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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हर स्कूल में मुफ्त सैनेटरी पैड बांटना अनिवार्य, अलग टॉयलेट न होने पर रद्द होगी मान्यता

उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए देश के सभी स्कूलों को छात्राओं के लिए मुफ्त सैनेटरी पैड और अलग वॉशरूम अनिवार्य कर दिया है। मेन्स्ट्रुयल हाइजीन पॉलिसी लागू करने के निर्देश।

By: Ajay Tiwari

Jan 30, 20265:14 PM

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हर स्कूल में मुफ्त सैनेटरी पैड बांटना अनिवार्य, अलग टॉयलेट न होने पर रद्द होगी मान्यता

हाइलाइट्स

  • शिक्षा व्यवस्था और महिला अधिकारों को लेकर फैसला
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों को दिए सख्त आदेश
  • छात्राओं को मुफ्त सैनेटरी पैड उपलब्ध कराना अनिवार्य

नई दिल्ली. स्टार समाचार वेब

उच्चतम न्यायालय ने देश की शिक्षा व्यवस्था और महिला अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। शुक्रवार को दिए गए इस आदेश के तहत अब देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनेटरी पैड उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि जिन स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग वॉशरूम नहीं होंगे, उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी। इसके साथ ही, दिव्यांग छात्रों के लिए 'डिसेबल फ्रेंडली' टॉयलेट बनाना भी अब अनिवार्य होगा।

गरिमा और शिक्षा का अधिकार: कोर्ट की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि मासिक धर्म के दौरान लड़कियों को उचित सुविधाएं और निजता नहीं मिलती, तो यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने समाज की मानसिकता पर चोट करते हुए कहा कि "लड़कियों के शरीर को बोझ के रूप में देखना बंद करना होगा; उनकी जैविक प्रक्रिया पढ़ाई में बाधा नहीं बननी चाहिए।"

4 साल की कानूनी लड़ाई और 'मेन्स्ट्रुयल हाइजीन पॉलिसी'

यह फैसला सोशल वर्कर जया ठाकुर द्वारा 2022 में दायर की गई जनहित याचिका पर आया है। याचिका में बताया गया था कि पीरियड्स के दौरान संसाधनों और सैनिटरी पैड के अभाव में देश की लाखों लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं या उन दिनों अनुपस्थित रहती हैं। कोर्ट ने अब केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति (Menstrual Hygiene Policy) को पूरे देश में सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है।

स्कूलों के लिए कड़े निर्देश

अदालत ने साफ किया है कि यह आदेश केवल कागजी नहीं है। स्कूलों को न केवल पैड बांटने होंगे, बल्कि इस्तेमाल किए गए पैड्स के निपटान (Disposal) के लिए उचित व्यवस्था भी करनी होगी। यह कदम उन छात्राओं के लिए संजीवनी साबित होगा जो आर्थिक तंगी या झिझक के कारण अपनी शिक्षा से समझौता करने को मजबूर थीं।


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