लेकिन साथ ही समाज के सामने एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी आया। समाज के नेतृत्वकर्ता, नेता, अधिकारी और प्रभावशाली वर्ग, स्वयं सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजना और सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना छोड़ने लगे। इससे आम नागरिक के मन में भी संदेश गया कि यदि बेहतर जीवन चाहिए तो अधिक से अधिक धन कमाना ही होगा। जब आवश्यकताएं बढ़ती हैं और नैतिक नियंत्रण कमजोर पड़ता है, तब अपराध के रास्ते छोटे लगने लगते हैं। तीसरा और सबसे गंभीर कारण है हमारे आदर्शों का बदल जाना।
हमारे बचपन में ईमानदार अधिकारियों, त्यागी संतों, समाजसेवियों, विद्वानों और राष्ट्रनिमार्ताओं की कहानियां सुनाई जाती थीं। वे ईमानदारी, त्याग, सेवा और नैतिकता के प्रतीक होते थे। उनके जीवन का मूल संदेश था, चरित्र सबसे बड़ी पूंजी है। समाज उन्हीं को सम्मान देता था। मीडिया भी ऐसे लोगों को स्थान देता था।
लेकिन उदारीकरण और पूंजीवाद के इस दौर में समाज का मनोविज्ञान धीरे-धीरे बदल गया। अब सफलता का सबसे बड़ा पैमाना संपत्ति बन गया। उद्योगपतियों, बड़े कारोबारियों और अरबपतियों की सफलता की कहानियां समाज के सामने आदर्श की तरह प्रस्तुत होने लगीं। इसमें किसी उद्योगपति की सफलता पर प्रश्न नहीं है, प्रश्न यह है कि क्या समाज ने चरित्र से अधिक संपत्ति को सम्मान देना शुरू कर दिया? कौन कितनी तेजी से अरबपति बना। ये विषय समाज की सामूहिक चेतना पर हावी होने लगे। आज शायद ही कोई मीडिया मंच हो जहां धन-संपत्ति को सफलता का पर्याय बनाकर प्रस्तुत न किया जाता हो। यह नहीं बताया जाता कि नैतिकता, सेवा और ईमानदारी भी सफलता की कसौटी हो सकती है। धीरे-धीरे समाज के मानस में यह बैठ गया कि सम्मान का सबसे बड़ा आधार धन है। जब धन सर्वोच्च आदर्श बन जाता है, तब साधनों की पवित्रता पीछे छूट जाती है।
यह लेख किसी एक व्यक्ति, किसी एक संस्था या किसी एक उद्योगपति के विरुद्ध नहीं है। यह उस बदलती मानसिकता पर कटाक्ष है जिसने चरित्र को पीछे और संपत्ति को आगे खड़ा कर दिया।
विडंबना देखिए, आज राम के नाम पर सबसे अधिक राजनीति होती है। राम के नाम पर सबसे अधिक नारे लगते हैं। राम के नाम पर सबसे अधिक यात्राएं निकलती हैं। राम के नाम पर सबसे अधिक भाषण दिए जाते हैं। लेकिन यदि रामलला के चरणों में चढ़ाया गया धन ही सुरक्षित नहीं है, तो हमें स्वयं से पूछना होगा कि- क्या राम केवल हमारे नारों में रह गए हैं, या अभी भी हमारे संस्कारों में जीवित हैं?
कानून अपना काम करेगा। दोषी पकड़े जाएंगे। सजा भी मिलेगी। लेकिन यदि इस घटना को हम केवल एक चोरी मानकर भूल गए, तो हम मूल समस्या को कभी नहीं समझ पाएंगे, क्योंकि राम के धन की चोरी कुछ लाख या करोड़ रुपये की चोरी नहीं है। यह उस विश्वास का विषय है जिसके बल पर करोड़ों लोगों ने अपने श्रम, अपनी कमाई और अपनी श्रद्धा का अंश रामलला के चरणों में अर्पित किया था, क्योंकि राम केवल मंदिर में स्थापित मूर्ति का नाम नहीं हैं। राम मर्यादा हैं, संयम हैं, सत्य हैं, कर्तव्य हैं और सबसे बढ़कर संस्कार हैं। यदि श्रद्धा का धन भी लालच के सामने हारने लगे, यदि भगवान के घर में भी बेईमानी प्रवेश कर जाए, यदि आस्था भी अवसर दिखाई देने लगे, तो यह केवल एक मंदिर की समस्या नहीं रह जाती। यह पूरे समाज के नैतिक स्वास्थ्य का प्रश्न बन जाता है।
और यदि हम इस घटना से भी नहीं चेते, तो संभव है कि भविष्य में ताले मंदिरों की तिजोरियों पर नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों, हमारी नैतिकता और हमारी सामूहिक चेतना पर लग जाएं। राम के धन की रक्षा केवल सीसीटीवी कैमरे नहीं कर सकते। उसकी रक्षा वही समाज कर सकता है जिसके भीतर अभी भी राम जीवित हों। और जिस समाज में भगवान के घर में चोरी करने वाला हाथ नहीं कांपता, वहां चिंता चोरी की राशि से अधिक उस संस्कार की होनी चाहिए, जिसकी मृत्यु चुपचाप हमारे सामने हो रही है।
हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से
जिस समाज में भगवान के घर में चोरी करने वाला हाथ नहीं कांपता, वहां चिंता चोरी की राशि से अधिक उस संस्कार की होनी चाहिए, जिसकी मृत्यु चुपचाप हमारे सामने हो रही है।
जी हाँ, मेरी प्राथमिकता है कि योग बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बने। मुझे खुशी है कि एनसीईआरटी ने इसे स्वीकार किया है।
हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से
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