भाजपा का उपचुनाव रिकॉर्ड फिलहाल तीन में दो जीत का है। अब दतिया चौथा उपचुनाव है, जिसके परिणाम पर पूरे प्रदेश की नजर रहेगी।
मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव ने अब बेहद दिलचस्प राजनीतिक मोड़ ले लिया है। भाजपा ने इस बार बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाते हुए अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा पर दोबारा दांव लगाने के बजाय नए चेहरे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है। इस फैसले ने न केवल दतिया बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। टिकट घोषित होने के बाद डॉ. मिश्रा के समर्थकों का विरोध भी खुलकर सामने आया, जिससे साफ है कि यह चुनाव केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि संगठन की एकजुटता की भी परीक्षा बनने जा रहा है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में अब तक तीन विधानसभा उपचुनाव हो चुके हैं। इनमें अमरवाड़ा और बुधनी में भाजपा ने जीत दर्ज की, जबकि विजयपुर सीट पर कांग्रेस को सफलता मिली। ऐसे में भाजपा का उपचुनाव रिकॉर्ड फिलहाल तीन में दो जीत का है। अब दतिया चौथा उपचुनाव है, जिसके परिणाम पर पूरे प्रदेश की नजर रहेगी।
दतिया का चुनाव कई मायनों में प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। एक ओर यह भाजपा नेतृत्व के प्रत्याशी चयन के फैसले की परीक्षा है, तो दूसरी ओर पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक प्रभाव और जनाधार का भी आकलन करेगा। इसके साथ ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश भाजपा संगठन और ग्वालियर-चंबल अंचल के प्रभावशाली नेताओं की राजनीतिक रणनीति भी इसी चुनाव की कसौटी पर होगी। यदि भाजपा यह सीट जीतती है तो नए नेतृत्व और नए चेहरे पर दांव सफल माना जाएगा, लेकिन यदि परिणाम विपरीत आते हैं तो टिकट चयन और संगठनात्मक रणनीति पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक होंगे। यानी दतिया का यह उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं, बल्कि भाजपा के राजनीतिक प्रबंधन, संगठनात्मक सामंजस्य और नेतृत्व क्षमता की बड़ी परीक्षा बन गया है।
उपचुनाव : भाजपा 2-1 से आगे
- मध्य प्रदेश में उपचुनाव में दो जीत और एक हार के साथ भाजपा का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा है अब दतिया की चुनौती सामने है..
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में वर्ष 2024 में मध्य प्रदेश में तीन विधानसभा उपचुनाव हुए। अमरवाड़ा, बुधनी और विजयपुर। इन तीनों चुनावों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन हर उपचुनाव भाजपा और मुख्यमंत्री के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया था।
अमरवाड़ा और विजयपुर में उपचुनाव कांग्रेस विधायकों के भाजपा में शामिल होने के कारण हुए। अमरवाड़ा से कांग्रेस विधायक कमलेश शाह और विजयपुर से कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत ने भाजपा का दामन थामा था। वहीं बुधनी में उपचुनाव इसलिए हुआ क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लोकसभा सदस्य चुने जाने के बाद विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे।
शिवराज की प्रतिष्ठा?
बुधनी का चुनाव भाजपा के लिए केवल एक सीट बचाने का नहीं, बल्कि शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा भी था। भाजपा ने उनके करीबी माने जाने वाले रमाकांत भार्गव को उम्मीदवार बनाया। हालांकि पार्टी सीट बचाने में सफल रही, लेकिन जीत का अंतर अपेक्षा से काफी कम रहा। जहां शिवराज सिंह चौहान लगातार बड़े अंतर से चुनाव जीतते रहे थे, वहीं रमाकांत भार्गव लगभग 13 हजार मतों के अंतर से ही विजय हासिल कर सके। इससे यह संदेश भी गया कि किसी जननेता का व्यक्तिगत जनाधार पूरी तरह हस्तांतरित नहीं होता।
कमलनाथ के गढ़ में मोहन यादव की सेंध?
