रीवा में मात्र 1.35 किलोग्राम वजन वाले प्रीमैच्योर नवजात को 36 दिनों के गहन उपचार के बाद नई जिंदगी मिली। डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और कंगारू मदर केयर की मदद से शिशु स्वस्थ हुआ।

हाइलाइट्स
रीवा, स्टार समाचार वेब
जब हौसला बुलंद और चिकित्सा टीम में सेवा का समर्पण हो तो मौत के मुंह से भी जिंदगी को वापस लाया जा सकता है। ऐसा ही एक प्रेरक उदाहरण रीवा जिले में देखने को मिला है, जहाँ स्वास्थ्य विभाग की तत्परता और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों की बदौलत एक अत्यंत कमजोर प्रीमैच्योर नवजात शिशु को नई जिंदगी मिली है।
जिले के ग्राम बरा पैपाखर पोस्ट ममकारी निवासी संजना कोल उम्र 28 वर्ष ने बीते 17 मार्च को घर पर पारंपरिक तरीके से एक प्रीमैच्योर (35 सप्ताह के) शिशु को जन्म दिया। जन्म के समय शिशु का वजन मात्र 1.350 किलोग्राम था। जन्म के तुरंत बाद ही मासूम को सांस लेने में गंभीर तकलीफ होने लगी। स्थिति बिगड़ती देख परिजनों ने तत्परता दिखाई और नवजात को तुरंत शासकीय स्वास्थ्य संस्थान के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट में भर्ती कराया। डॉक्टरों के परीक्षण में सामने आया कि शिशु 'रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस' (सांस की गंभीर बीमारी), 'हाइपोथर्मिया' (शरीर का तापमान कम होना) और 'अत्यंत कम वजन' जैसी जानलेवा समस्याओं से जूझ रहा था।
जीवन रक्षक सेवाओं का सहारा
शिशु की नाजुक हालत को देखते हुए सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक डॉ. प्रतिभा मिश्रा के मार्गदर्शन में एसएनसीयू टीम के नोडल अधिकारी डॉ. जेके तिवारी और उनकी विशेषज्ञ मेडिकल टीम ने तत्काल मोर्चा संभाला। मासूम को बचाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों और जीवनरक्षक सेवाओं का सहारा लिया गया। सीपीएपी मशीन के माध्यम से तुरंत आॅक्सीजन सपोर्ट दिया गया। संक्रमण से सुरक्षा, तापमान नियंत्रण, आईव्ही फ्लूड, कैल्शियम, कैफीन और विटामिन के जैसी जरूरी दवाएं विशेषज्ञों की चौबीसों घंटे निगरानी में शुरू की गईं।
कड़ी मेहनत से सेहत में सुधार
मेडिकल टीम की कड़ी मेहनत और आधुनिक उपचार से शिशु की सेहत में धीरे-धीरे जादुई सुधार देखने को मिला। चार दिन तक आॅक्सीजन सपोर्ट जारी रहा, जिससे स्थिति धीरे-धीरे स्थिर हुई। पांचवें दिन स्थिति में सुधार होने पर सीपीएपी हटाकर नासल आॅक्सीजन दी गई और कंगारू मदर केयर शुरू की गई। सातवें दिन शिशु को पीलिया की शिकायत होने पर तुरंत फोटोथेरेपी उपचार देकर ठीक किया गया। दसवें दिन मासूम ने बिना किसी सपोर्ट के सामान्य हवा में सांस लेना शुरू कर दिया। पन्द्रहवें दिन शिशु इस काबिल हो गया कि उसने माँ का दूध पीना शुरू कर दिया।
त्वचा से त्वचा का संपर्क
इस पूरे उपचार के दौरान कंगारू मदर केयर यानी मां और बच्चे के बीच 'त्वचा से त्वचा का संपर्क' संजीवनी साबित हुआ। डॉक्टरों की सलाह पर मां संजना कोल ने नियमित रूप से शिशु को सीने से लगाकर रखा। इससे न केवल शिशु के शरीर का तापमान नियंत्रित रहा, बल्कि उसके वजन में तेजी से बढ़ोतरी हुई और मानसिक व शारीरिक विकास बेहतर हुआ। लगातार 36 दिनों तक चले गहन उपचार और डॉक्टरों व स्टाफ के अथक प्रयासों के बाद वह सुखद पल आया, जब मासूम को पूरी तरह स्वस्थ घोषित कर डिस्चार्ज किया गया। डिस्चार्ज के बाद 2 महीने के नियमित फॉलो-अप में शिशु का वजन बढ़कर 2.250 किलोग्राम तक पहुंच चुका है, और उसके सभी वाइटल्स पूरी तरह सामान्य हैं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. यत्नेश त्रिपाठी ने इस सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे जिला अस्पताल और सिविल अस्पतालों में एसएनसीयू, पीआईसीयू और एनआरसी जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं पूरी तरह नि:शुल्क और मुस्तैद हैं।
यह सफलता हमारी प्रशिक्षित चिकित्सा टीम के समर्पण, आधुनिक तकनीक और सजग माता-पिता के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।
यह कहानी सिखाती है कि यदि समय पर नवजात को अस्पताल पहुँचाया जाए, तो गंभीर से गंभीर स्थिति में भी उसकी जान बचाई जा सकती है। यह सफल कहानी क्षेत्र के अन्य ग्रामीण परिवारों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है कि अंधविश्वास या लापरवाही में वक्त गंवाने के बजाय, सरकारी अस्पतालों की आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा करें और नवजातों को सुरक्षित रखें।

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