न्याय जगत की प्रतिष्ठित शख्सियत सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय गोहिल भोपाल से हाई कोर्ट के न्यायाधीश बनने वाले दूसरे और अपने मूल क्षेत्र से इस शीर्ष पद पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति हैं। पढिए विशेष बातचीत..
न्याय जगत की प्रतिष्ठित शख्सियत सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय गोहिल भोपाल से हाई कोर्ट के न्यायाधीश बनने वाले दूसरे और अपने मूल क्षेत्र से इस शीर्ष पद पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति हैं। लगभग 25 वर्षों का सफल वकालत करियर और एक दशक तक हाई कोर्ट में ऐतिहासिक फैसले सुनाने का उनका अनुभव उनके कौशल का प्रमाण है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे मध्यस्थ (Arbitrator) के रूप में सक्रिय हैं। हाल ही में समाज के लिए विशाल भूमि दान कर भोपाल में एक भव्य मंदिर व शोध केंद्र का निर्माण करा रहे जस्टिस गोहिल से बातचीत के प्रमुख अंश:
- सवाल: न्याय के क्षेत्र में आपकी रुचि कैसे जागी? क्या पारिवारिक पृष्ठभूमि न्यायिक थी?
जवाब: कानून में मेरा आना कोई इत्तेफाक नहीं, पारिवारिक संघर्षों का नतीजा था। सिरोंज में जन्मे मेरे पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और आजादी के बाद समाजवादी राजनीति में सक्रिय रहे। राजनीतिक प्रताड़ना के कारण हमारे परिवार पर लगातार मुकदमे लादे जाते थे। पिता के इस संघर्ष और आर्थिक संकट को देखकर मैंने ठाना कि परिवार की मदद के लिए घर में एक वकील का होना जरूरी है। साल 1962 में भोपाल आकर मैंने हमीदिया कॉलेज से बीए और फिर एलएलबी की। इस दौरान बैंक में नौकरी भी की। शुरुआती 8-10 साल बेहद कड़े संघर्ष के थे।
- सवाल: वकालत के शुरुआती दौर की पहली आमदनी कितनी थी?
जवाब: स्वतंत्र वकालत के पहले दिन की कमाई मात्र ₹10 थी। शुरुआत में काम कम था, तो मैंने लाइब्रेरी में बैठकर लिखना शुरू किया। इसी बीच मुझे गुलाबगंज के एक किसान का केस मिला, जिसका ट्रैक्टर कोऑपरेटिव बैंक ने नीलाम कर दिया था। मैंने पूरी ताकत लगाकर उसका ट्रैक्टर छुड़ा लिया। चूंकि मैं बैंक में काम कर चुका था, इसलिए मैंने सहकारिता पर एक किताब लिख दी। इस किताब को भारत सरकार ने राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा, जिसने मुझे एक नई पहचान दी।
- सवाल: क्या आपने क्रिमिनल केसेस भी लड़े?
जवाब: शुरुआत में सरकारी वकील के साथ सेशन ट्रायल सीखने का मौका मिला। जूनियर वकीलों को सिर्फ छोटे-मोटे क्रिमिनल केस ही मिलते थे। ऐसा ही सट्टे का एक केस लेकर जब मैं कोर्ट पहुंचा, तो जज साहब ने मजाकिया लहजे में कहा—"पहले सट्टा खेलना सीख कर आओ, तभी अपने मुवक्किल का बचाव कर पाओगे!" चूंकि मुझे यह सब नहीं आता था, इसलिए मैंने सट्टे के केस ही छोड़ दिए। बाद में सिविल और भूमि सीलिंग मामलों के चलते पूरे मध्य प्रदेश के सहकारी नेता मेरे मुवक्किल बन गए।
- सवाल: भोपाल छोड़कर आपका जबलपुर (हाई कोर्ट) जाना कैसे हुआ?
जवाब: तत्कालीन केंद्रीय विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज जी भोपाल आए थे। उन्होंने मुझसे मतदाता सूची से जुड़ा एक पेचीदा कानूनी सवाल पूछा। मैंने पलक झपकते ही हाई कोर्ट के एक 'फुल बेंच' फैसले का हवाला देकर सटीक जवाब दे दिया। वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे जबलपुर में भारत सरकार का सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल नियुक्त कर दिया। इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने भी मुझे डिप्टी एडवोकेट जनरल बना दिया, और 1993 में मेरा जबलपुर का सफर शुरू हुआ। वहां मेरी दलीलों की धाक जमी और भरपूर सम्मान मिला।
- सवाल: वकील और जज—इन दोनों में से कौन सी भूमिका ज्यादा चुनौतीपूर्ण लगी?
