रीवा के उपरहटी मोहल्ले में प्राचीन शिवलिंग ‘पड़ोसी बाबा’ के नाम से पूजित है। मान्यता है कि यह हजार वर्ष पुराना है। टेढ़ी जलहरी, भस्म आरती और रंगपंचमी का आयोजन इसकी विशेष पहचान है।

हाइलाइट्स:
रीवा, स्टार समाचार वेब
भगवान महामृत्युंजय की नगरी में कई स्थान आज भी ऐसे हैं जो अपने अतीत में वैभव का ऐसा खजाना संजो रखे हैं जो आज की चकाचौंध व आधुनिकता से कोसों दूर है। हम बात कर रहे हैं शहर के उपरहटी मोहल्ला में मौजूद एक ऐसे शिवलिंग की, जिसे उज्जैन के राजाधिराज महाकाल से इसकी तुलना की जाती है।
एक अत्यंत संकरी गली और अंदर प्रवेश करते ही मन को भा लेने वाला भूतभावन भगवान भोलेनाथ का वैभव जिसे देखकर मन श्रद्धा से भर जाता है। हालांकि यह स्थान वर्तमान समय पर अतिक्रमण के आवरण से ढंका हुआ है लिहाजा सामान्य आंखें इन्हें चाहकर भी नहीं तलाश पाती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि रीवा राजगद्दी के सम्राट रहे महाराजा रघुराज सिंह ने अपनी पुस्तक में इस मंदिर के वैभव का जिक्र किया है। ऐसे में इस स्थान का महत्व 365 दिन है। जबकि श्रावण में यहां उपासना कुछ और ही बढ़ जाती है। मंदिर की देखरेख करने वाले कोई अधिकृत पंडा पुजारी नहीं थे। उस दौर में आसपास रहने वाले लोगों ने भोग प्रसाद व मंदिर की सुरक्षा की और पड़ोसी बाबा का नाम रख दिया। कहा जाता है कि यह मंदिर आदि शंकराचार्य के पंचमठ से भी पुराना है। उस दौर में यहां वर्तमान का किला भी मौजूद नहीं था।
भोलेनाथ की जलहरी टेढ़ी व पश्चिम की ओर मुड़ी
मंदिर के वर्तमान पुजारी पं. चंद्रशेखर द्विवेदी ने स्टार समाचार को जानकारी देते हुए बताया कि इस मंदिर में विराजमान भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा कम से कम हजार साल पुरानी है। जो उज्जैन के महाकाल के समकक्ष है। भगवान की जलहरी टेढ़ी व पश्चिम दिशा की ओर मुड़ी हुई है। यही कारण है कि इस शिवलिंग को महाकाल की प्रतिमूर्ति से तुलना की जाती है।
यहां होते हैं दो बड़े आयोजन
मंदिर की सेवा में जुटे शिवभक्त व स्थानीय निवासी आशीष गुप्ता ने बताया कि यहां वर्ष में दो बड़े आयोजन होते हैं। जिसमें भारी संख्या में शिवभक्त जुटते हैं। उनके मुताबिक प्रत्येक माह के पहले दिन यहां भस्म आरती की जाती है। जो अपने आप में इसलिए विशेष है क्योंकि उसमें कंडे की राख का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा होली के पांचवें दिन अर्थात रंगपंचमी को भगवान भोलेनाथ का विशेष श्रृंगार एवं अभिषेक, पूजा की जाती है जो अपने आप में अद्वितीय है। जिसका साक्षी बनने के लिए स्थानीय लोगों के अलावा आसपास से भी काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
रिपोर्ट: संजय मिश्रा

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