राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात भले ही मानकों के अनुरूप दिखाई दे रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। मध्य प्रदेश समेत देशभर में शिक्षकों की भारी कमी और उनके असमान वितरण के कारण स्कूली शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर आंधा शीर्ष पर, मप्र भी चिंताजनक स्थिति
यूडीआईएसई की रिपोर्ट से समाने आई शिक्षकों की तैनाती

भोपाल/नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात भले ही मानकों के अनुरूप दिखाई दे रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। मध्य प्रदेश समेत देशभर में शिक्षकों की भारी कमी और उनके असमान वितरण के कारण स्कूली शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है। केंद्र सरकार की नवीनतम यूडीआईएसई+2025-26 रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में लगभग 7,200 से अधिक स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। देशभर में ऐसे सिंगल-टीचर स्कूलों की कुल संख्या 1 लाख (1,00,843) को पार कर गई है, जिनमें मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी भी चिंताजनक स्तर पर है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में सबसे अधिक सिंगल-टीचर स्कूल आंध्र प्रदेश में हैं, जहां इनकी संख्या 16,357 है। यह आंकड़ा देश के कुल एकल-शिक्षक स्कूलों का 16 फीसदी से अधिक है। इसके बाद झारखंड (9,827), महाराष्ट्र (9,269), कर्नाटक (8,042), उत्तर प्रदेश (7,874) और राजस्थान (7,200) का स्थान है। मध्य प्रदेश में भी 7,200 से अधिक स्कूल इस श्रेणी में शामिल हैं। देश के केवल इन प्रमुख राज्यों को मिला दिया जाए, तो भारत के कुल सिंगल-टीचर स्कूलों का लगभग 65 फीसदी हिस्सा यहीं केंद्रित है।
देश के सभी राज्यों में टीचरों की कमी
यह समस्या सिर्फ गरीब या भौगोलिक रूप से मुश्किल इलाकों वाले राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में फैली हुई है। तेलंगाना में ऐसे 4,793 स्कूल हैं, तमिलनाडु में 3,957 और असम में 3,159। हिमाचल प्रदेश में 3,128, उत्तराखंड में 2,655 और छत्तीसगढ़ में 2,461 स्कूल हैं। दूसरी तरफ, केरल में 67, नागालैंड में 35, सिक्किम में 31, लद्दाख में 28, दिल्ली में सात और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में एक सिंगल-टीचर स्कूल की जानकारी मिली है।
संसद में गूंजा मुद्दा: भर्ती प्रक्रिया से पद भरने की सलाह

केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में ये आंकड़े प्रस्तुत किए। हालांकि, मंत्रालय ने राज्यवार स्वीकृत और रिक्त पदों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत नहीं की। मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि शिक्षकों की भर्ती, सेवा शर्तें और उनकी सही तैनाती का दायित्व संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों का है। पदों के खाली होने के मुख्य कारणों में सेवानिवृत्ति, इस्तीफे, नए पदों का सृजन और नामांकन में बदलाव शामिल हैं।
प्राइमरी लेवल पर स्थिति खराब
तय छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने के लिए समग्र शिक्षा के तहत आर्थिक मदद भी दी गई। मंत्रालय ने राष्ट्रीय छात्र-शिक्षक अनुपात का जिक्र किया। प्राइमरी लेवल पर 19, अपर प्राइमरी पर 17, सेकेंडरी पर 15 और हायर सेकेंडरी पर 23। ये सभी नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के तहत तय सीमाओं के भीतर हैं। हालांकि, सिंगल-टीचर-स्कूल का डेटा बताता है कि अच्छे राष्ट्रीय औसत के पीछे शिक्षकों की उपलब्धता में स्थानीय स्तर पर भारी असंतुलन छिपा हुआ है।
राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) की स्थिति
| शिक्षा का स्तर | राष्ट्रीय छात्र-शिक्षक अनुपात |
| प्राइमरी (Primary) | 19:1 |
| अपर प्राइमरी (Upper Primary) | 17:1 |
| सेकेंडरी (Secondary) | 15:1 |
| हायर सेकेंडरी (Higher Secondary) | 23:1 |


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