जवाब: दोनों भूमिकाएं बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। वकील के पास शाम को क्लाइंट अपनी परेशानी छोड़ जाता है और उसे अगली सुबह नया चैलेंज फेस करना होता है। वहीं जज के सामने रोज 100 फाइलें होती हैं। अगर आप रात को 15-18 घंटे जागकर फाइलें नहीं पढ़ेंगे, तो कोर्ट में तुरंत सही निर्णय नहीं दे पाएंगे।
- सवाल: जज के रूप में क्या कोई ऐसा दिलचस्प या चौंकाने वाला केस याद आता है?
जवाब: इंदौर बेंच का एक मर्डर केस था, जो परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। जिला अदालत ने आरोपी को मृत्युदंड दिया था। हमारे पास जब अपील आई, तो हमने उसे आजीवन कारावास में बदला। लेकिन हमें तब बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने पहली ही सुनवाई में उसे बरी कर दिया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उसके 'घटनास्थल पर न होने' (Alibi) के तर्क को मान लिया था। यह दिखाता है कि न्याय की कसौटियां कितनी बारीक होती हैं।
- सवाल: जब किसी को जज की निष्पक्षता पर जरा सा भी संदेह हो, तो न्यायाधीश को क्या करना चाहिए?
जवाब: न्याय का सिद्धांत है कि न केवल न्याय होना चाहिए, बल्कि वह होते हुए दिखना भी चाहिए। इंदौर बेंच में सुनवाई के दौरान एक वकील ने मुझसे कहा कि बाहर आपके नाम की कुछ चर्चा हो रही है। मैंने उन्हें तुरंत रोकते हुए केस को दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया। यदि किसी भी पक्षकार को यह अंदेशा हो कि उसे न्याय नहीं मिलेगा, तो ईमानदार जज को खुद ही उस केस से तुरंत हट जाना चाहिए (Recusal)।
- सवाल: क्या जुडिशरी पर राजनीतिक दबाव भी होता है?
जवाब: सीधे तौर पर कोई राजनेता सिफारिश लेकर नहीं आता, लेकिन दबाव के तरीके अलग होते हैं। जैसे किसी खास मामले को लेकर मीडिया में खबरें छपवा दी जाती हैं। हां, जजों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप और आईबी (IB) की रिपोर्ट बड़ी भूमिका निभाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त जैसी स्वतंत्र संस्थाओं के चयन पैनल में भी पारदर्शिता के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) का होना बहुत जरूरी है।
- सवाल: कॉलेजियम सिस्टम को लेकर सरकार और न्यायपालिका में हमेशा तकरार क्यों रहती है?
जवाब: कॉलेजियम व्यवस्था में कुछ कमियां जरूर आई हैं, लेकिन सरकार भी चाहती है कि नियुक्तियों पर पूरा नियंत्रण उसका हो। वर्तमान व्यवस्था में हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और दो वरिष्ठतम जज मिलकर नाम तय करते हैं। बीच का रास्ता यह हो सकता है कि कॉलेजियम प्रक्रिया को और अधिक व्यापक बनाया जाए और संबंधित राज्य से आने वाले अन्य जजों से भी राय ली जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
- सवाल: समान नागरिक संहिता (UCC) का अदालत और समाज पर क्या असर देखते हैं?
जवाब: संविधान के अनुच्छेद 44 (UCC) को लंबे समय तक राजनीतिक एजेंडों के चलते ठंडे बस्ते में डाला गया। इसके लागू होने से जजों के काम पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, बल्कि फैसलों में एकरूपता आएगी और समाज में धर्म के नाम पर विशेषाधिकार लेकर बैठीं कुरीतियां दूर होंगी। तीन तलाक का खत्म होना और धारा 125 (भरण-पोषण) इसके उदाहरण हैं।
- सवाल: क्या आर्टिकल 38 (लोक कल्याण) की आड़ में 'रेवड़ी कल्चर' को कानूनी जामा पहनाया जा रहा है?
जवाब: बच्चों को साइकिल या लैपटॉप देना एक बात है, लेकिन सत्ता के लिए अंधाधुंध रेवड़ियां बांटना अलग बात है। जैसे मद्रास में शादी में 8 ग्राम सोना देने की योजना लाई गई; एक तरफ आप दहेज प्रथा के खिलाफ कानून बनाते हैं, दूसरी तरफ खजाने से सोना बांटते हैं, यह विरोधाभास है। हालांकि, 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देना आर्थिक सुरक्षा का हिस्सा है और वह सही है। अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट को आगे आकर मुफ्त योजनाओं की सीमा तय करने के लिए एक गाइडलाइन बनानी चाहिए।
- सवाल: सबरीमाला जैसे पारंपरिक मामलों में अदालती हस्तक्षेप और पीआईएल (PIL) के वर्तमान स्वरूप पर आपकी क्या राय है?