अमरवाड़ा में मुकाबला और भी चुनौतीपूर्ण था। यह क्षेत्र लंबे समय तक पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है। भाजपा ने यहां दलबदल कर आए कमलेश शाह पर ही भरोसा जताया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्वयं चुनाव अभियान की कमान संभाली और आक्रामक प्रचार किया। अंततः भाजपा कमलेश शाह को दोबारा विधानसभा पहुंचाने में सफल रही और इसे सरकार की महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि माना गया।
विजयपुर नहीं बचा पाए ग्वालियर चंबल के दिग्गज नेता
सबसे बड़ा झटका विजयपुर में लगा। भाजपा ने कांग्रेस छोड़कर आए रामनिवास रावत को उम्मीदवार बनाया। रावत उस समय राज्य सरकार में मंत्री भी थे, लेकिन इसके बावजूद भाजपा यह सीट नहीं बचा सकी और कांग्रेस ने जीत दर्ज की। ग्वालियर-चंबल अंचल की इस महत्वपूर्ण सीट पर हार इसलिए भी चर्चा का विषय बनी क्योंकि यह क्षेत्र केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित भाजपा के कई प्रभावशाली नेताओं के राजनीतिक प्रभाव वाला माना जाता है।
चौथे चुनाव की कसौटी
डाॅ. मोहन यादव सरकार के अब तक के उपचुनावों का रिकॉर्ड तीन में दो जीत और एक हार का रहा है। अब दतिया उपचुनाव इस रिकॉर्ड की अगली परीक्षा है। यहां केवल भाजपा का चुनावी प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि प्रत्याशी चयन, संगठन की एकजुटता, ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के नेतृत्व की प्रभावशीलता और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की चुनावी रणनीति भी कसौटी पर होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
- भाजपा की लड़ाई भाजपा से
दतिया उपचुनाव में भाजपा ने बड़ा और चौंकाने वाला दांव खेला है। पार्टी ने पीढ़ी बदलाव का साफ संकेत दिया है। तीसरे नंबर की पीढ़ी को आगे बढ़ाने का सबसे सही समय यही था। जिस तरह के घटना क्रम दतिया में चल रहे हैं, उससे साफ है कि भाजपा में भी कांग्रेस जैसी स्थिति निर्मित हो गई है। इसी को दुरुस्त करने के लिए पार्टी आलाकमान ने चाबुक चलाया है। ताकि पुरानी भाजपा बनी रहे। यहां अब भाजपा की लड़ाई दूसरे दल से नहीं, बल्कि भाजपा से ही है। पार्टी का नया प्रत्याशी स्थानीय नहीं बाहरी है। वो भांडेर से तालुक रखते हैं। दतिया में अब कड़ा मुकाबला है।
देवश्री माली, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, चंबल
जीत की संभावनाएं उज्जवल
चुनावी राजनीति का एक सीधा नियम है-अगर पुराना सिपाही किला हार चुका हो, तो जंग जीतने के लिए सेनापति बदलना ही समझदारी है। आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारकर भाजपा ने दतिया में अपनी जीत की संभावनाओं को उज्जवल किया है। भाजपा ने उस जनतांत्रिक गुस्से को शांत कर दिया है जो नरोत्तम मिश्रा या उनके समर्थकों से नाराज था। हालांकि नरोत्तम की दावेदारी को नकारा नहीं जा सकता। इसलिए अब संगठन को चाहिए कि उन्हें बड़ा पद दे। अभी तक इस तरह के घटनाक्रम कांग्रेस में होते थे, लेकिन भाजपा का कांग्रेसीकरण होने के कारण यहां भी होने लगा है।
दिनेश गुप्ता, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, भोपाल
भाजपा अब वैज्ञानिक पार्टी
भाजपा अपने कड़े और चौंकाने वाले फैसलों के लिए जानी जाती है। दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से उपजा बवाल क्षणिक है। दतिया जैसा घटनाक्रम सीधी विधानसभा चुनाव में भी दिखा था। उपचुनाव सत्ता पक्ष ही जीतता है। भाजपा अब वैज्ञानिक पार्टी हो गई है। पहले ही सब भांप लेती है। पार्टी को बागी तेवर दिखाने वाले नेताओं के पास सीमित विकल्प बचते हैं। उपचुनाव सरकार बचाने का नहीं, बल्कि साख का खेल है। नरोत्तम का पेड न्यूज का भी मामला उछला था। फिर ये सुप्रीम कोर्ट चले गए थे। फिलहाल मामला अटका हुआ है।
जयराम शुक्ला, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, विंध्य
एक नजर में जातीय समीकरण
दतिया में किसी भी प्रत्याशी की जीत केवल एक जाति के भरोसे नहीं है। यहां ब्राह्मण लगभग 33,000 और जाटव-अहिरवार वर्ग के 33,000 मतदाताओं की संख्या बराबर है। कुशवाहा करीब 35,000, यादव 18,000, और ठाकुर, लोधी, मुस्लिम वर्ग से 8,000 से 10,000 वोटर हैं।
- सामान्य वर्ग 20 फीसदी: ब्राह्मण वोटर एक बड़ी ताकत हैं, जिन्हें भाजपा का मजबूत समर्थक माना जाता है। ठाकुर-वैश्य भी अहम भूमिका में हैं।
- दलित वर्ग 25 फीसदी: जाटव-अहिरवार समुदाय का कांग्रेस और अन्य दलों की ओर झुकाव रहता है, जो चुनाव के अंतर को पलट सकते हैं।
- ओबीसी 40 फीसदी : ओबीसी मतदाताओं की संख्या अधिक है। इसमें कुशवाहा, यादव समाज के लोग हैं, जो हार-जीत का रुख तय करते हैं।
- मतदाता 2.20 लाख: उपचुनाव में 2,20,344 मतदाता मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें 1,16,088 पुरुष, 1,04,246 महिला और 10 अन्य मतदाता शामिल हैं।
- एसआईआर: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मध्य प्रदेश में होने वाला यह पहला चुनाव है। 21 फरवरी को प्रकाशित नई मतदाता सूची के आधार पर उपचुनाव होगा।