जी हाँ, मेरी प्राथमिकता है कि योग बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बने। मुझे खुशी है कि एनसीईआरटी ने इसे स्वीकार किया है।

साक्षात्कार: मध्यप्रदेश योग आयोग के अध्यक्ष राघवेंद्र शर्मा से खास बातचीत
मध्य प्रदेश योग आयोग के अध्यक्ष राघवेंद्र शर्मा का जीवन सेवा और समर्पण का उदाहरण है। संघ के प्रचारक से लेकर बाल आयोग अध्यक्ष तक की जिम्मेदारी संभालने वाले राघवेंद्र जी अब योग के माध्यम से समाज को स्वस्थ बनाने के मिशन में जुटे हैं। स्टार समाचार से विशेष बातचीत में उन्होंने योग को स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाने, पतंजलि की जन्मभूमि के विकास और योग के जन-व्यापी प्रसार की अपनी दृढ़ संकल्पित कार्ययोजना साझा की।
सवाल: योग आयोग की जिम्मेदारी मिलने की जानकारी आपको कैसे मिली?
जवाब : यह मेरे लिए अत्यंत सुखद और आश्चर्यजनक था। संगठन में काम करते हुए मुझे दायित्वों का निर्वहन करने की आदत है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी का फोन आया कि आपको एक नया दायित्व दिया जा रहा है। मैंने बिना किसी प्रश्न के सहमति दी। अगले दिन समाचार पत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से मुझे स्पष्ट हुआ कि मुझे योग आयोग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मैं इसे ईश्वर का आदेश और संगठन का आशीर्वाद मानता हूँ।
सवाल: आपने अभी पदभार संभाला है, आगे की कार्ययोजना क्या है?
जवाब: मैं इसे एक 'विद्यार्थी' के रूप में देख रहा हूँ। मैंने गुजरात और हरियाणा योग आयोगों की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया है। वर्तमान में मेरा लक्ष्य योग को जन-जन तक पहुँचाना है। इसके लिए हम प्रत्येक जिले में 'मुख्यमंत्री योग प्रशिक्षण केंद्र' शुरू करने जा रहे हैं, जहाँ से मास्टर ट्रेनर्स तैयार किए जाएंगे।
सवाल: क्या बच्चों के लिए योग को लेकर कोई विशेष पहल है?
जवाब : जी हाँ, मेरी प्राथमिकता है कि योग बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बने। मुझे खुशी है कि एनसीईआरटी ने इसे स्वीकार किया है। मेरा मानना है कि योग को केवल को-करिकुलम न मानकर इसे मुख्य विषय बनाया जाना चाहिए, जिसके परीक्षा में अंक जुड़ें, ताकि इसे गंभीरता से लिया जाए।
सवाल: क्या 'योग के जनक' पतंजलि की जन्मभूमि को लेकर कोई विशेष योजना है?
जवाब: यह मध्य प्रदेश के लिए गौरव की बात है कि योग की धरा भोपाल है। मेरी योजना है कि उस स्थान पर एक विश्व स्तरीय योग केंद्र और साहित्य केंद्र विकसित किया जाए, जहाँ योग का दर्शन समझने के लिए न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे विश्व से लोग आएँ।
सवाल: योग के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है, लेकिन कई बार सोशल मीडिया के 'अशिक्षित इन्फ्लुएंसर' गलत तरीके से योग सिखा रहे हैं। इसे कैसे रोकेंगे?
जवाब: यह चिंता का विषय है। योग हमेशा गुरु के सानिध्य में ही सीखना चाहिए। हम हर महीने जिलों से शिक्षकों को भोपाल बुलाकर प्रशिक्षित कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य ऐसे बेल-ट्रेंड (सुशिक्षित) योग शिक्षकों की एक बड़ी फौज खड़ी करना है जो समाज में सही दिशा दे सकें।
सवाल: संघ के प्रचारक से लेकर आयोग के अध्यक्ष तक का सफर, क्या राजनीति में आने का कभी सोचा था?
जवाब: बचपन में शाखा जाते-जाते कब स्वयंसेवक और फिर प्रचारक बन गया, पता ही नहीं चला। संघ ने मुझे जो सिखाया वह 'व्यक्ति निर्माण' की प्रक्रिया है। अगर मैं राजनीति या संघ में नहीं होता, तो शायद आज मैं एक जज होता।
सवाल: आपका '100' का आंकड़ा काफी चर्चा में रहता है यानी "100 घंटे मन की बात, 100 घंटे दिव्यांग क्रिकेट' इसके पीछे क्या राज है?
जवाब : यह केवल समय नियोजन का खेल है। जो व्यक्ति कहता है वह 'व्यस्त' है, वह असल में 'अस्त-व्यस्त' है। मेरे पास एक बेहतरीन टीम है। 100 घंटे जैसे कार्यक्रम सामाजिक संदेश देने के लिए किए जाते हैं। भविष्य में मेरी इच्छा है कि दिव्यांगों के लिए एक ऐसा स्टेडियम बने जहाँ उन्हें एक छत के नीचे सभी सुविधाएं मिलें।
नजर में नेता
जी हाँ, मेरी प्राथमिकता है कि योग बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बने। मुझे खुशी है कि एनसीईआरटी ने इसे स्वीकार किया है।
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