जवाब: मैं सीजेआई की इस टिप्पणी से सहमत हूं कि अदालतों को धार्मिक मान्यताओं के आंतरिक मामलों में दखल देने से बचना चाहिए। वहीं, जनहित याचिका (PIL) का आज के दौर में भारी दुरुपयोग हो रहा है। मिसाल के तौर पर, बारिश से पहले गड्ढे भरवाने या आवारा पशुओं को हटाने के लिए पीआईएल आ जाती है। क्या प्रशासन का यह बुनियादी काम भी कोर्ट तय करेगा? इस पर कड़े प्रतिबंध जरूरी हैं।
- सवाल: देश में शुरू हुई जातिगत जनगणना को आप कैसा मानते हैं?
जवाब: पिछले 50 वर्षों से हम समाज से जातिवाद को खत्म करने की लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन अब राजनीतिक लाभ और वोट बैंक के लिए जातिगत जनगणना करवाकर भेदभाव को दोबारा बढ़ाया जा रहा है। समृद्ध राष्ट्र बनाने की राह में यह कदम कतई सही नहीं है।
- सवाल: भोपाल में आपके द्वारा बनवाए जा रहे विशाल मंदिर और रिसर्च सेंटर की प्रेरणा कहां से मिली?
जवाब: साल 2013 में राष्ट्रसंत आचार्य विद्यासागर जी महाराज की प्रेरणा से हमने कर्नाटक की खदान से बेदाग ग्रेनाइट पत्थर लाकर, लंदन म्यूजियम में रखी जैन तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमा की भव्य रेप्लिका तैयार करवाई। मैं वहां विश्वस्तरीय रिसर्च लाइब्रेरी भी बना रहा हूं, क्योंकि हमारे प्राचीन प्राकृत और अपभ्रंश शास्त्रों में ज्योतिष, वायुयान और विज्ञान का अनमोल खजाना है। इसे दुनिया की 62 कंट्रीज में चल रही जैनोलॉजी चेयर्स से जोड़ा जाएगा। यह भोपाल की जनता को मेरा रिटर्न गिफ्ट है। जब मैंने आचार्य श्री से पूछा था कि इतने लक्ष्मीपुत्रों के बीच आपने मुझ 'सरस्वती पुत्र' को क्यों चुना, तो वे बस मुस्कुरा दिए थे।
- सवाल: भोपाल के एनएलआईयू (NLIU) में फर्जी डिग्री घोटाले की जांच में क्या सच सामने आया था?
जवाब: तत्कालीन चीफ जस्टिस के निर्देश पर मैंने वह जांच की थी। परीक्षा विभाग के लोग फेल छात्रों को टैबुलेशन चार्ट में काट-छांट कर पास कर रहे थे। जिन बच्चों के कॉपियों में 8 नंबर थे, उन्हें 80 नंबर देकर एलएलबी की डिग्रियां बांट दी गई थीं। ऐसे 260 से ज्यादा बच्चे मिले, जिनमें से 35 बच्चे विभिन्न राज्यों में जज बन चुके थे! कई बड़े आईजी और आईएएस के बच्चों के नाम इसमें थे, जिन्होंने दबाव बनाने की कोशिश की, पर मैं पीछे नहीं हटा। बाद में हाई कोर्ट ने उन जजों की दोबारा परीक्षा ली। इसी तरह, बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी की जांच के बाद गवर्नर हाउस ने मेरी 8 महीने की कड़ी मेहनत के बदले मात्र 25 हजार रुपये का चेक भेजा क्योंकि मैं उनके मुताबिक किसी को क्लीन चिट देने के पक्ष में नहीं था। मैंने वह चेक यह कहकर लौटा दिया कि—"आप इसे स्वयं ही रख लीजिए।" जजों के साथ भी ऐसी चीजें हो जाती हैं।
- सवाल: आज भी आप 12 घंटे व्यस्त हैं। खुद को रिलैक्स कैसे करते हैं?
जवाब: एक सिंसियर जज या वकील के पास फिल्में देखने या गाने सुनने का फालतू समय नहीं होता। मेरा रिलैक्स होने का तरीका अलग है; मैं काम करके ही एन्जॉय करता हूं। जब मैं दिन में 10-12 घंटे पूरी ईमानदारी से काम कर लेता हूं, तो मुझे जो दिमागी संतोष मिलता है, वही मुझे रिलैक्स करता है। जैन धर्म के दिगंबर गुरु ही मेरे आदर्श हैं और वर्तमान में 'लंदन कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन' के मेंबर के रूप में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा हूं।